भारतीय सुरक्षा बलों के ‘कायनेटिक’ ऑपरेशन ने आतंकियों की कमर तोड़ डाली है। दूसरे देशों में कायनेटिक ऑपरेशन को बेहद खतरनाक तरीके से अंजाम दिया जाता है। इसमें हल्के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, तोपखाना और दूसरे भारी हथियारों का इस्तेमाल होता है, लेकिन भारतीय सुरक्षा बलों ने छोटे हथियार और हल्की मशीनगन के जरिए ही आतंकवाद पर भारी चोट की है। गत वर्ष ‘कायनेटिक’ ऑपरेशन के तहत जम्मू-कश्मीर में 221 आतंकवादी मारे गए थे, जबकि 2019 में यह संख्या 157 थी।
खास बात यह है कि उक्त ऑपरेशन के जरिए आतंकी घटनाओं में भारी कमी आ रही है। साल 2018 में जहां 614 आतंकी घटनाएं सामने आई थी, वहीं गत वर्ष यह ग्राफ 244 तक गिर चुका है। सेना के पूर्व ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता कहते हैं, भारतीय सुरक्षा बलों को आतंकियों के खिलाफ जो लगातार कामयाबी मिली रही है, ये उसी का नतीजा है कि अब जम्मू-कश्मीर में 4जी इंटरनेट सेवा शुरू हो सकी है।
अनिल गुप्ता के मुताबिक, ‘कायनेटिक’ ऑपरेशन में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है। अगर विदेश की बात करें तो वहां इस ऑपरेशन को बड़े पैमाने पर शुरू किया जाता है। सामान्य भाषा में कह सकते हैं कि ऐसे ऑपरेशन में पूरी ताकत लगा दी जाती है। इसमें लड़ाकू जहाज और तोपखाना भी शामिल होता है। भारत में इस ऑपरेशन को बहुत संभलकर और कम ताकत के साथ अंजाम दिया जाता है।
हमारे सुरक्षा बल सेल्फ डिफेंस के आधार पर आगे बढ़ते हैं। उनके पास अधिकतम बड़ा हथियार मशीनगन होती है। वे यह भी देखते हैं कि ऑपरेशन में आसपास के इलाके को कोई नुकसान न हो। ‘कायनेटिक’ ऑपरेशन के दौरान ऐसी सटीक रणनीति बनाई जाती है कि जिसमें टारगेट भेदने पर ही मुख्य फोकस रहता है। पत्थरबाजी के दौरान सुरक्षा बल बहुत संयम बरतते हैं। वे देखते हैं कि ऐसे ऑपरेशन में सामान्य जनता को नुकसान न पहुंचे।
देश में आतंकवाद का सफाया, अंतिम चरण में है। आतंकियों की रीढ़ टूट चुकी है। बतौर अनिल गुप्ता, उन्हें नई भर्ती के लिए युवक नहीं मिल रहे हैं। स्थानीय स्तर पर ट्रेनिंग, हथियार और लीडरशिप का भारी अभाव देखने को मिल रहा है। दूसरी तरफ, सीमा पार के आतंकियों को अब घुसपैठ में भी दिक्कत हो रही है। इस पर काफी हद तक अंकुश लगा है।
आतंकवाद के प्रमोटरों पर भी शिकंजा कसा जा रहा है। अब सुरक्षा बलों को आतंकियों के अंदरुनी नेटवर्क पर ध्यान देना होगा। स्थानीय स्तर पर उनके बहुत से स्लीपर सेल अभी सक्रिय हैं। इन्हें तलाश कर बाहर निकालना बहुत जरुरी है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी के अनुसार, 2018 से लेकर अब तक आतंकी घटनाओं में काफी कमी आ गई है। पिछले साल 244, 2019 में 594 और 2018 के दौरान 614 आतंकी घटनाएं सामने आई थीं। साल 2018 के दौरान आतंकी हमलों में 91 सुरक्षा कर्मी शहीद हो गए थे, जबकि उससे अगले साल यह संख्या 80 रही है। गत वर्ष 62 जवान शहीद हो गए थे।
‘कायनेटिक’ ऑपरेशन के अंतर्गत आतंकवादियों और उनके रणनीतिक समर्थकों की सक्रिय रुप से पहचान करना, उनके चेहरे से नकाब उतारना, उन्हें जहां से आर्थिक मदद मिलती है, उन संसाधनों को खत्म करना, नई भर्ती के अवसरों पर नकेल कसना और लोकल स्लीपर सेल की पहचान करना, आदि पर ध्यान दिया जाता है। घेराबंदी और तलाशी अभियान पर अधिक जोर देना भी ‘कायनेटिक’ ऑपरेशन का हिस्सा रहा है।