18वीं लोकसभा का पहला सत्र बीते हफ्ते संपन्न हुआ। लम्बे समय से चली आ रही चर्चा के बाद राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष बन गए। सदन में राहुल गांधी के पहले ही भाषण की वजह से जमकर हंगामा हुआ। सदन की कार्यवाही के दौरान दोनों पक्षों की ओर से मर्यादा का उल्लंघन हुआ। ऐसे में सवाल है कि राहुल गांधी का नेता प्रतिपक्ष के रूप में पहले भाषण के क्या मायने हैं? मजबूत विपक्ष होने के बाद क्या 18वीं लोकसभा के आने वाले सत्रों में सदन चलना मुश्किल होगा? इन सभी सवालों पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, सुनील शुक्ल, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार और पूर्णिमा त्रिपाठी मौजूद रहे।
रामकृपाल सिंह: राहुल गांधी के भाषण को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता है। जब राहुल गांधी नेता विपक्ष बने तो लोगों के मन में था कि नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी में से कौन सा नेता बाजी मारता है। जहां तक दोनों नेताओं की बात है तो राहुल गांधी नरेंद्र मोदी के ऊपर बोल रहे थे और नरेंद्र मोदी राहुल गांधी पर बोल रहे थे। यह माना जाता है कि नरेंद्र मोदी के बरक्स राहुल गांधी ही हैं। जहां तक मुद्दों की बात है तो मुझे लगता है कि दोनों तरफ से मुद्दे कहीं न कहीं दब गए और व्यक्तित्व का शोर शराबा ज्यादा रहा। 10 साल में पहली बार भाजपा को अपने बूते पर बहुमत नहीं मिला है यह मानना होगा। दोनों पक्षों के बयान उम्मीद के मुताबिक थे।
पूर्णिमा त्रिपाठी: जब विपक्ष को मौका मिला है तो उसका टोन यही होगा, यह उम्मीद के मुताबिक है। हमने जो पिछले 10 साल में राजनीति में देखा है उसके मुताबिक ही राहुल गांधी का यह भाषण था। राहुल गांधी ने बातें और मुद्दे सही उठाए लेकिन यह बातें कहने के लिए अतिआक्रमता की जरूरत नहीं थी। वहीं, प्रधानमंत्री के भाषण में व्यंग्य था वह पूरी तरह से विपक्ष के नेता को नकारने वाला था। यह शायद सही नहीं था।
अवधेश कुमार: इस तरह के संसद सत्र ने लोगों में डर पैदा किया है। इसको अगर कोई बहुत सामान्य कह करके खारिज करता है तो मुझे उसमें किसी से कुछ नहीं कहना। राहुल गांधी के पूरे भाषण में कई असंसदीय शब्द थे। उसके बाद भी पूरे सदन ने उनकी बात को सुना। वहीं, जब प्रधानमंत्री बोल रहे थे तब पूरे समय हंगामा किया गया। सरकार को घेरना आलोचना करना सब चल सकता है, लेकिन राहुल गांधी ने जो शुरुआत की वह नेता प्रतिपक्ष की गरिमा के मुताबिक नहीं है। राहुल गांधी की कई बातें गलत साबित हो गईं।
सुनील शुक्ल: यह डरी हुई सरकार है। देश के संसदीय इतिहास में पहली बार इतनी कम अवधि का संसद सत्र चला। आप जनमत का दावा करेंगे और संसद में बैठेंगे ही नहीं। विपक्ष का नेता आपके लिए ताली बजाएगा तभी आप समन्वय की बात करेंगे? विपक्ष जो कह रहा है उसे झूठ कह देने से चीजें नहीं चलती हैं। मेरी स्मृतियों में नहीं जब विपक्ष का नेता बोल रहा है और प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने हस्तक्षेप किया हो। डरा कौन रहा है? किसने डर का माहौल पैदा किया है? इस डर को दूर करने का काम तो सत्ता पक्ष का ही है।
समीर चौगांवकर: इस बार का जनादेश 2014 और 2019 से बिलकुल अलग है। अब राहुल गांधी का भारतीय राजनीति में उदय हुआ है। अब राहुल गांधी को पूर्णकालिक नेता बनना होगा। जो मुझे लगता है कि अब तक वो नहीं हुए हैं। वहीं, नरेंद्र मोदी अब ढलान की ओर हैं। ऐसे में 2029 में राहुल गांधी एक बड़े नेता के रूप में उभर सकते हैं। बशर्ते वो लोगों को मुद्दे अच्छे से उठाते हैं। उनके बीच रहते हैं। अब संसद ऐसी ही चलेगी। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जिस तरह की कटुता आ चुकी है मुझे लगता है कि वो अब पटरी पर आनी मुश्किल है। मुझे लगता है कि अब संसद सत्र का चलना बहुत मुश्किल होगा। अब सत्ता पक्ष और विपक्ष के मिलकर सदन चलाने की कोशिश करेंगे इसकी संभावना बहुत कम नजर आ रही है।