इस हफ्ते कई खबरें चर्चा में रहीं। संसद के मानसून सत्र में हंगामा चल रहा है। मणिपुर की हिंसा पर राजनीति हो रही है। साथ ही मध्य प्रदेश, राजस्थान में चुनाव से पहले नेताओं के दौरे हो रहे हैं। हालांकि, सबसे ज्यादा चर्चा मणिपुर मुद्दे की रही, जिसमें विपक्ष ने मांग की है कि प्रधानमंत्री संसद में बयान दें। वहीं, सरकार भी विपक्ष पर मणिपुर मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है। इस मुद्दे पर चर्चा के लिए 'खबरों के खिलाड़ी' की इस कड़ी में हमारे साथ वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक पंकज शर्मा, विनोद अग्निहोत्री, रास बिहारी, प्रेम कुमार, समीर चौगांवकर और संजय राणा मौजूद रहे। ये चर्चा
पर लाइव हो चुकी है। इसे रविवार सुबह नौ बजे भी देखा जा सकता है। पढ़िए चर्चा के अहम अंश...
पंकज शर्मा
'जब प्रधानमंत्री मणिपुर मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं तो विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव की रणनीति अपनाई है। प्रधानमंत्री मणिपुर मुद्दे पर बोलने में जितनी देर कर रहे हैं, उससे भाजपा को नुकसान हो रहा है। पीएम इतने संवेदनशील मुद्दे पर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं, यह समझ से परे है। भाजपा को महिलाओं का बड़े पैमाने पर वोट मिलता रहा है और जब मणिपुर की घटना से देश की महिलाओं में जो नाराजगी है, उस पर पीएम की चुप्पी हैरान करने वाली है। हो सकता है मणिपुर और राजस्थान की घटनाओं के अपराध का चरित्र एक जैसा हो, लेकिन इनके पीछे की सोच पर ध्यान देना जरूरी है। मणिपुर में जातीय संघर्ष चल रहा है, जिसमें एक समुदाय का पूरी बेशर्मी से साथ दिया जा रहा है। इसलिए मणिपुर की घटना की अन्य राज्य की घटनाओं से तुलना नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री की तरफ पूरा देश देख रहा है कि इस अहम मुद्दे पर उनकी क्या सोच है और इस मामले में वे क्या फैसले लेते हैं। उन्हें देश के प्रधानमंत्री की तरह व्यवहार करना चाहिए ना कि किसी एक पार्टी के प्रधानमंत्री की तरह।'
समीर चौगांवकर
'पीएम मोदी का मणिपुर मुद्दे पर बयान नहीं आया है और इसी वजह से विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाया है, लेकिन इस मुद्दे पर ना बोलने से खुद प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान हो रहा है। सरकार को एक सर्वदलीय दल भी मणिपुर भेजना चाहिए था। केंद्र सरकार को मणिपुर सरकार को बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। 90 दिन का समय बीतने के बाद भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है, ऐसे में यह सरकार की विफलता तो है ही। केंद्र सरकार ने पहले नहीं सोचा था कि यह मामला इतना बड़ा हो जाएगा। कुछ अधिकारी दिल्ली से भेजे जा रहे हैं और सीबीआई को भी जांच सौंपी गई है। केंद्र को इस बात की भी चिंता है कि अन्य उत्तर पूर्व राज्यों में भी ये आग ना फैल जाए। मणिपुर की घटना से विपक्ष को मुद्दा जरूर मिला है।'
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रास बिहारी
'विपक्ष मणिपुर की घटना को लेकर सत्ता पक्ष पर भारी नहीं पड़ रहा है। मणिपुर जैसी घटनाएं बंगाल और राजस्थान में भी हुई हैं। गृहमंत्री ने मणिपुर का दौरा किया है। कार्रवाई भी की जा रही है, लेकिन विपक्ष प्रधानमंत्री के संसद में बयान देने पर अड़ा है। विपक्ष इस मुद्दे पर सिर्फ राजनीति कर रहा है। प्रधानमंत्री अपना एजेंडा खुद तय करते हैं, किसी के दबाव में तय नहीं करते। मणिपुर की घटना निंदनीय है और दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इस घटना के पीछे अन्य घटनाओं की चर्चा क्यों नहीं हो रही है? मणिपुर में हिंसा का लंबा इतिहास रहा है।'
प्रेम कुमार
'पहले यह समझना होगा कि मणिपुर की घटना क्या सिर्फ एक वायरल वीडियो है? दरअसल वायरल वीडियो तो बस मणिपुर की हिंसा का एक उत्पाद है। मणिपुर पर कोई चर्चा नहीं हो रही थी। जब राहुल गांधी मणिपुर गए तो उसके बाद मणिपुर की चर्चा शुरू हुई। वायरल वीडियो ने समाज की संवेदना को झकझोरा। यह सच है कि देश में बलात्कार होते हैं, लेकिन मणिपुर में जातीय हिंसा में महिलाओं का इस्तेमाल किया गया है। विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए महिलाओं का शोषण किया गया। मणिपुर की घटना की अन्य राज्यों से तुलना करना ही शर्मनाक है।'
संजय राणा
'सरकार से मणिपुर मामले में कोई चूक नहीं हुई है। विपक्ष लंबे समय से मुद्दा विहीन है। पहले पेगासस का मुद्दा उठाया, राफेल का मुद्दा उठाया, लेकिन हर जगह धराशायी हुए हैं। मणिपुर की घटना की चर्चा हो रही है, लेकिन बंगाल और राजस्थान पर चर्चा क्यों नहीं हो रही है? इस मामले में राजनीति की जा रही है। वे पहाड़ पर जगह नहीं खरीद सकते, लेकिन पहाड़ के लोग मैदानी क्षेत्र में जगह खरीद सकते हैं। क्या ये अन्याय नहीं है? विपक्ष के पास मुद्दे नहीं हैं। यही वजह है कि वह मणिपुर के मुद्दे को गरमाने की कोशिश कर रहा है। विपक्ष जनता के सरोकार से जुड़े मुद्दे नहीं उठा रहा है। यही वजह है कि विपक्ष द्वारा उठाए मुद्दों को जनता का समर्थन नहीं मिल रहा है।'
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विनोद अग्निहोत्री
'राजनीति तो हर मुद्दे पर होनी चाहिए। महंगाई, अपराध, देश की सुरक्षा पर राजनीति नहीं होगी तो क्या नाच-गाने पर राजनीति होगी! देश में कुछ भी अराजनीतिक नहीं है। मणिपुर में विवाद हैं और उसके लिए देश की सरकारें ध्यान दें, लेकिन सिर्फ विवाद को आधार बनाकर मणिपुर की घटना को कैसे न्यायोचित ठहराया जा सकता है! जिस तरह नक्सलवाद को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता, उसी तरह मणिपुर की घटना को भी जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। संविधान में धारा 356 किसलिए रखी गई है? आज मणिपुर के समुदायों में भरोसा खत्म हो गया है। केंद्र में भी भाजपा की सरकार है और राज्य में भी, तो केंद्र सरकार कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है? मुख्यमंत्री खुद स्वीकार कर चुके हैं कि ऐसी सैकड़ों घटनाएं हुई हैं तो क्या इसकी जानकारी गृहमंत्री को नहीं थी? अगर उन्हें जानकारी थी तो क्या कार्रवाई की गई?'