प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने गुरुवार को बताया कि संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत को निर्धारित करने वाले केशवानंद भारती का ऐतिहासिक फैसला अब सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर भारत की 10 भाषाओं में उपलब्ध है।
मुकदमा यह था
केरल सरकार भूमि सुधार कानून-1969 के तहत कासरगोड स्थित एडनीर मठ पर कब्जा करना चाहती थी। यहां के शंकराचार्य केशवानंद श्रीपदगलवरु ने इसका विरोध किया। वे मठ का प्रबंधन अपने पास रखना चाहते थे ताकि सरकार का इसमें हस्तक्षेप न हो। फरवरी, 1970 में उन्होंने मुकदमा दायर कर केरल सरकार के कदम को अपने धर्म, संपत्ति व अन्य मूल अधिकारों का उल्लंघन करार दिया। 31 अक्तूबर, 1972 को मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई, जो 23 मार्च, 1973 तक यानी पांच महीने चली। मुकदमा 68 दिन सुना गया। याची की ओर से नानीभाई पालकीवाला के नेतृत्व और फली एस नरीमन व सोली सोराबजी के सहयोग से यह मुकदमा लड़ा गया।
संविधान के बुनियादी ढांचे में बदलाव नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने 1973 के निर्णय में कहा था कि मूल अधिकार संविधान संशोधन के तहत खत्म नहीं किए जा सकते। हालांकि संपत्ति के मालिकाना हक को सीमित करने के कानूनों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज नहीं किया। यह साफ किया कि संसद चाहे तो संशोधन कर सकती है, लेकिन यह संशोधन संविधान के बुनियादी ढांचे को तोड़ने या बदलने वाले नहीं हो सकते।
50 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाएगा
सीजेआई ने कहा कि यह साल केशवानंद भारती मामले में फैसले के 50 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाएगा। इस फैसले के लिए एक विशेष वेब पेज भी शुरू किया गया था। इस पेज में मुकदमे से जुड़े दस्तावेज, बहसों, लिखित जवाबों व निर्णय आदि को उपलब्ध करवाया गया है। उन्होंने आगे कहा कि समाज के एक बड़े वर्ग तक इस फैसले को पहुंचाने के लिए भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर सकते हैं क्योंकि भाषा की बाधाएं लोगों को वास्तव में अदालत के काम को समझने से रोकती हैं।
20 हजार फैसलों का अनुवाद
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अब फैसला हिंदी, तेलुगू, तमिल, उड़िया, मलयालम, गुजराती, कन्नड़, बंगाली, असमिया और मराठी में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत के 20,000 फैसलों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है और उन्हें ई-एससीआर (उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट का इलेक्ट्रॉनिक संस्करण) पर अपलोड किया गया है।