जयशंकर ने कहा, 'सवाल भारत की रणनीतिक संस्कृति को विकसित करने का है। अगर हम भारतीय खूबियों के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंध बनाना चाहते हैं, तो क्या यह जरूरी नहीं है कि हम वास्तव में संस्कृति, ज्ञान और परंपराओं के अपने भंडार को देखने के लिए अधिक समय, ध्यान और उर्जा दें।'
लंबे राजनयिक करियर वाले मंत्री जयशंकर ने अफगानिस्तान को लेकर अमेरिका की समझ पर ब्रिटेन के नैरेटिव के प्रभाव पर भी प्रकाश डाला और विविधता वाली संस्कृति के लेंस से भू-राजनीतिक स्थितियों को देखने की जरूरत पर जोर दिया। इसके लिए उन्होंने अपने अमेरिकी समकक्षों के साथ अफगानिस्तान को लेकर बातचीत का हवाला दिया।
उन्होंने आगे कहा, 'अफगानिस्तान में बीस साल रहने के बाद भी अमेरिकी समझ ब्रिटेन के नैरेटिव से प्रभावित थी। दरअसल, मैंने वास्तव में उनसे पूछा कि क्या आपने कभी सोचा कि पेशावर जहां है, वहां क्यों है? चूंकि, ब्रिटेन का औपनिवेशिक निर्माण वहां था, तो क्या हकीकत में डूरंड लाइन वहां थी? डूरंड लाइन अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच एक अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा है।
उन्होंने आगे कहा, जिन लोगों ने अफगानिस्तान में अपना जीवन बिताया, उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य के महान सिख योद्धा हरि सिंह नलवा जैसी शख्सियत के बारे में कभी नहीं सुना। नलवा अफगानिस्तान के साथ अपनी सीमा पर सिख सेना के कमांडर-इन-चीफ थे। यह आपको कुछ बताता है। यह आपको बताता है कि उन्होंने एक संस्कृति के लेंस से भूगोल को देखा है। जब तक हम अपने लेंस को सही जगह में रखने में सक्षम नहीं होते हैं, वे इसे कभी भी इस तरह से नहीं देखेंगे कि यह हमारे हितों की सेवा करेगा।
उन्होंने आगे कहा कि पश्चिमी विद्वानों को पांच हजार साल पुराने अखंड चीन के इतिहास को स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन उनमें से कई भारत को वही विशेष अधिकार नहीं देंगे। हकीकत में इसका एक उदाहरण खुद चर्चिल थे, जिन्होंने कहा था कि भारत भमूध्य रेखा से अधिक एक देश नहीं है।