इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन को झूठे जासूसी मामले में फंसाने और प्रताड़ना मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) डीके जैन के नेतृत्व में बनाई गई कमेटी द्वारा दर्ज रिपोर्ट को मुकदमे का आधार नहीं बनाया जा सकता।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस मामले में एफआईआर दर्ज कर चुकी सीबीआई को और भी तथ्य जुटाने की जरूरत है। न्यायाधीश ए एम खानविलकर और संजीव खन्ना की पीठ ने कहा कि सिर्फ रिपोर्ट के आधार पर सीबीआई अभियुक्त के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती। उन्हें जांच करने के साथ-साथ कागजात जमा करने होंगे और तब जाकर कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया पूरी करेंगे। आखिरकार यह जांच का विषय है जिसे पूरा किया जाना है। बेंच ने कहा कि सुनवाई के दौरान एक अभियुक्त ने निवेदन किया था कि कमेटी की रिपोर्ट को उनके साथ साझा की जाए क्योंकि सीबीआई को उन पर काफी अधिक भरोसा है।
बेंच ने कहा कि इस रिपोर्ट से कुछ नहीं बदला जा सकेगा। रिपोर्ट सिर्फ प्रारंभिक सूचना है। आखिरकार सीबीआई ही इसकी जांच करेगी जिसके परिणाम सामने आएंगे। वहीं इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर इस रिपोर्ट का अंश है। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने पहले ही कहा था कि सिर्फ कमेटी की रिपोर्ट को लोगों के सामने नहीं लाए जा सकते और कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए अधिकारी स्वतंत्र हैं।
वहीं इसके बाद ने उच्चतम न्यायालय ने कहा कि रिपोर्ट कहती है कि सीबीआई ने केस दर्ज कर रखा है लेकिन वह वेबसाइट पर नहीं है। तब मेहता ने कहा कि एफआईआर दर्ज किया गया है और उसकी कॉपी संबंधित अदालत में पेश की जा चुकी है। कोर्ट की इजाजत होगी तो समय के साथ उसे अपलोड किया जाएगा।
वर्ष 2018 में कमेटी का किया गया था गठन
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 14 सितंबर 2018 को कमेटी का गठन किया था और केरल सरकार से कहा था कि नारायणन के अपमान के मामले में उन्हें 50 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए। 79 वर्षीय नारायणन को मामले में बरी कर दिया गया था।
जानिए क्या है मामला
यह मामला वर्ष 1994 का है। इसमें आरोप है कि कुछ गोपनीय दस्तावेज अन्य देश के लोगों को सौंपा गया था। इस मामले में वैज्ञानिक नारायणन को गिरफ्तार किया गया था। बाद में सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा था कि नारायणन की अवैध गिरफ्तारी थी और केरल के तत्कालीन आला पुलिस अधिकारी इसके लिए जिम्मेदार हैं। इस मामले ने राजनीति जगत में भी विवाद खड़ा कर दिया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था।