फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या ताबड़तोड़ एनकाउंटर की होड़ ने उत्तर प्रदेश पुलिस को बना दिया है अमानवीय

Sat, 29 Sep 2018 03:59 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
UP Police Encounter
विज्ञापन

जब से उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनी है, तभी से अपराधियों की शामत आ गई है और तेजी से एनकाउंटर करने का सिलसिला अनवरत जारी है। इसपर योगी सरकार का कहना है कि सूबे की कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ऐसा किया जा रहा है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि कानून-व्यवस्था सुधारने के नाम पर पुलिस फर्जी एनकाउंटर कर रही है। 

विज्ञापन


पुलिस एनकाउंटर की ताजा घटना राजधानी लखनऊ की है, जहां दो पुलिसकर्मियों ने एनकाउंटर के नाम पर एपल कंपनी के एक सेल्स मैनेजर की जान ले ली। जानकारी के मुताबिक, पुलिसकर्मियों के इशारे पर मैनेजर ने गाड़ी नहीं रोकी तो सिपाही ने उस पर फायरिंग कर दी। बंदूक की गोली सीधे युवक के सिर में जा लगी, जिससे उसकी मौत हो गई। 

हालांकि, कार में मौजूद मैनेजर के महिला मित्र की तहरीर पर पुलिस ने आरोपी सिपाहियों के खिलाफ केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही उन्हें बर्खास्त भी कर दिया गया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी मामले पर नाराजगी जताई है और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। 
विज्ञापन


लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या वाकई यूपी में कानून-व्यवस्था सुधारने के नाम पर फर्जी एनकाउंटर हो रहे हैं? क्योंकि मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट तो कुछ इसी तरफ इशारा करती है। फर्जी एनकाउंटर के मामले में पिछले साल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भी एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें कहा गया था कि फर्जी एनकाउंटर की शिकायतों के मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस देश में सबसे आगे है। आयोग ने पिछले 12 साल का आंकड़ा जारी किया था, जिसमें देशभर से फर्जी एनकाउंटर की कुल 1241 शिकायतें आयोग के पास पहुंची थीं। इसमें अकेले 455 मामले यूपी पुलिस के खिलाफ थे।   

हालांकि सरकार के आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं। इसी साल फरवरी में एक आधिकारिक आंकड़ा जारी किया गया था, जिसमें बताया गया कि योगी सरकार के सत्ता में आने के 10 महीने के अंदर पूरे राज्य में करीब 1100 पुलिस एनकाउंटर हुए। इनमें 34 अपराधी मारे गए, 265 घायल हुए और करीब 2,700 हिस्ट्री-शीटरों को गिरफ्तार किया गया। 

इसके अलावा पुलिस द्वारा किए गए कई एनकाउंटर ऐसे भी थे, जिन्हें फर्जी करार दिया गया। मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले एक संगठन 'सिटीजंस अगेंस्ट हेट' ने हाल ही में एक रिपोर्ट पेश की थी और दावा किया था कि यूपी पुलिस द्वारा किए गए करीब 16 एनकाउंटरों में गड़बड़ियां हैं। 

विज्ञापन

प्रतीकात्मक तस्वीर
संगठन का कहना था कि मुठभेड़ से जुड़े कई ऐसे तथ्य उन्हें मिले हैं जो संदेह पैदा करते हैं। पहली तो ये कि इन सभी 16 मामलों में दर्ज हुए दस्तावेजों में करीब-करीब एक जैसी ही एनकाउंटर की कहानियां बताई गई हैं। जैसे अपराधियों को पकड़ने का तरीका और एनकाउंटर में हर बार एक अपराधी मारा जाता है, जबकि दूसरा मौके पर फरार होने में सफल हो जाता है। 

इसके अलावा संगठन ने ये भी दावा किया था कि पुलिस ने जिन अपराधियों को एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया था, उनके शरीर पर कई तरह के जख्म के निशान मिले थे, जिससे मामला एनकाउंटर की तरफ न जाकर, पुलिस प्रताड़ना की तरफ घूम जाता है। 

संगठन ने एनकाउंटर फर्जी होने का एक और दावा किया था कि मुठभेड़ में अपराधियों को बिल्कुल पास से गोली मारी गई है, जो एनकाउंटर पर सवाल खड़े करता है। उनका कहना था कि एनकाउंटर के तहत अमूमन गोली तब चलाई जाती है, जब अपराधी भाग रहा होता है या पुलिस पर हमला बोल देता है। ऐसे में गोली बिल्कुल पास से कैसे लग सकती है? 

संगठन ने ये भी दावा किया था कि मुठभेड़ों में खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। उनके मुताबिक, एनकाउंटर में पुलिस का निशाना ज्यादातर ऐसे मुसलमान निशाना बने हैं जो गरीब तबके से हैं।  

वहीं, कुछ संगठनों का ये भी दावा था कि पुलिस पहले गोली मार देती है और बाद में उसके हाथ में बंदूक पकड़ा दी जाती है, ताकि उसे एनकाउंटर का रूप दिया जा सके।   

हालांकि यूपी पुलिस इन सभी आरोपों को खारिज करती है। उनका कहना है कि मुठभेड़ में सभी समुदायों के लोग मारे गए हैं, किसी खास समुदाय को निशाना नहीं बनाया जा रहा है और न ही एनकाउंटर फर्जी तरीके से किए जा रहे हैं। अगर अपराधी पुलिस पर हमला करता है तो पुलिसकर्मियों को अपने बचाव के लिए उस समय जो उचित लगता है, वो करते हैं। 

अब सच क्या है और झूठ क्या है, यह या तो पुलिस को पता है या शायद सरकार को। लेकिन ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए और न्यायिक जांच जरूर करानी चाहिए। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें