संगठन का कहना था कि मुठभेड़ से जुड़े कई ऐसे तथ्य उन्हें मिले हैं जो संदेह पैदा करते हैं। पहली तो ये कि इन सभी 16 मामलों में दर्ज हुए दस्तावेजों में करीब-करीब एक जैसी ही एनकाउंटर की कहानियां बताई गई हैं। जैसे अपराधियों को पकड़ने का तरीका और एनकाउंटर में हर बार एक अपराधी मारा जाता है, जबकि दूसरा मौके पर फरार होने में सफल हो जाता है।
इसके अलावा संगठन ने ये भी दावा किया था कि पुलिस ने जिन अपराधियों को एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया था, उनके शरीर पर कई तरह के जख्म के निशान मिले थे, जिससे मामला एनकाउंटर की तरफ न जाकर, पुलिस प्रताड़ना की तरफ घूम जाता है।
संगठन ने एनकाउंटर फर्जी होने का एक और दावा किया था कि मुठभेड़ में अपराधियों को बिल्कुल पास से गोली मारी गई है, जो एनकाउंटर पर सवाल खड़े करता है। उनका कहना था कि एनकाउंटर के तहत अमूमन गोली तब चलाई जाती है, जब अपराधी भाग रहा होता है या पुलिस पर हमला बोल देता है। ऐसे में गोली बिल्कुल पास से कैसे लग सकती है?
संगठन ने ये भी दावा किया था कि मुठभेड़ों में खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। उनके मुताबिक, एनकाउंटर में पुलिस का निशाना ज्यादातर ऐसे मुसलमान निशाना बने हैं जो गरीब तबके से हैं।
वहीं, कुछ संगठनों का ये भी दावा था कि पुलिस पहले गोली मार देती है और बाद में उसके हाथ में बंदूक पकड़ा दी जाती है, ताकि उसे एनकाउंटर का रूप दिया जा सके।
हालांकि यूपी पुलिस इन सभी आरोपों को खारिज करती है। उनका कहना है कि मुठभेड़ में सभी समुदायों के लोग मारे गए हैं, किसी खास समुदाय को निशाना नहीं बनाया जा रहा है और न ही एनकाउंटर फर्जी तरीके से किए जा रहे हैं। अगर अपराधी पुलिस पर हमला करता है तो पुलिसकर्मियों को अपने बचाव के लिए उस समय जो उचित लगता है, वो करते हैं।
अब सच क्या है और झूठ क्या है, यह या तो पुलिस को पता है या शायद सरकार को। लेकिन ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए और न्यायिक जांच जरूर करानी चाहिए।