एनडीए सरकार ने अप्रैल 2015 में घोषणा की थी कि 36 राफेल फाइटर जेट्स को ऑफ द शेल्फ खरीदा जाएगा। हमारी वायुसेना को 36 अत्याधुनिक लड़ाकू विमान मिलेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सौदा 7.8 करोड़ यूरो (करीब 58,000 करोड़ रुपए) का है, सितंबर 2019 में पहला राफेल भारत पहुंचेगा।
भारत और फ्रांस ने 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए 23 सितंबर, 2016 को 7.87 अरब यूरो (लगभग 59,000 करोड़ रुपये) के सौदे पर हस्ताक्षर किए गए थे। नवीनतम मिसाइलों और शस्त्र प्रणालियों से लैस एवं भारत के अनुकूल कई रूपान्तरण वाले इन लड़ाकू विमानों से भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने के लिए इस सौदे पर हस्ताक्षर तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर और उनके फ्रांसीसी समकक्ष ने किये थे।
आखिर राफेल को ही क्यों चुना गया?
राफेल डील उस मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसे रक्षा मंत्रालय की ओर से भारतीय वायुसेना लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट (एलसीए) और सुखोई के बीच मौजूद अंतर को खत्म करने के मकसद से शुरू किया गया था।
साल 2007 में वायुसेना की ओर से मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) खरीदने का प्रस्ताव सरकार को भेजा गया। इसके बाद भारत सरकार ने 126 लड़ाकू विमानों को खरीदने का टेंडर जारी किया। मई 2011 में एयर फोर्स ने राफेल और यूरो फाइटर जेट्स को शॉर्ट लिस्टेड किया। जनवरी 2012 में राफेल को खरीदने के लिए टेंडर को सार्वजनिक कर दिया गया।
मीडिया खबरों के अनुसार एमएमआरसीए के कॉम्पिटीशन में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्ट राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्कन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे। छह फाइटर जेट्स के बीच राफेल को इसलिए चुना गया क्योंकि राफेल की कीमत बाकी जेट्स की तुलना में काफी कम थी। इसके अलावा इसका रख-रखाव भी काफी सस्ता था।
राफेल सौदे को लेकर कांग्रेस लगातार कह रही है कि मोदी सरकार ने 7.87 अरब यूरो यानी करीब 59000 करोड़ रुपये की बढ़ी हुई कीमत पर ये विमान खरीदने का सौदा किया है। एनडीए सरकार ने प्रति विमान 1670 करोड़ रुपये चुकाए जबकि यूपीए सरकार ने 526 करोड़ रुपये का भाव तय किया था। हालांकि रक्षा मंत्रालय की आंतरिक गणना में दिखाया गया है कि हर राफेल विमान यूपीए वाली डील के मुकाबले 59 करोड़ रुपये सस्ता पड़ रहा है। मई 2011 में एयर फोर्स ने राफेल और यूरो फाइटर जेट्स को शॉर्ट लिस्टेड किया।
कांग्रेस पूछ रही ये सवाल
1- यूपीए के राफेल समझौते में एक विमान की कीमत 526 करोड़ रुपये थी जो मोदी सरकार ने 1570 करोड़ रुपये में लगभग तीन गुनी कीमत के साथ लिया जा रहा है, इस नुकसान का जिम्मेदार कौन ?
2- साल 2016 में फ्रांस में हुए समझौते में सुरक्षा पर बनी कैबिनेट कमेटी की मंजूरी नहीं ली गई। इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, क्या इस पर भ्रष्टाचार का केस नहीं बनता है?
3- नवंबर साल 2017 में रक्षा मंत्री ने कहा था कि 36 राफेल विमान इमरजेंसी के लिए तत्काल रूप से लिए गये। अगर ऐसा था तो समझौते के इतने समय बाद भी एक भी राफेल विमान क्यों नहीं मिला है?
रक्षा खरीद में ऑफसेट नियम सबसे पहले 2005 में मनमोहन सरकार की रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) के तहत लाया गया था। इसके तहत किसी विदेशी कंपनी को सौदे का एक हिस्सा भारत में निवेश करना होता है। 126 राफेल विमानों के सौदे में 50 फीसदी ऑफसेट क्लॉज मूल निविदा का हिस्सा था।
इस नियम के तहत दसॉ के पास किसी निजी कंपनी को चुनने की छूट थी, बशर्ते मुख्य प्रोडक्शन लाइन सरकारी कंपनी हिंदुस्तान ऐरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की ओर से तैयार की जाए। 126 जेट की शुरुआती डील के तहत फ्रांस की कंपनी को भारत में ऑफसेट के तौर पर 1,07,415 करोड़ रुपये का निवेश करना था। ऑफसेट नियम (एक ऐसी शर्त जो इस करार का हिस्सा है लेकिन इस्तेमाल दूसरी जगह होगा) के मुताबिक, फ्रांस इस करार की कुल राशि का करीब 50 फीसदी भारत में रक्षा उपकरणों और इससे जुड़ी दूसरी चीजों में निवेश करेगा।
लेकिन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 36 राफेल विमानों की सीधी खरीद का फैसला लिया। जिसके बाद फ्रांस की तरफ से कहा गया कि जब वह उसी दर पर विमानों की आपूर्ति कर रहा है जिस पर वायु सेना खरीद रही है, तो 50 प्रतिशत ऑफसेट क्लॉज की शर्त लागू नहीं होती।
भारत के लिए खास तरह से डिजाइन किया गया है राफेल
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राफेल बनाने वाली ‘दसॉल्त’ कंपनी इसे भारत की भौगोलिक परिस्थितियों और उसकी जरूरतों के हिसाब से डिजाइन करेगी। इसे लेह-लद्दाख और सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों में भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसके लिए खास पुर्जे लगाए जाएंगे।
पायलट ट्रेनिंग के लिए अलग से सिम्युलेटर मिलेंगे। सिम्युलेटर का अर्थ ठीक वैसा ही मॉडल फाइटर जेट है जैसा वास्तव में राफेल होगा। इसके रखने की जगह और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी भी फ्रांस की ही होगी। इसके लिए स्पेशल हैंगर्स (एयरक्राफ्ट रखने की जगह) भी फ्रांस ही तैयार करेगा।
पाकिस्तान-चीन से अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए एयरफोर्स को कम से कम 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है। आज की तारीख में वायुसेना के पास 31 स्क्वाड्रन हैं. एक स्क्वाड्रन में 18 लड़ाकू विमान होते हैं। दो स्क्वाड्रन में रफाल के 36 लड़ाकू विमान होंगे, यानी लड़ाकू विमानों की कमी तो है लेकिन जो राफेल वायुसेना के बेड़े में शामिल होगा तो भारत को नई ताकत मिलेगी, क्योंकि अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया और माली में हुए ऑपरेशंस में इसका इस्तेमाल हो चुका है।
खरीदे जाने वाले आधुनिक विमानों की संख्या 36 तक सीमित रखने और रूस के साथ फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम के रद्द होने के करीब पहुंचने के साथ एयर फोर्स एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। उसने मेक इन इंडिया प्रोग्राम के तहत 116 लड़ाकू विमान खरीदने की योजना बनाई है, लेकिन सालभर से उस पर कोई काम ही नहीं हो सका है। ऐसे में साल 2020 में आसमान में दबदबा रखने की इसकी क्षमता अब तक के सबसे निचले स्तर पर जा सकती है।
फ्रांस से राफेल सौदे के विवाद की आंच सिर्फ भारत में ही नहीं फ्रांस में भी पहुंच चुकी है, जहां जानकार बता रहे हैं कि भारत-फ्रांस के बीच संबंधों पर भी इसका असर पड़ सकता है। असल में, जब फ्रेंच न्यूज वेबसाइट मीडियापार्ट में छपे लेख में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के हवाले से कहा गया है कि अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस के साथ करार करने में फ्रांस सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। राफेल डील के लिए भारत सरकार ने अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी का नाम प्रस्तावित किया था, लिहाजा दसाल्ट एविएशन कंपनी के पास कोई और विकल्प नहीं था।
फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद फ्रांसीसी विमानन कंपनी दसाल्ट ने सफाई देते हुए कहा है कि उसने खुद ही इस सौदे के लिए भारत की कंपनी रिलांयस को चुना है। एक जारी बयान में कंपनी ने कहा है कि रिलायंस समूह को रक्षा प्रक्रिया 2016 नियमों के मुताबिक चुना गया है।
दसाल्ट एविएशन ने कहा कि राफेल सौदा भारत और फ्रांस सरकार के बीच एक अनुबंध था, लेकिन यह एक अलग तरह का अनुबंध था। इसमें दसाल्ट एविएशन को खरीद मूल्य के 50 फीसदी निवेश भारत में बनाने के लिए प्रतिबद्ध था। इसमें मेक इन इंडिया की नीति के अनुसार दसॉ एविएशन ने भारतीय कंपनी रिलायंस समूह के साथ साझेदारी करने का फैसला किया। यह दसॉ एविएशन की पसंद थी, इस साझेदारी ने फरवरी 2017 में दसॉ रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (डीआरएएल) संयुक्त उद्यम के निर्माण की शुरुआत की।
अनिल अंबानी ने कहा था कि राफेल लड़ाकू विमान का निर्माण रिलायंस या दसॉल्ट रिलायंस के संयुक्त उद्यम द्वारा नहीं किया जा रहा। सभी 36 विमानों का 100 फीसदी निर्माण फ्रांस में किया जाएगा और फ्रांस से उनका भारत को निर्यात किया जाएगा।