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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: वो ब्रिटिश महिला जिसने भारत के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी

Shilpa Thakur
Updated Thu, 07 Mar 2019 01:06 PM IST
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फ्रेडा बेदी - फोटो : social media

फ्रेडा बेदी, वो ब्रिटिश महिला जिसने बेहद असामान्य जीवन जिया और भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गईं। इंग्लैंड के छोटे से शहर में जन्मीं फ्रेडा अपने प्यार के लिए भारत आई थीं। उनकी जीवनी लिखने वाले एंड्रयू वाइटहेड ने उनकी कहानी में ऐसा ही कुछ लिखा है। लेबल, रंग और पक्षपात से भी गहरी एक चीज होती है, और प्यार उनमें से एक है। 

ये शब्द फ्रेडा के ही कहे हैं। जिन्होंने कई चुनौतियां होने के बावजूद भी भारतीय सिख से शादी की। उन्होंने एक पत्नी और एक महिला की भूमिका के बारे में भारतीय धारणाओं को चुनौती दी। फ्रेडा अपने ब्वायफ्रेंड बाबा प्यारे लाल बेदी से ऑक्सफोर्ड में मिली थीं। प्यारे लाल को फ्रेडा के दोस्त बीपीएल कहते थे। दोनों यहीं पर पढ़ाई कर रहे थे। 



ये समय था 1930 की शुरूआत का, उस समय नस्लीय भेदभाव भी चरम पर था। फ्रेडा के पिता इंग्लैंड के डर्बी में ज्वैलरी की दुकान चलाते थे और घड़ी रिपेयर करने का काम भी करते थे। फ्रेडा को अपने पिता के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता था। उनके पिता पहले विश्व युद्ध में भर्ती हुए, वह मशीन गन कॉर्पस में काम करते थे, जहां सबसे अधिक लोगों की मौत होती थी। जिसके कारण इसे 'सुसाइड क्लब' का नाम मिला था। 

उत्तरी फ्रांस में उनके पिता की मौत हो गई। उस वक्त फ्रेडा की उम्र महज 7 साल थी। इससे उनका पूरा बचपन ही अंधकारमय हो गया। इसके बाद वह आध्यात्म की खोज के लिए आगे बढ़ीं। फ्रेडा जब ऑक्सफोर्ड में पढ़ रही थीं तो उस समय के युवा काफी चिंतित रहते थे। फासीवाद का उदय तो हो ही चुका था, साथ ही बेरोजगारी भी अपने चरम पर थी। पूरा विश्व एक तरह से खतरे में रह रहा था।

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फ्रेडा बेदी - फोटो : social media
फ्रेडा बेदी, वो ब्रिटिश महिला जिसने बेहद असामान्य जीवन जिया और भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गईं। इंग्लैंड के छोटे से शहर में जन्मीं फ्रेडा अपने प्यार के लिए भारत आई थीं। उनकी जीवनी लिखने वाले एंड्रयू वाइटहेड ने उनकी कहानी में ऐसा ही कुछ लिखा है। लेबल, रंग और पक्षपात से भी गहरी एक चीज होती है, और प्यार उनमें से एक है। 

ये शब्द फ्रेडा के ही कहे हैं। जिन्होंने कई चुनौतियां होने के बावजूद भी भारतीय सिख से शादी की। उन्होंने एक पत्नी और एक महिला की भूमिका के बारे में भारतीय धारणाओं को चुनौती दी। फ्रेडा अपने ब्वायफ्रेंड बाबा प्यारे लाल बेदी से ऑक्सफोर्ड में मिली थीं। प्यारे लाल को फ्रेडा के दोस्त बीपीएल कहते थे। दोनों यहीं पर पढ़ाई कर रहे थे। 

ये समय था 1930 की शुरूआत का, उस समय नस्लीय भेदभाव भी चरम पर था। फ्रेडा के पिता इंग्लैंड के डर्बी में ज्वैलरी की दुकान चलाते थे और घड़ी रिपेयर करने का काम भी करते थे। फ्रेडा को अपने पिता के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता था। उनके पिता पहले विश्व युद्ध में भर्ती हुए, वह मशीन गन कॉर्पस में काम करते थे, जहां सबसे अधिक लोगों की मौत होती थी। जिसके कारण इसे 'सुसाइड क्लब' का नाम मिला था। 

उत्तरी फ्रांस में उनके पिता की मौत हो गई। उस वक्त फ्रेडा की उम्र महज 7 साल थी। इससे उनका पूरा बचपन ही अंधकारमय हो गया। इसके बाद वह आध्यात्म की खोज के लिए आगे बढ़ीं। फ्रेडा जब ऑक्सफोर्ड में पढ़ रही थीं तो उस समय के युवा काफी चिंतित रहते थे। फासीवाद का उदय तो हो ही चुका था, साथ ही बेरोजगारी भी अपने चरम पर थी। पूरा विश्व एक तरह से खतरे में रह रहा था।

फ्रेडा बेदी - फोटो : social media
उन्होंने कॉलेज में कई दोस्त बनाए और उनके साथ लेबर क्लब और अक्तूबर कम्युनिस्ट की बैठक में शामिल होने लगीं। वह ऑक्सफोर्ड मज्लिस की साप्ताहिक बैठक में भी जाती थीं। यहां छोटी संख्या में भारतीय छात्र भी आते थे, जो अपने देश के राष्ट्रवाद से जुड़े मामलों पर चर्चा करते थे।

उनके पति बीपीएल पंजाबी सिख थे। ऑक्सफोर्ड के महिला कॉलेज में पुरुष और महिला के बीच में दूरी पर विशेष ध्यान दिया जाता था। अगर कोई लड़का छात्रा के कमरे में चाय पीने जाता था, तो वहां एक संरक्षिका मौजूद रहती थी।

दरवाजा भी खुला रहता था और खिड़कियां भी। फ्रेडा प्यारे लाल से मिलती थीं, वो भी बिना किसी संरक्षिका की मौजूदगी में। क्योंकि वह नस्लीय भेदभाव में बिलकुल विश्वास नहीं करती थीं। जब फ्रेडा ने प्यारे लाल से शादी करने की बात कही तो उनके समय की मशहूर राजनीतिज्ञ बारबरा कास्टल हैरान रह गईं।

बारबरा ने इस रिश्ते को मंजूरी दे दी। लेकिन फ्रेडा की मां इस रिश्ते से खुश नहीं थीं। लेकिन जब प्यारे लाल डर्बी आए और उनके परिवार से मिले तो वो सब रिश्ते के लिए मान गए। फ्रेडा का मानना था कि वह ऑक्सफोर्ड की ऐसी पहली अंडरग्रेजुएट छात्रा हैं, जिन्होंने भारतीय छात्र से शादी की।

इस रिश्ते से बहुत से लोग खुश नहीं थे। हालात ये थे कि विवाह समारोह आयोजित करने वाले रजिस्ट्रार ने दंपत्ति के साथ हाथ मिलाने से ही इनकार कर दिया था।

फ्रेडा बेदी - फोटो : social media
शादी के वक्त फ्रेडा ने खुद को भारतीय के तौर पर पंजीकृत कराया और भारतीय वेशभूषा पहनी। दंपत्ति नाव से अपने चार माह के बच्चे के साथ इंटली के ट्रीसटी से नाव से रवाना होकर मुंबई आ गए। ये दो हफ्ते का सफर था। 

फ्रेडा ने अपने नाव में बिताए उस सफर के बारे में कहा था कि बच्चे को दूध पिलाने के लिए उनका खुद का दूध पीना जरूरी था। फ्रेडा का कहना है, "मुझे याद है लाखों कॉकरोच नाव की रसोई में आ जाते थे। मुझे रसोई से बाहर निकलना पड़ता था।"  

ब्रिटिश प्रशासन फ्रेडा और उनके पति को उनकी कॉलेज के दिनों में सक्रियता के कारण क्रांतिकारी और परेशानी खड़ी करने वाला मानते थे। नाव से उतरने के बाद सात घंटे तक उनके बैग आदि की जांच की गई कि कहीं वह वामपंथी विचारों के प्रचार के लिए तो नहीं आए हैं। केवल इतना ही नहीं उनके चार महीने के बेटे रंगा के कपड़े तक की जांच की गई।

भारत में आने के बाद फ्रेडा अपनी सास से मिलीं, उनकी सास विधवा थीं और भाबूजी के नाम से जानी जाती थीं। प्यारे लाल का घर पंजाब के करतारपुर में स्थित था। फ्रेडा ने सफेद रंग की सूती साड़ी पहनी थी। फ्रेडा ने अपने पति के साथ अपनी सास के पैर छुए।

उनकी सास की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए थे। फ्रेडा का रहन सहन अलग था फिर भी वह अपने भारतीय परिवार के रंग में ढलना चाहती थीं। फ्रेडा की सास दिल की काफी अच्छी थीं। प्यारे लाल ने अपने परिवार की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं लिया, और दोनों लाहौर की ओर चल दिए। यहां बिना बिजली और पानी के घर में रहे, उन्होंने मुर्गियां और भैंसें पालीं।

फ्रेडा बेदी - फोटो : social media
जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ तो दोनों भारत को उसमें घसीटे जाने से खुश नहीं थे। प्यारे लाल को सैन्य भर्ती के दौरान तोड़फोड़ करने को लेकर शिविर में रखा गया। फ्रेडा भारत के लिए अपनी मातृभूमि के खिलाफ हो गई थीं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए उन्होंने लोगों से कहा कि जब तक भारत एक लोकतांत्रिक देश ना बन जाए तब तक कोई भी युद्ध के लिए सेना में भर्ती ना हो। ब्रिटिश अधिकारियों को भी समझ नहीं आ रहा था कि एक ब्रिटिश महिला को कैसे नियंत्रित करें।

उन्हें गिरफ्तार कराने के लिए भी ब्रिटिश अधिकारियों को बुलाया गया। उनसे सवाल पूछने वाला भी हैरान रह गया जब उन्होंने खुद को ऑक्सफोर्ड की छात्रा बताया। क्योंकि सवाल पूछने वाला खुद भी ऑक्सफोर्ड से था। 

उस अधिकारी ने कहा कि चिंता मत करो, मुझे ये अजीब नहीं लगा। क्या तुम्हें अंग्रेज महिलाओं को दिए जाने वाले विशेषाधिकार चाहिए? इसपर फ्रेडा ने कहा कि उनके साथ एक भारतीय महिला की तरह ही बर्ताव किया जाए। फ्रेडा को छह माह की जेल हुई।

फ्रेडा का कहना है कि यह उनकी किस्मत थी जो उन्हें भारत ले आई। ताकि वह एक अंग्रेज महिला होकर भारत की स्वतंत्रता की मांग करके एक इतिहास बना सकें। उनकी राजनीतिक प्रमुखता स्वतंत्रता के बाद भी बनी रही। 

1959 में जब हजारों तिब्बती चीनी उत्पीड़न से बचने के लिए हिमालय आए, तो फ्रेडा ने इन बहादुर शरणार्थियों की मदद करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया। वह तिब्बती आध्यात्मिकता में रम गईं। 60 के दशक में, उन्होंने बौद्ध शिक्षाओं के बारे में प्रचार करने के लिए अथक यात्रा की लेकिन पश्चिम में रहने के लिए कभी नहीं लौटीं।
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