जलवायु में आ रहे बदलावों के साथ यह संकट और गंभीर रूप धारण कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की ओर से किए नए अध्ययन से पता चला है कि बढ़ते तापमान और गर्म जलवायु के कारण भारत आने वाले दशकों में अपने भूजल का कहीं ज्यादा तेजी से दोहन करेगा। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने भारत में भूजल को होने वाले नुकसान की दरों का अनुमान लगाने के लिए 10 जलवायु मॉडलों से प्राप्त बारिश और तापमान के अनुमानों का उपयोग किया है। शोधकर्ताओं ने कई स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों को एकत्र किया है और उनका एक डाटासेट तैयार किया है। इसमें देश के हजारों कुओं में भूजल के स्तर, फसलों पर बढ़ता जल तनाव और उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के साथ मौसम संबंधी रिकॉर्ड को भी शामिल किया गया है।
सिंचाई के लिए पड़ेगी अधिक पानी की जरूरत
अध्ययन में इस बात पर गौर किया गया है कि देश में बढ़ते तापमान के कारण फसलों पर पड़ने वाले दबाव से निपटने के लिए पानी की मांग बढ़ सकती है। इसकी वजह से किसानों को फसलों की सिंचाई में वृद्धि करनी पड़ेगी। भारत का शुद्ध भूजल सिंचित क्षेत्र 1960-61 में सिर्फ 75 लाख हेक्टेयर था, जो 2018-19 में बढ़कर 4 करोड़ 60 लाख हेक्टेयर हो गया। यानी सिंचित क्षेत्र में लगभग 530 फीसदी की वृद्धि हुई। इसी अवधि के दौरान कुल सिंचित क्षेत्र में भूजल का हिस्सा भी 29 से बढ़कर 68 फीसदी हो गया।
विश्व का एक चौथाई भूजल भारत करता है उपयोग
अध्ययन से जुड़ीं वरिष्ठ लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के स्कूल फॉर एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी में सहायक प्रोफेसर मेहा जैन का कहना है कि भारत में हर साल उपयोग किया जा रहा भूजल वैश्विक उपयोग का लगभग एक चौथाई है। देश में इसकी सबसे ज्यादा खपत कृषि के लिए की जा रही है।
समस्या से निपटने के लिए अटल भूजल योजना और जलदूत
सरकार ने अटल भूजल योजना के अलावा 'जलदूत' नामक मोबाइल एप भी लॉन्च किया है। इसका मकसद भारत के गांवों में गिरते भूजल के जलस्तर का पता लगाना है, जिससे पानी की समस्या को दूर किया जा सके।