गाजियाबाद के इंदिरापुरम में अपने परिवार के साथ सामूहिक आत्महत्या करने वाले कारोबारी गुलशन वासुदेव की अंतिम इच्छा भी अधूरी रह गई। अपने सुसाइड नोट में उन्होंने सभी परिजनों का अंतिम संस्कार एक साथ किए जाने की इच्छा जताई थी, लेकिन उनकी दूसरी पत्नी और सहकर्मी संजना के परिवार वाले उनके शव को अपने साथ ले गये। परिवार अपनी बेटी का अंतिम संस्कार अपने धार्मिक रीति-रिवाज के मुताबिक करना चाहता था।
इस ह्रदय विदारक घटना को सुनने के बाद परिवार ही नहीं आसपास के लोग भी स्तब्ध हैं। उनके निवास स्थान झिलमिल कालोनी और व्यापार स्थल लाल क्वार्टर और गांधी नगर में उनके करीबी भी हैरान हैं। उनके एक करीबी परिवार के इस तरह उजड़ जाने से किसी से कुछ कहते-सुनते नहीं बन रहा है। यह खबर सुनकर श्मशान घाट पर भारी संख्या में लोग पहुंचे. गुलशन वासुदेव (हरीश) के सबसे बड़े भाई विपिन वासुदेव ने सबकी चिता को मुखाग्नि दी। इस दुखद मौके पर पूरे परिवार और दोस्तों की आंखों से आंसू आ गए। पूरा वातावरण इस असहनीय गम से बोझिल था।
गुलशन वासुदेव (हरीश) की मां शारीरिक रूप से काफी कमजोर थीं। यही कारण है कि उनकी परवरिश उनकी भाभी अचला वासुदेव ने की थी। वे यह कहते हुए फफक पड़ीं कि जिसे अपने बच्चे की तरह पाला था, ख्वाब में भी सोचा न था कि एक दिन उसका अंतिम संस्कार भी अपने ही हाथों से करना पड़ेगा। व्यापार में बेहतर ढंग से सेटल हो जाने के बाद हरीश झिलमिल कालोनी छोड़कर दूर रहने लगे थे। लेकिन बच्चों का आना-जाना अक्सर लगा रहता था। कभी-कभी बच्चे उनके घर पर रुक भी जाते थे। घटना वाली रात के एक दिन पहले भी बच्चे उनके घर आये थे। अब वे सिर्फ ये कहते हुए अफसोस कर रही हैं कि काश उन्होंने बच्चों को अपने घर रोक लिया होता।
संजना सीलमपुर की रहने वाली थीं। नौकरी की तलाश नें उन्हें गुलशन वासुदेव से मिलवा दिया था। धीरे-धीरे वे उनका पूरा कारोबार संभालने लगीं। कुछ लोगों का कहना है कि इसी बीच दोनों करीब आ गये थे और लगभग साल भर पहले विवाह भी कर लिया था। संजना की मां नूरजहां ने बताया कि उसकी खुशी के आगे हमनें कोई सवाल नहीं किया था। लेकिन जब वह अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी चुनने गई थी तो आखिर मौत को गले क्यों लगा लिया? वे हैरान थीं कि गुलशन के इस फैसले का परवीन या संजना, दोनों में किसी एक ने भी विरोध क्यों नहीं किया? उन्होंने कहा कि अब वे अपनी बेटी का अंतिम संस्कार अपने धार्मिक रीति-रिवाज से करना चाहती हैं जिससे उसकी आत्मा को शांति मिल सके।
वासुदेव परिवार के एक करीबी का कहना है कि वे अपने खरगोश को बहुत प्यार करते थे। सुबह-शाम उसे खुद अपने हाथ से चारा खिलाते थे। कोई बच्चा भी खरगोश को तंग करे तो वे उसे डांट दिया करते थे। लेकिन अपने जीवन के अंतिम क्षण में वे उसे भी खत्म कर गये। शायद वे नहीं चाहते थे कि उनके जाने के बाद उनसे जुड़े किसी भी व्यक्ति को कोई तकलीफ पहुंचे। यही कारण है कि उन्होंने अपने बच्चों के साथ-साथ खरगोश तक को जिंदा नहीं छोड़ा।