फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मंशा साफ: चीन सोचे उसे युद्ध करना है या पीछे हटना है, विशेषज्ञों ने बताए पीएम के दौरे के मायने

Sat, 04 Jul 2020 02:07 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
विज्ञापन
1 of 9
लद्दाख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : ट्विटर
चीन से जारी सीमा विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को लद्दाख का दौरा किया। वहां उन्होंने भारतीय सेना के जवानों को संबोधित करने के साथ उनका उत्साह बढ़ाया और दूसरी ओर चीन को भी खूब खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने कहा कि भारतीय जवानों ने दुनिया को अपनी बहादुरी का नमूना दिखाया है। बहरहाल, कोरोना से उपजे हालात के ऐसे समय में प्रधानमंत्री मोदी का यह लद्दाख दौरा काफी अहम है। आइए विशेषज्ञों से जानते हैं कि आखिर इसके मायने क्या हैं...
विज्ञापन

2 of 9
लद्दाख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीटीआई
पीएम ने फौजी का हौसला ही नहीं बढ़ाया, बल्कि उसे सम्मान भी दिया: लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) अता हसनैन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लद्दाख दौरे से अग्रिम मोर्चे पर तैनात जवानों और अफसरों का जो हौसला बढ़ा है उसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। आप यकीन नहीं कर सकते कि ऐसे तनावग्रस्त हालात में प्रधानमंत्री का अचानक पहुंचना उन जवानों के लिए क्या मायने रखता है जो जान की परवाह किए बिना सीमा की हिफाजत कर रहे हैं।

पीएम ने फौजी का हौसला ही नहीं बढ़ाया, बल्कि उसे इज्जत भी दी है। पीएम ने सामरिक नजरिए से एक तीर से कई निशाने साधे हैं। चीन ही नहीं पूरी दुनिया को संदेश दिया है कि भारत एक हद के बाद दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं करेगा। खासतौर पर चीन को संदेश है कि भारत किसी भी हद तक जाने को तैयार है।

अब गेंद चीन के पाले में है कि वह बातचीत का रास्ता अपनाकर पीछे हट जाए या युद्ध करे। पीएम ने बिना किसी शोर-शराबे के यह कदम उठाकर सभी दोस्तों और दुश्मनों को मंशा साफ कर दी है। अब कई देश पीएम के इस अंदाज का अनुसरण करना चाहेंगे।

यह भी पढ़ें: अचानक पाकिस्तान पहुंचे तो कभी सर्जिकल स्ट्राइक, पीएम मोदी के इन फैसलों ने चौंकाया
 
विज्ञापन

3 of 9
लद्दाख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीटीआई
एक इंच जमीन नहीं देने का संदेश: कमर आगा, चीन मामलों के विशेषज्ञ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी तैयारी के बाद लेह की यात्रा की है। यह दुनिया को संदेश देने के लिए काफी है। दुनिया को पता है कि माउंटेनिंग वार में भारत का कोई सानी नहीं है। अमेरिका की फौज भी पहाड़ों पर युद्ध का प्रशिक्षण लेने के लिए भारत आती है।

फिर जिस तरह से एलएसी पर भारी और मारक हथियार पहुंचाए गए, उससे भारत की तैयारियों का अंदाजा लगाया जा सकता है। जहां तक पीएम की इस यात्रा का संदेश है तो वह पूरी तरह से साफ है। पीएम ने इस यात्रा के माध्यम से चीन को संदेश दिया है कि भारत अब अपनी अखंडता और संप्रभुता से किसी भी सूरत में समझौता नहीं करेगा।

भारत अपनी एक इंच जमीन भी देने के लिए तैयार नहीं है। चाहे इसके लिए उसे कोई भी विकल्प क्यों ना आजमाना पड़े। प्रधानमंत्री की इस यात्रा को साहसिक के साथ पूरी दुनिया को नए भारत का संदेश देने के रूप में देखा जा सकता है।

4 of 9
लद्दाख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीटीआई
हर परिस्थिति का जवाब देने का संदेश :  मेजर जनरल एके सिवाच
प्रधानमंत्री की लेह यात्रा के जरिए चीन को दो टूक संदेश दे दिया गया है। इस यात्रा से साफ हो गया है कि एलएसी पर भारत का भावी रुख जैसे को तैसा के अंदाज में जवाब देने का होगा। इस यात्रा से यह भी संदेश गया है कि भारत अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है।

भारत हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार है। मेरी समझ से प्रधानमंत्री ने रक्षा मंत्री की जगह खुद लेह जाने का फैसला इसी आशय का संदेश देने के लिए किया। बीते दो महीने से जारी तनाव और चीन की वादाखिलाफी का दौर जारी रहने के कारण चीन को सीधे और सख्त संदेश की जरूरत थी।


 
विज्ञापन

5 of 9
लद्दाख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : प
पीएम की टिप्पणी सही मगर इंतजार कीजिए : विवेक काटजू, पूर्व राजनयिक
प्रधानमंत्री की लेह यात्रा के बड़े कूटनीतिक मायने हैं। उन्होंने सही कहा कि चीन विस्तारवादी नीति अपना रहा है। यह भी सही है कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में विस्तारवादी नीति ज्यादा देर नहीं चलने वाली। मगर हमें इंतजार करना होगा कि इस दौरे का चीन पर क्या असर पड़ता है। क्या चीन दबाव में आएगा?

यह सही है कि पीएम ने अपना संदेश सही तरीके से पहुंचाया है। चीन खुद को अमेरिका से ज्यादा शक्तिशाली देश मानने लगा है। जाहिर तौर पर उसके अहंकार को तोड़ने की जरूरत है। हालांकि हमें देखना होगा कि पीएम मोदी की इस यात्रा का चीन पर क्या असर पड़ता है।
विज्ञापन

6 of 9
लद्दाख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीटीआई
सेना का बढ़ाया मनोबल, चीन को दिया संदेश: शशांक, पूर्व विदेश सचिव
अपने फैसलों के जरिए हमेशा चौंकाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक बिना किसी पूर्व कार्यक्रम के लेह पहुंचकर सबको चौंका दिया। लेह की अचानक यात्रा से प्रधानमंत्री ने महज चीन और अपने पड़ोसियों को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को बड़ा कूटनीतिक संदेश दिया है।

चीन को दिया गया संदेश शीशे की तरफ साफ है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत अब दबाव में तो नहीं ही आएगा। जरूरत पड़ी तो दूसरे सभी उपलब्ध विकल्पों को अपनाने से नहीं हिचकेगा। इसका दूसरा पक्ष सेना के मनोबल से जुड़ा है। जाहिर तौर पर इस दौरे से न सिर्फ सेना का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि प्रधानमंत्री जमीनी स्तर पर सेनाओं की परेशानी का आकलन कर सकेंगे।

हमें यह देखना होगा कि प्रधानमंत्री की लेह यात्रा की टाइमिंग (समय) क्या है? पूर्वी लद्दाख से जुड़े एलएसी पर जारी तनाव, गलवां घाटी में खूनी झड़प के बाद भारत और चीन के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत हो रही है।

इस बातचीत के दौरान चीन तनाव कम करने और सेनाओं को पीछे हटाने पर सहमत तो हो रहा है, मगर जमीनी स्तर पर उसकी ओर से जताई गई सहमति का पालन होता नहीं दिखता। खासतौर पर गलवां घाटी में खूनी झड़प के बीच प्रधानमंत्री ने चीन की मजबूत कूटनीतिक-आर्थिक घेराबंदी की है। इस तनाव के बीच प्रधानमंत्री दुनिया में चीन के विरोधी ताकतवर देशों को भारत के साथ खड़ा करने में सफल रहे हैं।

यह भी पढ़ें: कूटनीति से नहीं माना चीन तो दूसरे विकल्प भी खुले, मोदी की लद्दाख यात्रा चार सूत्रीय रणनीति का हिस्सा
विज्ञापन

7 of 9
लद्दाख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : ANI
1962 की तरह रूस इस बार तटस्थ नहीं
1962 की तरह रूस की भूमिका इस बार तटस्थ नहीं है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चीन से जारी तनाव के बावजूद रूस ने भारत को जल्द से जल्द मिसाइल रक्षा प्रणाली एस-400 की आपूर्ति की बात कही है।

फ्रांस खुलकर भारत के साथ है और आधुनिकतम लड़ाकू विमान राफेल की खेप जल्द से जल्द देना सुनिश्चित कर रहा है। जापान, जर्मनी, अमेरिका जैसे देश भारत के पक्ष में खड़े होकर इस तनाव के लिए सीधे चीन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

भारत को घेरने वाला नेपाल घरेलू मोर्चे पर खुद बुरी तरह उलझ गया है। कह सकते हैं कि लेह जाकर चीन को सीधा और कड़ा संदेश देने से पहले प्रधानमंत्री ने चीन की सफल कूटनीतिक घेराबंदी की है। इसके बाद चीन को आर्थिक मोर्चे पर चोट देने की रणनीति के तहत देश में कई अहम फैसले लिए गए हैं।

8 of 9
गलवां झड़प में घायल हुए सैनिक से बात करते प्रधानमंत्री - फोटो : पीटीआई
प्रधानमंत्री की लेह यात्रा से क्या हासिल होगा? 
सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री की लेह यात्रा से क्या हासिल होगा? और यह भी कि इसके क्या कूटनीतिक निहितार्थ हैं? इसकी पहली बानगी इस यात्रा से चीन की सामने आई तिलमिलाहट से जाहिर हुई है। सबकुछ पूरी तरह साफ है।

इस दौरे के साथ ही भारत ने चीन के समक्ष अपना रुख साफ कर दिया है। भारत ने विवाद सुलझाने की गेंद चीन के पाले में डाल दी है। वह भी इस संदेश के साथ कि विवाद सुलझाने के लिए भारत अपने रुख से रत्तीभर भी पीछे नहीं हटेगा।

अर्थात विवाद खड़ा करने वाला चीन खुद विवाद को खत्म करने के लिए एलएसी पर पूर्व की स्थिति बहाल करे। ऐसा नहीं हुआ तो भारत की चीन के खिलाफ आक्रामक मुहिम कम होने के बदले भविष्य में और बढ़ेगी। साथ ही यह भी कि स्थिति का सामना करने के लिए भारत हर संभव विकल्प को आजमाने में परहेज नहीं करेगा।
विज्ञापन

9 of 9
लद्दाख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीटीआई
चीन युद्ध की हिमाकत नहीं कर सकता ये दुनिया को पता है..
गलवां घाटी खूनी संघर्ष से पहले डोकलाम विवाद में प्रधानमंत्री ने चीन को अहसास कराया था कि वर्तमान भारत 1962 वाला भारत नहीं है। प्रधानमंत्री चीन को फिर से इसका अहसास कराना चाहते हैं। दुनिया को पता है कि खुद घरेलू मोर्चे पर आर्थिक सहित कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा चीन युद्ध की हिमाकत नहीं कर सकता।

कोरोना महामारी के कारण वैश्विक परिस्थितियां चीन के पक्ष में नहीं हैं। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री की लेह यात्रा सेना का मनोबल बढ़ाएगी। ऐसी परिस्थितियों में जब सीमा पर तनाव की स्थिति हो तब सेना को हौसला देने के लिए इस तरह के प्रयास जरूरी हैं। फिर प्रधानमंत्री सैन्य अधिकारियों-जवानों से सीधे मुखातिब होकर उनकी परेशानियों का आमने सामने अनुभव कर पाएंगे।

यह भी पढ़ें: भारत इस कीमत पर नहीं चाहता शांति, चीन के दुस्साहस को यूं देखते हैं विदेशी विशेषज्ञ
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें