भारत ने अपनी जैव विविधता की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय योजना को अपडेट किया है, जो कि कुन्मिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे के अनुरूप है। अपडेट की गई योजना को आगामी द्विवार्षिक संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (कॉप 16) में जारी किया जाएगा। यह सम्मेलन कोलंबिया के कैली शहर में 21 अक्तूबर से 1 नवंबर के बीच आयोजित होगा। अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी।
साल 1992 में जैव विविधता पर एक अंतरराष्ट्रीय समझौता सीबीडी (कन्वेंशन ऑन बायो डायवर्सिटी) अपनाया गया था, जिसका मकसद दुनिया की जैव विविधता की रक्षा करना है। इसके तहत, सभी देशों को अपनी जैव विविधता को सुरक्षित रखने और उसके संसाधनों का सही उपयोग करने के लिए एक राष्ट्रीय योजना बनानी होती है, जिसे राष्ट्रीय विविधिता रणनीति और क्रियान्वयन योजना (एनबीएसएपी) कहा जाता है।
भारत ने हाल ही में अपनी एनबीएसएपी को नए लक्ष्यों के अनुरूप अपडेट किया है, जो कुन्मिंग मॉन्ट्रियल ढांचे में तय हैं। यह ढांचा 2022 में कनाडा के मॉन्ट्रियल में हुए जैव विविधता सम्मेलन (कॉप 15) में अपनाया गया था।कुन्मिंग-मॉन्ट्रियल ढांचे का एक मुख्य लक्ष्य है कि 2030 तक विश्व की भूमि और महासागरों का कम से कम तीस फीसदी भाग सुरक्षित किया जाए।
इस ढांचे का यह भी मकसद है कि नष्ट हुए पारिस्थितिक तंत्रों, जैसे कि जंगल, आद्रभूमि और नदियों को 2030 तक पुनर्स्थापित किया जाए, ताकि वे साफ पानी और हवा जैसी जरूरी सुविधाएं प्रदान करते रहें। इसके साथ ही, यह ढांचा प्लास्टिक और रासायिक प्रदूषण को कम करने की कोशिथ करता है, जो वन्यजीवों और पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके तहत यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि स्थानीय समुदाय, खासकर आदिवासी लोग, जो जैव विविधता की रक्षा करते हैं और उस पर निर्भर हैं, फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल किए जाएं।
हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि तीस फीसदी भूमि और महासागरों के संरक्षण का उद्देश्य एक वैश्विक लक्ष्य है, न कि केवल एक देश का लक्ष्य। उनका कहना है कि इन लक्ष्यों को हासिल करने की जिम्मेदारी विकासशील देशों पर अधिक नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने और जलवायु परिवर्तन में अधिक योगदान दिया है, इसलिए उनको संरक्षण के प्रयासों और वित्त पोषण के मामलों की जिम्मेदारी उठानी चाहिए।