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Manmohan Singh: छह बार राज्यसभा से संसद में आये,बतौर वित्त मंत्री आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, ऐसा रहा सफर

Thu, 26 Dec 2024 10:45 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अपने मृदुभाषी और विनम्र स्वभाव के लिए जाने जाने वाले मनमोहन सिंह अक्तूबर 1991 में पहली बार राज्यसभा के सदस्य बने थे। इसके बाद वे लगातार छह बार उच्च सदन के सदस्य बने। वे कभी लोकसभा से नहीं आ सके।
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Manmohan Singh - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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पूर्व प्रधानमंत्री और दिग्गज अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह का गुरुवार रात 92 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्हें आज शाम बेहोश होने के बाद एम्स में भर्ती कराया गया था। भारत को उदारीकरण की राह दिखाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री का अर्थशास्त्री से लेकर पीएम तक का सफर बेहद शानदार रहा। उनके कार्यकाल में भारत ने कई उपलब्धियां हासिल कीं। 

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अपने मृदुभाषी और विनम्र स्वभाव के लिए जाने जाने वाले मनमोहन सिंह अक्तूबर 1991 में पहली बार राज्यसभा के सदस्य बने थे। इसके बाद वे लगातार छह बार उच्च सदन के सदस्य बने। वे कभी लोकसभा से नहीं आ सके। हालांकि 1999 में मनमोहन सिंह ने दक्षिण दिल्ली लोकसभा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा जिसमें वे भाजपा के विजय कुमार मल्होत्रा से हार गए थे। ये उनके जीवन का पहला और आखिरी लोकसभा चुनाव था। एक अक्तूबर, 1991 से 14 जून, 2019 तक वे लगातार पांच बार असम से राज्यसभा सदस्य रहे। 2019 में दो महीने के अंतराल के बाद वे राजस्थान से फिर राज्यसभा आए। वे 1991 से 1996 तक नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री रहे। बाद में 2004 से 2014 तक देश के प्रधानमंत्री भी रहे थे। इतना ही नहीं, 21 मार्च, 1998 से 21 मई, 2004 तक वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे। इसके बाद जब वे 2004 और 2014 के बीच प्रधानमंत्री थे, तब भी वह सदन के नेता थे।

इतने पद पर रह चुके हैं मनमोहन सिंह
26 सितंबर, 1932 को गाह गांव (पाकिस्तान का पंजाब प्रांत) में जन्मे सिंह ने क्रमशः 1952 और 1954 में पंजाब विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक और मास्टर डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 1957 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अपना इकोनॉमिक ट्रिपोस पूरा किया। फिर 1962 में वो ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डी.फिल किया। डॉक्टर सिंह विदेश व्यापार मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार, वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार और वित्त मंत्रालय के सचिव के रूप में कार्य किया। उन्होंने 1976 से 1980 तक भारतीय रिजर्व बैंक के निदेशक और फिर 1982 से 1985 तक गवर्नर के रूप में कार्य किया। वह योजना आयोग के उपाध्यक्ष और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 
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जब बतौर वित्त मंत्री की आर्थिक सुधारों की शुरुआत
देश के लिए डॉक्टर मनमोहन सिंह का सबसे बड़ा योगदान वित्त मंत्री के रूप में आर्थिक सुधारों की शुरुआत करना है। वर्ष 1991 में भारत का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संतुलन निराशाजनक घाटे में था। 1991 में इसका विदेशी कर्ज 35 बिलियन डॉलर से दोगुना होकर 69 बिलियन डॉलर हो गया था। भारत के पास पैसा और समय दोनों बहुत कम थे। तब हमारे चालू खाते के घाटे से निपटने के लिए एक आपातकालीन उपाय के रूप में, भारतीय रिज़र्व बैंक ने चालू खाते के घाटे को कम करने के लिए लगभग 400 मिलियन डॉलर जुटाने के लिए बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास अपनी सोने की हिस्सेदारी गिरवी रख दी।

इसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधारों की एक श्रृंखला डॉक्टर सिंह ने शुरू की जिसे उन्होंने "मानवीय चेहरे के साथ सुधार" कहा। औद्योगिक नीति, 1991 की शुरुआत के साथ लाइसेंस राज को खत्म करने की प्रस्तावना लिखी गई। इस संकट से उबरने के लिए मनमोहन सिंह ने इस बजट में भारतीय बाजार को विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिए।

इस कदम से सरकार को चंद महीनों में ही पहली सफलता मिली, जब दिसंबर 1991 में भारत सरकार विदेशों में गिरवी रखा सोना छुडवा कर आरबीआई को सौंपने में कामयाब रही। देश में ग्लोबलाइजेशन की शुरुआत 1991 में सिंह ने ही की थी। उन्होंने भारत को दुनिया के बाजार के लिए तो खोला ही, बल्कि निर्यात और आयात के नियमों को भी सरल बनाया। डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर आर्थिक सुधारों की कवायद की और उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की ओवरहॉलिंग में महत्वपूर्ण योगदान दिया है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।

राज्यसभा से विदाई के मौके पर पीएम मोदी ने की थी पूर्व पीएम की तारीफ
राज्यसभा में सेवानिवृत्त सदस्यों की विदाई के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा के सदस्य के रूप में मनमोहसिंह की भूमिका की सराहना की थी। उन्होंने कहा था कि उनके योगदान को कभी नहीं भुलाया जाएगा। पीएम मोदी ने यह भी कहा था कि कई बार यह देखा गया था कि वह व्हीलचेयर पर रहते हुए वोट देने आए और उन्होंने लोकतंत्र को मजबूत बनाया। 
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