वाइस एयर मार्शल (पूर्व) एनबी सिंह कहते हैं कि तालिबान कुछ तो बदला है। वह कतर में होने वाली बैठक से लेकर काबुल, कंधार तक पहले की तुलना में समझदारी दिखा रहे हैं। उन पर भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव है। रूस, चीन जैसे देश भी नहीं चाहेंगे कि तालिबान पुरानी रूपरेखा में बना रहे। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी भी उसकी पुरानी रूपरेखा का समर्थन नहीं करेंगे। भारत को कदापि मंजूर नहीं होगा। जबकि अफगानिस्तान में स्थितियों को सामान्य स्तर पर लाने के लिए तालिबान के नेताओं को इन सभी देशों के सहयोग की आवश्यकता पड़ेगी। इसलिए उन्हें काफी कुछ बदलना पड़ेगा। उनके रणनीतिकारों को पता है कि केवल एक कट्टर इस्लामिक स्टेट और आतंकवाद के रास्ते से आगे का रास्ता मुश्किल है। एयर मार्शल कहते हैं कि उनके विदेश में पढ़े लिखे और समझदार रणनीतिकार इसे समझ भी रहे हैं।
क्या भारत तालिबान के नेताओं के संपर्क में है?
कतर में भारतीय राजनयिक दीपक मित्तल और तालिबान के प्रतिनिधि शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई की मुलाकात के बाद इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है। हालांकि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने इसके बहुत निहितार्थ न निकालने की सलाह दी है और इसे एक बैठकभर बताया है, लेकिन कूटनीति के जानकारों का कहना है कि बात इतनी भर भी नहीं है। स्तानिकजई को भारत ने अपनी चिंताएं बताई हैं और इसमें तालिबान का सहयोग मांगा है। इसी तरह से तालिबान के प्रतिनिधि ने भी कुछ अपनी बात रखी है। भारत ने पहले भी कहा है कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए संवेदनशील है और अफगानिस्तान पर करीब से नजर बनाए है। कूटनीति की भाषा में इसका अर्थ कुछ स्टेक होल्डर्स के साथ संपर्क बनाने से होता है। ताकि जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके।