हाल में ही I.N.D.I गठबंधन से अलग होकर सियासी मैदान में अकेले ताल ठोंकने वाली पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि कांग्रेस तो अपने सियासी जनाधार को बढ़ाने के लिए न्याय यात्रा निकाल रही है। लेकिन गठबंधन में शामिल अन्य सियासी दलों के लिए मझधार की स्थिति पैदा हो गई। उनका कहना है कि अगर वह अलग होकर चुनावी मैदान में ताल नहीं ठोंकते तो क्या करते। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी ने अपना लंबा वक्त गठबंधन की रणनीति को मजबूत करने की बजाय चुनाव में लगाया। उनका कहना है कि राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस को विधानसभा चुनाव पर पूरा फोकस करना जरूरी भी था, लेकिन जो दल उन विधानसभा चुनाव में हिस्सेदारी नहीं कर रहे थे, वह किस बात के लिए इंतजार करते रहे। सिर्फ इसलिए कि इन विधानसभा चुनावों से कांग्रेस खाली हो, तो गठबंधन पर ध्यान दें। यह परिस्थितियां गठबंधन में शामिल छोटे-छोटे दलों के लिए बड़ी असहज हो गई।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार रूपिंदर चहल कहते हैं कि कई जगह पर सियासी गणित तालमेल नहीं खा रही थी इसलिए गठबंधन कमजोर हुआ। इसके अलावा वह कहते हैं कि आपसी गठबंधन के बाद भी सियासी दलों में सामंजस्य न के बराबर दिखा। गठबंधन में शामिल सियासी दल से जुड़े एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि पटना से लेकर मुंबई और बेंगलुरु से लेकर दिल्ली में गठबंधन की बैठकों में जिन मुद्दों पर सियासी रणनीति बनाने की बात हुई, वह असल में कभी गंभीरता से आगे बढ़े ही नहीं। वह कहते हैं कि ऐसा नहीं है इसको लेकर प्रमुख घटक दल कांग्रेस के साथ बातचीत नहीं हुई। लेकिन जिन मुद्दों पर चर्चा होनी थी, उसे छोड़कर सिर्फ बैठकें होती रहीं। उनका मानना है कि अगर एक महत्वपूर्ण बिंदु यानि सीट शेयरिंग पर शुरुआती दौर में ही फैसला हो जाता, तो संभव है गठबंधन की मजबूती बरकरार रहती।