तालिबान ने एक बार फिर अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है। तालिबान के आने से जहां अफगानी नागरिकों में डर और भय का माहौल है वहीं तालिबान का आना भारत के लिए भी चिंता की बात है। अमर उजाला डिजिटल ने तीन अलग-अलग रक्षा विशेषज्ञों से बात करके यह जानने की कोशिश की अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने से भारत पर इसका क्या असर होगा? भारत को कितना सजग और सतर्क रहने की जरूरत है। इससे अमेरिका की छवि को कितना नुकसान पहुंचा है और चीन-पाकिस्तान को इसमें अपना क्या फायदा नजर आ रहा है।
आइए तीनों विशेषज्ञों की मदद से इस पूरे विषय को समझते हैं।
मेजर जनरल एस वी पी सिंह (सेवानिवृत्त)
1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में जाने के बाद ही तालिबान का वहां जन्म हुआ। उसके बाद अमेरिका 2001 में अफगानिस्तान आया। इसके जरिए वह मध्य एशिया में अपना पावर बेस बनाना चाहता था। लेकिन तालिबानियों को लेकर उसे वहां की जमीनी हालत का अंदाजा ही नहीं लगा। अफगानिस्तान का यह इतिहास रहा है कि जो भी अफगानिस्तान गया वो उनके हाथ पिटा। पहले रूस पिटा अब अमेरिका को मुंह की खानी पड़ी। अमेरिका ने इस मुद्दे पर खुद को कमजोर साबित किया है। वैसे अमेरिका के बाद अब चीन की नजर अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर है।
इसलिए हमें भी अफगानिस्तान को लेकर अपनी विदेश नीति पर शुरू से काम करने की जरूरत थी। कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान के मामले में हमारी विदेश नीति बहुत सफल नहीं रही। लेकिन हमने एक अच्छा काम किया कि हमने अपने सैनिक अफगानिस्तान में नहीं भेजे। भारत पहले से ही पाकिस्तान और चीन से अपनी सीमाओं को लेकर चिंता में रहता है। ऐसे में यदि हमने अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजी होती तो एक नई मुसीबत मोल ले सकते थे।
हालांकि भारत अफगानी आर्मी को ट्रेनिंग देता रहा है। उनके सैनिकों का यहां के अस्पतालों में इलाज होता रहे ताकि पाकिस्तान के खिलाफ काउंटर बैलेंस बना रहे। भारत ने अफगानिस्तान में कई सामाजिक और विकास कार्य किए। लेकिन अब अफगानिस्तान तालिबान के कब्जे में है। वहां शरीअत कानून लागू होगा, जिसमें महिलाओं और बच्चों के अधिकार छीने जाने का खतरा है। जो भारत की नीतियों के खिलाफ है।
भारत पर असर क्या:
तालिबान का इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के साथ संबंध बना रहा है और आगे भी रहेगा, जो हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा है। वे पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के साथ मिलकर एलओसी, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सियाचीन जैसे क्षेत्र में अशांति पैदा कर सकते हैं। चीन-पाकिस्तान मिलकर भारत के खिलाफ तालिबान पर कोई न कोई कार्रवाई करने के लिए दबाव बना सकता है।
जब से अमेरिका अफगानिस्तान गया उसी समय से भारत को सतर्क हो जाना चाहिए था। लेकिन अब भी देर नहीं हुई है, इसलिए अब भारत की विदेश नीति साफ करनी होगी। दोहा में तालिबान की अमेरिका से बाचतीत होती रही है। हाल में ही दोहा में जर्मनी, नार्वे, तर्की से बातचीत हुई, थी भारत को भी मौका मिला, लेकिन ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी गई। इसलिए अब भारत को भी तालिबान के साथ वार्ता करनी चाहिए। इसके लिए पॉलिसी फ्रेमवर्क तैयार करना चाहिए।
अफगानिस्तान की सवा तीन करोड़ की आबादी में पश्तून, उज्बेक और ताजिक जातियां है। पश्तून की आबादी 40 फीसदी से ज्यादा है। तालिबान की असली ताकत यही जाति है। इनकी फितरत आपस में लड़ने की रही है। इसलिए हम ‘वेट एंड वाच’ पॉलिसी को भी अपना सकते हैं। इस समय तालिबान में एकता है लेकिन सत्ता हस्तांतरण के समय इनमें फूट पड़ने की आशंका है।
जल्दी ही कई देश तालिबान को मान्यता दे देंगे। चीन, पाकिस्तान की कोशिश होगी कि वे भारत को अफगानिस्तान से अलग-थलग रखें। इसलिए यह भारत पर निर्भर करता है कि वह किस तरह अब अपना पक्ष रखता है। भारत के सामने एक बड़ी चुनौती अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में आने वाले शरणार्थी को लेकर भी होगी। भारत सरकार इस मुद्दे को कैसे संभालेगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।