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विशेषज्ञों की राय में: अफगानिस्तान पर तालिबानियों के कब्जे से भारत को क्या नुकसान, चीन-पाकिस्तान को क्या फायदा

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Mon, 16 Aug 2021 08:06 PM IST

सार

लगभग पूरा अफगानिस्तान अब तालिबानियों के कब्जे में है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की एक गलती अफगानी नागरिकों के ही लिए ही नहीं बल्कि भारत के लिए भी भारी पड़ सकती है। इससे जहां भारत के लिए पश्चिमी पड़ोसी देशों में नई चुनौतियां शुरू होंगी। वहीं चीन और पाकिस्तान को इसका फायदा मिल सकता है। 
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रक्षा विशेषज्ञ - फोटो : Amar Ujala
तालिबान ने एक बार फिर अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है। तालिबान के आने से जहां अफगानी नागरिकों में डर और भय का माहौल है वहीं तालिबान का आना भारत के लिए भी चिंता की बात है। अमर उजाला डिजिटल ने तीन अलग-अलग रक्षा विशेषज्ञों से बात करके यह जानने की कोशिश की अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने से भारत पर इसका क्या असर होगा? भारत को कितना सजग और सतर्क रहने की जरूरत है। इससे अमेरिका की छवि को कितना नुकसान पहुंचा है और चीन-पाकिस्तान को इसमें अपना क्या फायदा नजर आ रहा है। 

आइए तीनों विशेषज्ञों की मदद से इस पूरे विषय को समझते हैं। 

मेजर जनरल एस वी पी सिंह (सेवानिवृत्त)

1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में जाने के बाद ही तालिबान का वहां जन्म हुआ। उसके बाद अमेरिका 2001 में अफगानिस्तान आया। इसके जरिए वह मध्य एशिया में अपना पावर बेस बनाना चाहता था। लेकिन तालिबानियों को लेकर उसे वहां की जमीनी हालत का अंदाजा ही नहीं लगा।  अफगानिस्तान का यह इतिहास रहा है कि जो भी अफगानिस्तान गया वो उनके हाथ पिटा। पहले रूस पिटा अब अमेरिका को मुंह की खानी पड़ी। अमेरिका ने इस मुद्दे पर खुद को कमजोर साबित किया है। वैसे अमेरिका के बाद अब चीन की नजर अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर है। 


इसलिए हमें भी अफगानिस्तान को लेकर अपनी विदेश नीति पर शुरू से काम करने की जरूरत थी। कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान के मामले में हमारी विदेश नीति बहुत सफल नहीं रही। लेकिन हमने एक अच्छा काम किया कि हमने अपने सैनिक अफगानिस्तान में नहीं भेजे। भारत पहले से ही पाकिस्तान और चीन से अपनी सीमाओं को लेकर चिंता में रहता है। ऐसे में यदि हमने अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजी होती तो एक नई मुसीबत मोल ले सकते थे।

हालांकि भारत अफगानी आर्मी को ट्रेनिंग देता रहा है। उनके सैनिकों का यहां के अस्पतालों में इलाज होता रहे ताकि पाकिस्तान के खिलाफ काउंटर बैलेंस बना रहे। भारत ने अफगानिस्तान में कई सामाजिक और विकास कार्य किए। लेकिन अब अफगानिस्तान तालिबान के कब्जे में है। वहां शरीअत कानून लागू होगा, जिसमें महिलाओं और बच्चों के अधिकार छीने जाने का खतरा है। जो भारत की नीतियों के खिलाफ है। 

भारत पर असर क्या:
तालिबान का इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के साथ संबंध बना रहा है और आगे भी रहेगा, जो हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा है। वे पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के साथ मिलकर एलओसी, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सियाचीन जैसे क्षेत्र में अशांति पैदा कर सकते हैं। चीन-पाकिस्तान मिलकर भारत के खिलाफ तालिबान पर कोई न कोई कार्रवाई करने के लिए दबाव बना सकता है। 

जब से अमेरिका अफगानिस्तान गया उसी समय से भारत को सतर्क हो जाना चाहिए था। लेकिन अब भी देर नहीं हुई है, इसलिए अब भारत की विदेश नीति साफ करनी होगी। दोहा में तालिबान की अमेरिका से बाचतीत होती रही है। हाल में ही दोहा में जर्मनी, नार्वे, तर्की से बातचीत हुई, थी भारत को भी मौका मिला, लेकिन ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी गई। इसलिए अब भारत को भी तालिबान के साथ वार्ता करनी चाहिए। इसके लिए पॉलिसी फ्रेमवर्क तैयार करना चाहिए।
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अफगानिस्तान की सवा तीन करोड़ की आबादी में पश्तून, उज्बेक और ताजिक जातियां है। पश्तून की आबादी 40 फीसदी से ज्यादा है। तालिबान की असली ताकत यही जाति है। इनकी फितरत आपस में लड़ने की रही है। इसलिए हम ‘वेट एंड वाच’ पॉलिसी को भी अपना सकते हैं। इस समय तालिबान में एकता है लेकिन सत्ता हस्तांतरण के समय इनमें फूट पड़ने की आशंका है। 

जल्दी ही कई देश तालिबान को मान्यता दे देंगे। चीन, पाकिस्तान की कोशिश होगी कि वे भारत को अफगानिस्तान से अलग-थलग रखें।  इसलिए यह भारत पर निर्भर करता है कि वह किस तरह अब अपना पक्ष रखता है।  भारत के सामने एक बड़ी चुनौती अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में  आने वाले शरणार्थी को लेकर भी होगी। भारत सरकार इस मुद्दे को कैसे संभालेगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। 
 


 
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रक्षा विशेषज्ञ - फोटो : Amar Ujala
तालिबान ने एक बार फिर अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है। तालिबान के आने से जहां अफगानी नागरिकों में डर और भय का माहौल है वहीं तालिबान का आना भारत के लिए भी चिंता की बात है। अमर उजाला डिजिटल ने तीन अलग-अलग रक्षा विशेषज्ञों से बात करके यह जानने की कोशिश की अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने से भारत पर इसका क्या असर होगा? भारत को कितना सजग और सतर्क रहने की जरूरत है। इससे अमेरिका की छवि को कितना नुकसान पहुंचा है और चीन-पाकिस्तान को इसमें अपना क्या फायदा नजर आ रहा है। 

आइए तीनों विशेषज्ञों की मदद से इस पूरे विषय को समझते हैं। 

मेजर जनरल एस वी पी सिंह (सेवानिवृत्त)

1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में जाने के बाद ही तालिबान का वहां जन्म हुआ। उसके बाद अमेरिका 2001 में अफगानिस्तान आया। इसके जरिए वह मध्य एशिया में अपना पावर बेस बनाना चाहता था। लेकिन तालिबानियों को लेकर उसे वहां की जमीनी हालत का अंदाजा ही नहीं लगा।  अफगानिस्तान का यह इतिहास रहा है कि जो भी अफगानिस्तान गया वो उनके हाथ पिटा। पहले रूस पिटा अब अमेरिका को मुंह की खानी पड़ी। अमेरिका ने इस मुद्दे पर खुद को कमजोर साबित किया है। वैसे अमेरिका के बाद अब चीन की नजर अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर है। 

इसलिए हमें भी अफगानिस्तान को लेकर अपनी विदेश नीति पर शुरू से काम करने की जरूरत थी। कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान के मामले में हमारी विदेश नीति बहुत सफल नहीं रही। लेकिन हमने एक अच्छा काम किया कि हमने अपने सैनिक अफगानिस्तान में नहीं भेजे। भारत पहले से ही पाकिस्तान और चीन से अपनी सीमाओं को लेकर चिंता में रहता है। ऐसे में यदि हमने अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजी होती तो एक नई मुसीबत मोल ले सकते थे।

हालांकि भारत अफगानी आर्मी को ट्रेनिंग देता रहा है। उनके सैनिकों का यहां के अस्पतालों में इलाज होता रहे ताकि पाकिस्तान के खिलाफ काउंटर बैलेंस बना रहे। भारत ने अफगानिस्तान में कई सामाजिक और विकास कार्य किए। लेकिन अब अफगानिस्तान तालिबान के कब्जे में है। वहां शरीअत कानून लागू होगा, जिसमें महिलाओं और बच्चों के अधिकार छीने जाने का खतरा है। जो भारत की नीतियों के खिलाफ है। 

भारत पर असर क्या:
तालिबान का इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के साथ संबंध बना रहा है और आगे भी रहेगा, जो हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा है। वे पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के साथ मिलकर एलओसी, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सियाचीन जैसे क्षेत्र में अशांति पैदा कर सकते हैं। चीन-पाकिस्तान मिलकर भारत के खिलाफ तालिबान पर कोई न कोई कार्रवाई करने के लिए दबाव बना सकता है। 

जब से अमेरिका अफगानिस्तान गया उसी समय से भारत को सतर्क हो जाना चाहिए था। लेकिन अब भी देर नहीं हुई है, इसलिए अब भारत की विदेश नीति साफ करनी होगी। दोहा में तालिबान की अमेरिका से बाचतीत होती रही है। हाल में ही दोहा में जर्मनी, नार्वे, तर्की से बातचीत हुई, थी भारत को भी मौका मिला, लेकिन ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी गई। इसलिए अब भारत को भी तालिबान के साथ वार्ता करनी चाहिए। इसके लिए पॉलिसी फ्रेमवर्क तैयार करना चाहिए।

अफगानिस्तान की सवा तीन करोड़ की आबादी में पश्तून, उज्बेक और ताजिक जातियां है। पश्तून की आबादी 40 फीसदी से ज्यादा है। तालिबान की असली ताकत यही जाति है। इनकी फितरत आपस में लड़ने की रही है। इसलिए हम ‘वेट एंड वाच’ पॉलिसी को भी अपना सकते हैं। इस समय तालिबान में एकता है लेकिन सत्ता हस्तांतरण के समय इनमें फूट पड़ने की आशंका है। 

जल्दी ही कई देश तालिबान को मान्यता दे देंगे। चीन, पाकिस्तान की कोशिश होगी कि वे भारत को अफगानिस्तान से अलग-थलग रखें।  इसलिए यह भारत पर निर्भर करता है कि वह किस तरह अब अपना पक्ष रखता है।  भारत के सामने एक बड़ी चुनौती अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में  आने वाले शरणार्थी को लेकर भी होगी। भारत सरकार इस मुद्दे को कैसे संभालेगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। 
 


 

लेफ्टिनेट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त)
अफगानिस्तान में जो कुछ हुआ उसे हम दुनिया की बड़ी त्रासदियों में एक मान सकते हैं। यहां अमेरिका की विदेश नीति और उसकी खुफिया एजेंसियां पूरी तरह फेल हो गई है। अमेरिका असल में तालिबानियों के नापाक इरादे को बिल्कुल नहीं भांप पाया और न ही उसकी ताकत का अंदाजा लगा पाया। अमेरिका ने उस समय अफगानिस्तान से अपना हाथ खींच लिया जब उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी। जैसे अस्सी के दशक में सोवियत संघ को यहां मुंह की खानी पड़ी थी, वैसे ही इस बार अमेरिका की यहां हार हुई है। लेकिन तालिबानी केवल हिंसा की भाषा समझते हैं, वे ऐसे लड़ाकू हैं जिनकी ट्रेनिंग ही कट्टरपंथी विचारधारा के बीच होती है। इसलिए इसका असर पूरी दुनिया में देखने को मिलेगा।

भारत पर असर क्या
तालिबान के कब्जे के बाद मध्य एशिया और दक्षिण एशिया पर इसका सबसे खराब असर पड़ेगा। इसकी चपेट में भारत भी आएगा। जो तालिबान हिंसा और आंतक के दम पर अफगानिस्तान पर हुकूमत करना चाहता है उसे 13 आतंकी संगठनों का साथ मिला हुआ है। पाकिस्तान ने उसकी मदद के लिए अपने लड़ाकू भेजे हैं, इसलिए पाकिस्तान अपने हक में भारत के खिलाफ उसका इस्तेमाल कर सकता है।  बेशक अफगानिस्तान के साथ भारत के रिश्ते अच्छे रहे, लेकिन पाकिस्तान की संगत में रहने के कारण तालिबानियों की ट्रेनिंग ‘हेट इंडिया’ की पृष्ठभूमि में ही हुई है। अफगानिस्तान में नई सरकार की जो रूपरेखा बन रही है उस पर तालिबान पूरी तरह से हावी होगा और पाकिस्तान इसे अपने लिए अच्छा मानेगा। वहां अब शरीया कानून लागू हो सकता है और कट्टपंथी ताकतों के सरकार में शामिल होने का फायदा पाकिस्तान भारत के खिलाफ उठाना चाहेगा।  

 
 

मेजर जनरल ए जे बी जैनी (सेवानिवृत्त)

जिस तरह से 20 साल तक अमेरिकी और नाटो सेना के रहते हुए भी तालिबानी और ताकतवर हो गए, उससे साफ है कि अब दुनिया की कोई ताकत उन्हें सत्ता से नहीं उखाड़ सकती। पहले सोवियत रूस ने दुनिया में अपनी किरकिरी कराई और अमेरिका ने। निश्चित तौर पर अब पाकिस्तान और चीन उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दे देंगे। यूनाइटेड नेशन में चीन के पास वीटो पावर है, वह तालिबान को मान्यता देने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकता है। इसमें चीन का अपना हित छुपा है क्योंकि अब पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, मध्य एशियाई देशों सहित भारत के पूर्व-पश्चिम क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा सकता है। 

भारत पर असर क्या
तालिबानियों के साथ पाकिस्तान की हमेशा सांठगांठ रही है। उसने हमेशा तालिबान को आसरा दिया है। हथियार से लेकर ट्रेनिंग तक में मदद की है। तालिबान से रिश्ता रखना उसके हित में है। तालिबानियों की मदद लेकर पाकिस्तान कश्मीर में और चीन भारत के सियाचीन में क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर सकता है। आने वाले कुछ समय में कश्मीर और सियाचीन में इन तीनों की मिलीभगत से नापाक हरकतें शुरू हो सकती हैं। चीन जो काम म्यांमार के जरिए करना चाहता था अब वह अफगानिस्तान के जरिए करना चाहेगा। यह भारत के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण है। हम अभी इस चुनौती को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। लेकिन आने वाले समय में हमें इसके दुष्परिणाम देखने को मिलेगें।

इसलिए बेहतर होगा भारत अब अपनी विदेश नीति पर एक बार फिर गौर करे। चीन, अमेरिका, रूस, ईरान जैसे कई देश खुलकर तालिबान से बात करने लगे, लेकिन हमारे नीति निर्माता इससे दूर रहे। भारत हमेशा ही तालिबान के आंतकी प्रवृति की निंदा करता रहा, ऐसे में उसके लिए मुश्किल भी है कि वह कैसे आतंकी संगठन से बातचीत करे। हालांकि अब भारत को तालिबान के साथ वार्ता करनी ही होगी और अपने क्षेत्र और संप्रभुता की रक्षा के लिए अपना पक्ष मजबूती से रखना होगा।
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