इस्लामिक देशों की शिनजियांग क्षेत्र को लेकर घोर चुप्पी यह दर्शाती है कि वे सब 'चीन' से डरते हैं। उससे शत्रुता मोल नहीं लेना चाहते। अल-कायदा हो, हक्कानी हो या तालिबान खान, इन सभी को चीन से पैसा भी चाहिए और मदद भी। लंबे समय के मद्देनजर भले ही चीन, पाकिस्तान के लिए नुकसानदायक साबित हो, लेकिन 'तालिबान खान' केवल 'आज' को देखकर चल रहा है। पूर्वी तुर्किस्तान की स्वतंत्रता बहाली के लिए ईस्ट तुर्किस्तान नेशनल अवेकनिंग मूवमेंट (ईटीएनएएम) की गतिविधियां अब अफगानिस्तान में बंद हो गई हैं। तालिबान का चीन से समझौता हुआ है कि अब ऐसे ट्रस्ट या संगठनों को अफगानिस्तान से जाना होगा। ईटीएनएएम से जुड़े सदस्यों को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा है। पूर्वी तुर्किस्तान की स्वतंत्रता बहाली के लिए यह संस्था लंबे समय से प्रयास कर रही है। उइगर और अन्य तुर्क लोगों के कथित जनसंहार को लेकर इस संस्था ने वैश्विक स्तर पर आवाज उठाई है। पाकिस्तान और दूसरे इस्लामिक देशों ने इस संस्था को सहयोग नहीं दिया। जब चीन का नाम आता है तो उनकी बोलती बंद हो जाती है।
रक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) बताते हैं, चीन मानवाधिकार उल्लंघन और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के उत्पीड़न, ऐसे आरोपों से इनकार करता है। सच्चाई यह है कि मुस्लिम देशों ने कभी चीन के सामने इस मसले को रखने की हिम्मत नहीं जुटाई। ब्रिटेन, अमरीका, फ्रांस और दूसरी वैश्विक ताकतें उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार को लेकर बड़ी सावधानी के साथ अपना पक्ष रखती हैं। बहुत सामान्य प्रतिबंध या आलोचना, इससे आगे बात नहीं बढ़ती। यहां पर चीन की आर्थिक और सामरिक ताकत एक बड़े पक्ष के तौर पर सामने आती है। चीन जहां चाहता है, भारी निवेश के जरिए छोटे देशों को अपने पक्ष में कर लेता है। अफगानिस्तान में वे सभी आतंकी संगठन, जिन्हें तालिबान के राज में हिस्सा मिला है, चीन के उइगर मुस्लिमों को लेकर मौन साधे हैं। वे जानते हैं कि आज दुनिया में चीन उनका सबसे बड़ा मददगार साबित हो सकता है। चीन ने मदद देने का सिलसिला शुरू भी कर दिया है। अधिकांश इस्लामिक देश न तो सैन्य मामले में और न ही आर्थिक पटल पर, चीन को टक्कर दे सकते हैं। दोगली नीति की इस राह पर चल रहे पाकिस्तान की सबसे ज्यादा निंदा की जाती है। इमरान खान चुप हैं, वह किसी भी सूरत में चीन को नाराज नहीं करना चाहता। जब तक इस्लामिक देशों की तरफ से उइगर मुस्लिमों के लिए आवाज नहीं उठेगी, तब तक पश्चिमी देश भी आलोचना करने के दायरे से बाहर नहीं आ सकेंगे।