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उइगर मुस्लिमों पर कहर ढा रहा 'चीन': 'बरादर-हक्कानी-तालिबान खान' सहित दूसरे इस्लामिक मुल्कों की बोलती बंद

सार

पूर्वी तुर्किस्तान की स्वतंत्रता बहाली के लिए ईस्ट तुर्किस्तान नेशनल अवेकनिंग मूवमेंट (ईटीएनएएम) की गतिविधियां अब अफगानिस्तान में बंद हो गई हैं। तालिबान का चीन से समझौता हुआ है कि अब ऐसे ट्रस्ट या संगठनों को अफगानिस्तान से जाना होगा। ईटीएनएएम से जुड़े सदस्यों को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा है...
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उइगर मुस्लिम - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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पाकिस्तान और तालिबान, ये दोनों आज दुनिया को यह बता रहे हैं कि वे इस्लाम के सबसे बड़े रक्षक हैं। अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने कहा था कि दुनिया में जहां भी मुस्लिमों पर अत्याचार होगा, हम उसके खिलाफ बोलेंगे। तालिबान के बिगड़े बोल 'कश्मीर' तक पहुंच गए थे, हालांकि दूसरे दिन तालिबानी प्रवक्ता ने अपनी बात सुधारी थी। 'उइगर' मुस्लिमों पर 'चीन' कहर ढा रहा है। डिटेंशन कैंपों में बंद लाखों 'उइगर' मुस्लिमों के साथ अमानवीय अत्याचार हो रहा है। इसके बावजूद 'बरादर-हक्कानी-तालिबान खान' सहित दूसरे इस्लामिक मुल्कों की बोलती बंद है। किसी की हिम्मत नहीं हो रही है कि चीन का 'शिनजियांग' क्षेत्र, जहां मुस्लिमों को कठोर यातनाएं दी जा रही हैं, उस पर सवाल कर सकें। अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सऊदी अरब या ईरान, मुसलमानों पर हो रहे जुल्म को लेकर चुप हैं। यहां तक कि 'ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रीज' संगठन भी मौन है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकार एवं रक्षा विशेषज्ञों का कहना है, यहां पर दो बातें हैं। पैसा और दुश्मनी, चीन के पास ये दोनों हैं। अधिकांश इस्लामिक देश, चीन के साथ या तो कारोबार में जुड़े हैं या उन्होंने चीन से आर्थिक मदद ली है। दूसरा, चीन की दुश्मनी है। दोगली नीति वाले कई इस्लामिक देश, चीन से सीधी शत्रुता लेने का जोखिम नहीं उठा सकते।

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रक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) का कहना है, चीन के सुदूर पश्चिम में स्थित शिनजियांग क्षेत्र में अनेक डिटेंशन कैंप बने हैं। समय-समय पर आने वाली मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं, वहां लाखों मुस्लिमों को रखा गया है। उइगर मुस्लिमों के साथ बलात्कार, अंग प्रत्यारोपण और कठोर यातनाएं, ये सब आम बात हो गई है। खुद को इस्लामिक देशों का 'चैंपियन' बताने वाला पाकिस्तान और उसके तालिबान खान यानी प्रधानमंत्री इमरान खान चुप हैं। उन्हें शिनजियांग क्षेत्र में मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार नजर नहीं आ रहे। अगर किसी अंतरराष्ट्रीय मंच से मुस्लिमों को दी जाने वाली कठोर यातनाओं की आवाज उसके कानों तक पहुंचती है तो तथाकथित चैंपियन अपने कान बंद कर लेता है। वहां के मुस्लिम नमाज अदा नहीं कर सकते। वे कोई त्योहार नहीं मना सकते। टॉर्चर कैंप में उनके अंग निकालकर चीनियों में ट्रांसप्लांट किए जा रहे हैं। चीन के सैनिकों पर बलात्कार के आरोप लगते रहते हैं।

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इस्लामिक देशों की शिनजियांग क्षेत्र को लेकर घोर चुप्पी यह दर्शाती है कि वे सब 'चीन' से डरते हैं। उससे शत्रुता मोल नहीं लेना चाहते। अल-कायदा हो, हक्कानी हो या तालिबान खान, इन सभी को चीन से पैसा भी चाहिए और मदद भी। लंबे समय के मद्देनजर भले ही चीन, पाकिस्तान के लिए नुकसानदायक साबित हो, लेकिन 'तालिबान खान' केवल 'आज' को देखकर चल रहा है। पूर्वी तुर्किस्तान की स्वतंत्रता बहाली के लिए ईस्ट तुर्किस्तान नेशनल अवेकनिंग मूवमेंट (ईटीएनएएम) की गतिविधियां अब अफगानिस्तान में बंद हो गई हैं। तालिबान का चीन से समझौता हुआ है कि अब ऐसे ट्रस्ट या संगठनों को अफगानिस्तान से जाना होगा। ईटीएनएएम से जुड़े सदस्यों को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा है। पूर्वी तुर्किस्तान की स्वतंत्रता बहाली के लिए यह संस्था लंबे समय से प्रयास कर रही है। उइगर और अन्य तुर्क लोगों के कथित जनसंहार को लेकर इस संस्था ने वैश्विक स्तर पर आवाज उठाई है। पाकिस्तान और दूसरे इस्लामिक देशों ने इस संस्था को सहयोग नहीं दिया। जब चीन का नाम आता है तो उनकी बोलती बंद हो जाती है।

रक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) बताते हैं, चीन मानवाधिकार उल्लंघन और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के उत्पीड़न, ऐसे आरोपों से इनकार करता है। सच्चाई यह है कि मुस्लिम देशों ने कभी चीन के सामने इस मसले को रखने की हिम्मत नहीं जुटाई। ब्रिटेन, अमरीका, फ्रांस और दूसरी वैश्विक ताकतें उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार को लेकर बड़ी सावधानी के साथ अपना पक्ष रखती हैं। बहुत सामान्य प्रतिबंध या आलोचना, इससे आगे बात नहीं बढ़ती। यहां पर चीन की आर्थिक और सामरिक ताकत एक बड़े पक्ष के तौर पर सामने आती है। चीन जहां चाहता है, भारी निवेश के जरिए छोटे देशों को अपने पक्ष में कर लेता है। अफगानिस्तान में वे सभी आतंकी संगठन, जिन्हें तालिबान के राज में हिस्सा मिला है, चीन के उइगर मुस्लिमों को लेकर मौन साधे हैं। वे जानते हैं कि आज दुनिया में चीन उनका सबसे बड़ा मददगार साबित हो सकता है। चीन ने मदद देने का सिलसिला शुरू भी कर दिया है। अधिकांश इस्लामिक देश न तो सैन्य मामले में और न ही आर्थिक पटल पर, चीन को टक्कर दे सकते हैं। दोगली नीति की इस राह पर चल रहे पाकिस्तान की सबसे ज्यादा निंदा की जाती है। इमरान खान चुप हैं, वह किसी भी सूरत में चीन को नाराज नहीं करना चाहता। जब तक इस्लामिक देशों की तरफ से उइगर मुस्लिमों के लिए आवाज नहीं उठेगी, तब तक पश्चिमी देश भी आलोचना करने के दायरे से बाहर नहीं आ सकेंगे। 
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