कैराना में कथित पलायन विवाद के जनक भाजपा सांसद हुकुम सिंह पहले भी एक बार उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ों के आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा और प्रदेश की तत्कालीन राजनाथ सिंह सरकार की किरकिरी करा चुके हैं।
बल्कि तब सिंह की अध्यक्षता में बनी समिति की रिपोर्ट के आधार पर करीब 380 करोड़ रुपए खर्च करके सिर्फ डेढ़ महीने में ही पूरे प्रदेश में पिछड़े वर्गों को लेकर अपनी जो रिपोर्ट दी थी उसके आधार पर राज्य सरकार ने पिछड़े वर्गों के आरक्षण में अति पिछड़े वर्गों और दलितों के लिए आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ हुकुम सिंह को तलब करके उन्हें अच्छी खासी नसीहत दी थी, बल्कि राज्य सरकार के उस अध्यादेश पर भी रोक लगाई थी।
इस कमेटी की रिपोर्ट के बाद पिछड़े वर्गों और दलितों के आरक्षण में अति पिछड़ों और अति दलितों के लिए अलग से कोटा तय करने का फैसला किया गया था।
गौरतलब है कि 15 सितंबर 2001 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन राजनाथ सिंह सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके राज्य में अति पिछड़ों और अति दलितों को आरक्षित श्रेणी में अलग से आरक्षण देने की घोषणा की। इसके लिए 28 सितंबर 2001 को तत्कालीन मंत्री हुकुम सिंह की अध्यक्षता में सामाजिक न्याय समिति गठित की गई। समिति ने आठ अक्टूबर 2001 को अपनी रिपोर्ट भी दे दी और राज्य सरकार ने अध्यादेश लाकर नई आरक्षण नीति लागू कर दी।
राज्य सरकार के इस फैसले को तत्कालीन भाजपा सरकार के मंत्री अशोक यादव ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। तीन जजों की संवैधानिक पीठ ने इस मामले की सुनवाई की और न सिर्फ अध्यादेश को रद्द किया बल्कि समिति के अध्यक्ष हुकुम सिंह को तलब करके उन्हें खासी नसीहत भी दी।
अशोक यादव के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने बंद कमरे में हुई सुनवाई के दौरान सिंह से पूछा कि 20 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में जातिगत सर्वेक्षण एक महीने में कैसे पूरा हो गया। यही नहीं अदालत ने समिति के गठन के औचित्य पर भी सवाल उठाया कि जब राज्य में पिछड़ा वर्ग आयोग है तो अलग से समिति के गठन की क्या जरूरत थी।
अशोक यादव के मुताबिक हुकुम सिंह की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही भाजपा विधानसभा चुनाव में इस नई आरक्षण व्यवस्था को मुद्दा बनाकर पिछड़ों और दलितों में विभाजन पैदा करना चाहती थी। लेकिन उसकी यह चाल उलटी पड़ी, जबकि तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे और जना कृष्णमूर्ति जैसे वरिष्ठ नेताओं ने इस कदम से असहमति जताई थी। यादव इसके बाद भाजपा और सरकार दोनों से बाहर हो गए। लेकिन उनके विरोध ने उत्तर प्रदेश में आरक्षण व्यवस्था में बदलाव नहीं होने दिया।