सुविख्यात बांग्ला कवि, आलोचक, शिक्षाविद् और पद्मभूषण शंख घोष का बुधवार (21 अप्रैल) को देहावसान हो गया। 89 वर्ष के घोष कुछ समय से अस्वस्थ थे। 14 अप्रैल को वह जीवनघाती कोविड-19 से संक्रमित हो गए थे और उनकी सेहत लगातार गिर रही थी।
अमर उजाला फाउंडेशन के शब्द सम्मान के तहत सर्वोच्च पुरस्कार आकाशदीप से सम्मानित शंख घोष चिकित्सकों की सलाह पर घर में आइसोलेशन में थे। इस बीच मंगलवार (20 अप्रैल) देर रात ऑक्सीजन स्तर काफी गिर गया। उन्हें ऑक्सीजन दी गई, लेकिन बुधवार सुबह साढ़े आठ बजे उनका देहांत हो गया।
1932 में चांदपुर (मौजूदा बांग्लादेश) के मनिंद्रकुमार घोष के घर जन्मे चित्तोप्रियो घोष ने अपना नाम शंख घोष रखा। उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से बांग्ला में स्नातक और कलकत्ता विश्वविद्यालय से एमए किया। फिर जादवपुर विश्वविद्यालय से जुड़े और 1992 में वहीं से सेवानिवृत्त हुए। पांच दशक की साहित्य सेवा की वजह से उन्हें शक्ति चट्टोपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय, बिनॉय मजूमदार और उत्पल कुमार के साथ 'आधुनिक बांग्ला साहित्य के पांडवों' में गिना जाता था। शंख घोष के साथ हिंदी के लिए आकाशदीप से सम्मानित लेखक-आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय भाषाओं का अनूठा शब्द चला गया।