लोकसभा चुनाव 2019 में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद नई दिल्ली के पार्टी कार्यालय के बाहर लोगों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित किया। इस संबोधन में उन्होंने कहा कि हम कभी दो भी हो गए तो भी अपने आदर्शों से विचलित नहीं हुए और आज दोबारा आ गए, दो से दोबारा आने तक इस यात्रा में अनेक उतार-चढ़ाव आए। दो थे तब भी निराश नहीं हुए, आज दोबारा आए हैं तो भी नम्रता को नहीं छोड़ेंगे, अपने संस्कारों को नहीं छोड़ेंगे।
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बता दें कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस वक्त विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। भाजपा के करीब 9 करोड़ कार्यकर्ता हैं। कभी दो सांसदों से सफर शुरू करने वाली पार्टी आज देश की सबसे अधिक सांसदों और विधायकों वाली पार्टी कैसे बनी ये जानना भी काफी दिलचस्प है।
श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की थी जनसंघ की स्थापना
श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 1951 में कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष राजनीति के जवाब में राष्ट्रवाद की विचारधारा वाले भारतीय जनसंघ की स्थापना की। जनसंघ ने समाजवादी और अन्य पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। 1951 से 1977 तक भारतीय जनसंघ के नाम से जाने वाला यह संगठन उग्र राष्ट्रवाद के लिए जाना जाता था।
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ऐसे बनी जनता पार्टी
भारतीय जनसंघ ने शुरूआत से ही कश्मीर, गौ रक्षा और परमिट-लाइसेंस-कोटा राज खत्म करने जैसे मुद्दे उठाए। वर्ष 1977 में आपातकाल के बाद भारतीय जनसंघ का अन्य दलों के साथ विलय हुआ और जनता पार्टी अस्तित्व में आई। देश में छठवां लोकसभा चुनाव 1977 में हुआ था।
इस चुनाव में पहली बार कांग्रेस को जन संघ मोर्चा से हार मिली। लोकसभा की सीटें 542 थीं और चार विपक्षी दल कांग्रेस (ओ), जनसंघ, भारतीय लोकदल और समाजवादी पार्टी ने जनता पार्टी के रूप में मिलकर चुनाव लड़ा। जनता पार्टी ने 330 सीटें जीतीं और कांग्रेस 154 सीटें ही जीत सकी।
जनता पार्टी से भारतीय जनता पार्टी बनने का वक्त
भारतीय जनता पार्टी का गठन 1980 में तब हुआ, जब देश में गठबंधन सरकार दो साल ही चल सकी। भारतीय राजनीति में समाजवादी और राष्ट्रवादी दो धड़े थे। समाजवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों का मिश्रण जनता पार्टी 1979 में बंट गई।
जनसंघ के दो बड़े नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी बनाने का फैसला किया। दिसंबर 1980 में मुंबई में भारतीय जनता पार्टी का पहला अधिवेशन हुआ। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी पहली बार 1984 के आम चुनाव में उतरी। हालांकि पार्टी को सिर्फ दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा।
मात्र 2 सीटों से 89 सीटों तक
भाजपा के लिए 1984 का चुनावी परिणाम निराशजनक रहा। तय किया गया कि अब कांग्रेस पर और हमलावर होंगे, इसके साथ ही जातिगत और धार्मिक आधार पर पार्टी को मजबूती देने की भी जरूरत थी। भाजपा ने बोफोर्स कांड से कांग्रेस पर निशाना साधा। वहीं साल 1989 के चुनाव में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल से तालमेल किया। इस चुनाव में भाजपा को 89 सीटें मिलीं और उसने वीपी सिंह सरकार को बाहर से समर्थन दिया।
राम मंदिर के लिए निकाली रथ यात्रा
सितंबर 1990 में लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन के समर्थन में अयोध्या के लिए रथ यात्रा निकाली। यात्रा की वजह से होने वाले दंगों के कारण बिहार सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। वहीं भाजपा ने विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वीपी सिंह सरकार के गिरने के बाद 1991 में चुनाव हुए। चुनावी नतीजों के बाद त्रिशंकु संसद बनी, जिसमें 232 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही और उसने अन्य दलों के साथ गठबंधन की सरकार बनाई। 120 सीटों के साथ भाजपा दूसरी बड़ी पार्टी बनी। जनता दल को सिर्फ 59 सीटें मिलीं।
पहली बार बनी भाजपा सरकार
1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे को कारसेवकों ने ढहा दिया। इसके बाद जैसे—तैसे 5 साल सरकार चलने के बाद 1996 में आम चुनाव हुए। इसमें भाजपा को जबरदस्त फायदा हुआ। हिंदू मतों का ध्रुवीकरण हुआ और उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी, केंद्र में भी पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में सरकार का गठन हुआ।
लोकसभा की कुल 543 लोकसभा सीट में से भाजपा को 161, कांग्रेस को 140 और जनता दल को 46 सीटें मिली थीं। राष्ट्रपति ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया, क्योंकि वे संसद में सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया थे। वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री पद संभाला, पर समर्थन ना जुटा पाने पर 13 दिन में ही उनकी सरकार गिर गई।
1998 में 13 महीनों के लिए बनी भाजपा की सरकार
भाजपा सरकार गिरने पर जनता दल के नेता एचडी देवेगौड़ा ने 1 जून 1996 को एक संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार बनाई। उनकी सरकार भी 18 महीने चली। इसके बाद इंद्र कुमार गुजराल ने तीसरे प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली। देश में 1998 में फिर लोकसभा चुनाव हुए। 10 मार्च, 1998 को 12वीं लोकसभा का गठन हुआ और वरिष्ठ भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले गठबंधन को शपथ दिलाई गई। यह सरकार भी सिर्फ 13 महीने चली क्योंकि गठबंधन की प्रमुख सहयोगी जयललिता की एआईएडीएमके के समर्थन वापस ले लिया। इस बार भाजपा के पास 182 सीटें थीं।
1999 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए)का गठन
साल 1999 में हुए चुनाव में भाजपा ने अन्य दलों के साथ मिलकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बनाया, जो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के खिलाफ खड़ा हुआ। इस बार भी अटल बिहारी वाजपेयी ही राजग के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। इस चुनाव में कारगिल युद्ध भाजपा के लिए अहम मुद्दा रहा। 6 अक्टूबर को आए नतीजों में राजग (एनडीए) को 298 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल 136 सीटों पर सिमट गए। वाजपेयी ने तीसरी बार 13 अक्टूबर को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
अटल-आडवाणी के बाद मोदी की एंट्री
वाजयेपी ने 5 साल सरकार चलाई। लेकिन इसके बाद साल 2004 और 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा को हार मिली। इसके बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जहां स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे, तो वहीं दूसरी तरफ आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सिर्फ सांसद बने रहने तक सीमित हो गए।
भाजपा को नई शुरुआत से मिली जीत
भाजपा के दिग्गज नेता अटल, आडवाणी और मुरली मनोहर का युग अब तक समाप्त हो गया था। वहीं गुजरात में तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी का नाम राष्ट्रीय राजनीति में आ चुका था। पार्टी को सत्ता में वापस लौटने के लिए नए चेहरे की दरकार थी। ऐसे में साल 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाकर पार्टी चुनावी मैदान में उतरी। साल 2014 के चुनाव में मोदी लहर चली और पार्टी को 282 सीटों पर सबसे बड़ी जीत मिली, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी।
साल 2019 में भाजपा को मिलीं 303 से ज्यादा सीटें
17वीं लोकसभा के लिए 2019 में हुए चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत प्रदान कर जनता ने देश की बागडोर फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में सौंपी है। भाजपा को 2014 से भी बड़ी और ऐतिहासिक जीत मिली है। ये पहली ऐसी गैर-कांग्रेसी पार्टी है जिसने लगातार दूसरी बार प्रचंड बहुमत से जीत हासिल की। 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में क्लीन स्वीप, अकेले दम पर 303 से अधिक सीटें मिलीं। भाजपा के राष्ट्रवाद की लहर पर सवार मतदाताओं ने जातिवाद, परिवारवाद और तुष्टीकरण की राजनीति को ध्वस्त कर दिया है।