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Karnataka: हाईकोर्ट ने पॉक्सो केस में घटाई आजीवन कारावास की सजा, कहा- अधिकतम दंड के लिए होनी चाहिए उचित वजह

Mon, 24 Jun 2024 01:24 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

Karnataka: कर्नाटक हाई कोर्ट ने पॉक्सो केस के एक आरोपी की सजा को कम कर दिया है। बता दें कि हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा को कम करके 10 साल कर दिया है। वहीं कोर्ट ने टिप्पणी की कि मामले में आरोपी को अधिकतम सजा देने के लिए कोई उचित वजह नहीं है।
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कर्नाटक उच्च न्यायालय - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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कर्नाटक हाई कोर्ट ने पॉक्सो केस के मामले में एक आरोपी के आजीवन कारावास की सजा को कम करके 10 साल कर दिया है। मामले में कोर्ट ने अधिकतम सजा देने के लिए उचित वजह की कमी बताई है। बता दें कि चिकमगलूर के 27 वर्षीय आरोपी की अपील को न्यायमूर्ति श्रीनिवास हरीश कुमार और सी. एम. जोशी की खंडपीठ ने आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया था। हालांकि मामले में हाई कोर्ट ने उस पर लगे हुए जुर्माने की राशि को 5 हजार रुपये से बढ़ाकर 25 हजार रुपये कर दिया।
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नाबालिग के बार-बार यौन उत्पीड़न का मामला
ये मामला जून 2016 का है, जहां पड़ोस में रहने वाली एक नाबालिग लड़की से दोस्ती करने और उसका बार-बार यौन उत्पीड़न करने से जुड़ा है। मामले का खुलासा नाबालिग के गर्भवती होने के बाद पता चला, जिसके बाद दिसंबर 2016 में इसकी शिकायत दर्ज कराई गई। डीएनए टेस्ट से इस बात की पुष्टि हुई कि आरोपी ही लड़की का जैविक पिता है। इस मामले में पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की और जांच के बाद चार्जशीट दाखिल किया।

विशेष अदालत ने दी थी आजीवन कारावास की सजा
वहीं 11 जून, 2018 को चिकमगलुरु के जिला मुख्यालय शहर में एक विशेष अदालत ने मामले में आरोपी को पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत आजीवन कारावास और आरोपी को आपराधिक धमकी के दोषी के रूप में 5 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। विशेष अदालत के फैसले को आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें उसने लड़की के उम्र सही दस्तावेजों के साथ साबित नहीं की गई थी।
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विशेष अदालत ने सजा के पर्याप्त कारण नहीं बताए
इस मामले में खंडपीठ ने समीक्षा करने पर ये पाया कि मौखिक गवाही से लड़की की सहमति का पता चलता है, हालांकि वारदात के समय उसकी वास्तविक उम्र 12 साल होने के कारण ये कानूनी रूप से अप्रासंगिक था। वहीं मामले में खंडपीठ ने टिप्पणी की कि सहमति के इस संकेत ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत अधिकतम सजा लगाने का विरोध किया। इससे पता चलता है कि विशेष अदालत ने अधिकतम आजीवन कारावास की सजा लगाने के लिए पर्याप्त कारण नहीं बताए थे।

हाईकोर्ट ने 10 साल की कैद की सजा दी
वहीं अपराध की तारीख पर कानून के अनुसार, पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 में न्यूनतम 10 साल के कठोर कारावास और अधिकतम आजीवन कारावास की सजा की अनुमति दी गई थी। इस मामले में अदालत ने फैसला सुनाया कि अधिकतम सजा देने के लिए उचित वजह होने की जरुरत होती है, जो विशेष अदालत के फैसले में मौजूद नहीं थे। नतीजतन, अदालत ने अपने हालिया आदेश में सजा को संशोधित कर आरोपी को 10 साल की कैद की सजा दिया।
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