राजकोट गेम जोन मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार मामले में लगातार गोलमोल जवाब दे रही है। हम इससे आजिज आ गए हैं। उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति प्रणव त्रिवेदी की खंडपीठ ने कहा कि सरकार के हलफनामे में अदालत के पिछले आदेश में उठाए गए मुद्दों के जवाब नहीं हैं। अदालत की फटकार के बाद महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी ने हलफनामा वापस ले लिया और कहा कि दो हफ्ते बाद होने वाली अगली सुनवाई में नया हलफनामा दाखिल किया जाएगा।
अदालत राजकोट शहर में 25 मई को हुए अग्निकांड के एक दिन बाद स्वत: संज्ञान लेते हुए दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हलफनामा वापस लिए जाने के चलते खारिज किया जाता है। अदालत के 23 अगस्त के अपने आदेश में की गई टिप्पणियों के क्रम में राजकोट नगर निगम आयुक्त नया हलफनामा दाखिल करें। अगली सुनवाई 27 सितंबर को होगी। पीठ ने 23 अगस्त के अपने आदेश में कहा था कि उच्च न्यायालय ने 2020 में अग्नि सुरक्षा से संबंधित कुछ निर्देश जारी किए थे और राजकोट के तत्कालीन नगर आयुक्त ने 2022 में एक हलफनामे में कहा था कि वह अदालत के निर्देशों का पालन करेंगे।
शुक्रवार को मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने राज्य सरकार के हलफनामे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पिछले आदेश में उठाए गए मुद्दों के बारे में इसमें कोई जानकारी नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि‘ नगर निगम आयुक्त यह कहकर बच नहीं सकते कि उन्हें गेम जोन के अवैध निर्माण के बारे में जानकारी नहीं थी।
महाअधिवक्ता कमल त्रिवेदी ने कहा कि नए हलफनामे में बताया गया है कि नगर निगम कैसे काम करता है? इसमें दर्शाया गया है कि आयुक्त निगरानी कर रहे हैं। केवल यह बताने की कोशिश की गई है कि आयुक्त की ओर से कोई लापरवाही नहीं की गई। इस पर पीठ ने कहा कि मामला आग लगने की घटना से जुड़ा है। नगर निगम कैसे काम करता है, इस बारे में नहीं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि क्या आप अपने काम को सही ठहरा रहे हैं? हमने आपसे केवल जवाब दाखिल करने को कहा था। सरकार को पिछले आदेश में की गई टिप्पणियों का जवाब देने की जरूरत है। औचित्य सिद्ध करना बंद करें। हम अधिकारियों के टालमटोल वाले हलफनामों से आजिज़ आ चुके हैं। हम इस हलफनामे को स्वीकार नहीं कर सकते।
पीठ ने कहा कि किसी को भी अदालत के आदेश को दरकिनार करने और फिर यह कहकर बच निकलने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि उसने अपने अधीनस्थों को काम सौंपा था इसलिए वह निर्दोष है। उसे जिम्मेदारी लेनी होगी। उच्च न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों को अदालत में माफी का हलफनामा प्रस्तुत करना चाहिए और जवाब देना चाहिए कि उसे लापरवाही के लिए क्यों जिम्मेदार नहीं ठहराया जाए।