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लव जिहाद: गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी राज्य सरकार, धारा-पांच से रोक हटाने से कोर्ट का इनकार

Fri, 27 Aug 2021 03:11 PM IST
प्रशांत कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गांधीनगर

सार

 लव जिहाद कानून की अहम धाराओं में से एक धारा-5 के मुताबिक, अगर किसी को भी दूसरे धर्म में शादी करनी हो तो उसे कलेक्टर की अनुमति लेनी अनिवार्य है। धारा-5 को राइट टू प्राइवेसी और फ्रीडम ऑफ रिलीजन के आधार पर कोर्ट ने गैरकानूनी मानते हुए रोक लगाई थी। 
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गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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गुजरात हाईकोर्ट ने पिछले हफ्ते राज्य के लव जिहाद कानून की महत्वपूर्ण धाराओं (3,4,5 और 6) पर रोक लगा रखी है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद गुजरात की रुपाणी सरकार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी। गुजरात सरकार सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देगी। राज्य सरकार ने प्रेस रिलीज जारी कर यह जानकारी दी है।  मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने कहा है कि लव-जिहाद कानून सरकार का राजनीतिक एजेंडा नहीं है। 

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गुरुवार (26 अगस्त) को गुजरात हाईकोर्ट ने लव जिहाद कानून की महत्वपूर्ण धाराओं पर फिर से सुनवाई हुई। हाई कोर्ट में एडवोकेट जनरल ने मांग की कि कानून की धारा-5 का शादी के साथ कोई लेना-देना नहीं है। दरअसल, धारा-5 के मुताबिक, अगर किसी को भी दूसरे धर्म में शादी करनी हो तो उसे कलेक्टर की अनुमति लेनी अनिवार्य है। धारा-5 को राइट टू प्राइवेसी और फ्रीडम ऑफ रिलीजन के आधार पर हाई कोर्ट ने गैरकानूनी मानते हुए रोक लगाई थी। हाईकोर्ट ने ये फैसला जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर सुनाया था। 


19 अगस्त को सुनाया था फैसला
इससे पहले गुजरात हाईकोर्ट ने 19 अगस्त को जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर फैसला सुनाया था। जमीयत ने इस कानून पर रोक लगाने की मांग की थी। याचिका पर फैसला देते हुए उच्च न्यायालय ने 19 अगस्त को अनुच्छेद 3, 4, 4ए से 4सी, 5, 6 और 6ए पर रोक लगा दी। इस दौरान अदालत ने गैरकानूनी तरीके से हुए धर्म परिवर्तन पर भी टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा, पुलिस में एफआईआर तब तक दर्ज नहीं हो सकती जब तक ये साबित नहीं हो जाता कि शादी जोर-जबरदस्ती से और लालच देकर की गई है।
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पांच साल की सजा और पांच लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान
राज्य में लव जिहाद कानून 15 जून को लागू किया गया था। इस कानून के तहत पांच साल की सजा और अधिकतम 5 लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। इसे धार्मिक स्वतंत्रता एक्ट, 2003 में संशोधन करके लाया गया है।

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