साल के शुरुआत में राष्ट्रपति को भी लिखा खुला खत
खत में 70 पूर्व सिविल सेवकों ने कहा कि उन्होंने 27 जनवरी को ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित बंदरगाह (पोर्ट) और कंटेनर टर्मिनल को लेकर राष्ट्रपति को एक खुला पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने कहा था कि यह प्रोजेक्ट द्वीप की अनूठी पारिस्थितिकी और कमजोर आदिवासी समूहों के आवास को लगभग नष्ट कर देगा। लेकिन न तो हमारे पत्र, न ही अन्य व्यक्तियों-समूहों द्वारा पर्यावरण और वन मंजूरी में खामियों के बारे में लिखे गए कई पत्रों का भारत सरकार द्वारा प्रोजेक्ट की फिर से जांच करने पर कोई प्रभाव पड़ा है।
'शोम्पेन जनजाति के लिए बेहद हानिकारक होगा प्रोजेक्ट'
एनसीएसटी के अध्यक्ष और सदस्यों को लिखे खुले खत में कहा गया है कि हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने उठाए गए कुछ पर्यावरणीय मुद्दों पर गौर करने का आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट शोम्पेन (एक कमजोर आदिवासी समूह जो अपने फॉरेस्ट ग्राउंड को लगातार खो रहा है) के लिए बेहद हानिकारक होगा। यह आदिवासी समूह पहले से ही 2004 की सुनामी से बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
आयोग ने अंडमान निकोबार प्रशासन को भेजा था नोटिस
हस्ताक्षरकर्ताओं में पूर्व स्वास्थ्य सचिव के सुजाता राव और पूर्व कोयला सचिव चंद्रशेखर बालाकृष्णन शामिल हैं। उन्होंने बताया कि आयोग ने 20 अप्रैल को अंडमान निकोबार प्रशासन को नोटिस भेजकर 15 दिन के भीतर मामले के तथ्यों पर स्पष्टीकरण देने को कहा था। पत्र में कहा गया है कि यह पत्र केंद्रीय वित्त मंत्रालय के पूर्व सचिव और आदिवासी मामलों के विशेषज्ञ ईएएस सरमा द्वारा की गई शिकायत पर भेजा गया था।
विस्थापन से आदिवासी समूहों के अस्तित्व को खतरा
उन्होंने कहा, "हम डॉ. सरमा और कई अन्य लोगों की आवाज को जोड़ना चाहते हैं, जिन्होंने दी गई मंजूरी में कई खामियों और विस्थापन से आदिवासी समूहों को होने वाले नुकसान के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की है। हमें उम्मीद है कि आप इस मामले को पूरी तरह से देखेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि ग्रेट निकोबार के समग्र विकास के लिए बनाए गए प्रोजेक्ट से इन अत्यधिक कमजोर आदिवासी समुदायों का विनाश न हो और विलुप्ति न हो, जिनका मूल और एकमात्र घर द्वीप है।"
अंडमान निकोबार प्रदूषण नियंत्रण समिति को भी लिखा खत
पूर्व सिविल सेवकों ने कहा कि कई लोगों ने प्रोजेक्ट के लिए आदिवासी आरक्षित भूमि के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए सरकार को पत्र लिखा है, उनमें भारतीय मानवविज्ञानी भी शामिल हैं। उन्होंने सार्वजनिक सुनवाई से पहले अंडमान निकोबार प्रदूषण नियंत्रण समिति को पत्र लिखा, जिसमें प्रोजेक्ट को मंजूरी देते समय बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।