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नजरिया: संकट में अर्थव्यवस्था, सरकारी निवेश बनाम निजी निवेश और निर्यात

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 12 Nov 2023 06:37 AM IST

सार

सरकारी निवेश का इंजन ही चल रहा है, जबकि निजी निवेश, निजी उपभोग और निर्यात के इंजन रुके हैं। यह स्थिति बदली जा सकती है। पर जब तक सरकार कमजोरियों और खतरों को खारिज करती रहेगी, इसे न तो ताकत मिलेगी, न अवसर मिलेंगे।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pti


विगत एक अक्तूबर को हम इस सरकार के कार्यकाल के आखिरी छह महीने में पहुंच गए, जो 30 मई को केंद्र की सत्ता में अपने दस साल पूरे करेगी। आगामी अप्रैल और मई प्रशासनिक मोर्चे पर इस सरकार के लिए छुट्टियों की तरह होंगे। ऐसे में, देश की अर्थव्यवस्था की समीक्षा करने का यह एक अच्छा अवसर है।


भारत जैसे विकासशील देशों में दूसरे मानकों की तुलना में जीडीपी की वृद्धि दर देश के आर्थिक स्वास्थ्य को जांचने का सबसे बढ़िया पैमाना है। इसलिए मैं भाजपा के कार्यकाल के 10 साल की आर्थिक विकास दर से अपनी बात शुरू करता हूं। एनएसओ के आंकड़े के मुताबिक, इस सरकार के शुरुआती नौ साल में औसत आर्थिक विकास दर 5.7 फीसदी रही। वर्ष 2023-24 में सरकार का आकलन 6.5 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर का है, लिहाजा सरकार के दस काल की औसत आर्थिक विकास दर 5.8 फीसदी ठहरती है। इस वृद्धि दर की तुलना यूपीए-1 और यूपीए-2 के कार्यकाल में हासिल वृद्धि दर से करें।


यूपीए-1 में औसत आर्थिक विकास दर 8.5 फीसदी थी, जबकि दस साल की औसत विकास दर 7.5 फीसदी थी। कुछ अर्थशास्त्री भाजपा के कार्यकाल के दस साल में औसत आर्थिक विकास दर में 1.8  प्रतिशत की गिरावट को नगण्य बताकर खारिज कर देंगे। लेकिन यह सरासर गलत होगा। वृद्धि दर में इस गिरावट का राष्ट्रीय सुरक्षा, ढांचागत खर्च, निवेश, रोजगार सृजन, कल्याणकारी कार्यक्रमों, प्रति परिवार उपभोग, बचत, गरीबी उन्मूलन तथा शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्रों में उन्नति के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर भीषण असर पड़ता है।


दो मुख्य चिंता

लोगों के लिए जो दो मुख्य चिंताएं हैं, वे हैं महंगाई और बेरोजगारी। बढ़ती  महंगाई के कारण देश के 10 फीसदी अमीरों को छोड़कर शेष जनता के लिए घर चलाना बहुत मुश्किल है। अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (नई शृंखला) जो 2013-14  में 112  थी, दिसंबर, 2022 में बढ़कर 174 हो चुकी थी। खाद्य मुद्रास्फीति 10  फीसदी के आसपास है। इसका तात्कालिक नतीजा है घरेलू उपभोग में कटौती। विभिन्न आय वर्गों के लोग या तो अपने खर्च घटा रहे हैं या फिर उनकी बचत में कमी आ रही है। परिवारों की कुल संपत्ति घटकर 5.1 फीसदी की तलहटी पर रह गई है।


एफएमसीजी कंपनियों ने अपनी ब्रांड वैल्यू बरकरार रखने के लिए उत्पादों की कीमत न घटाकर वजन घटा दिए हैं। दोपहियों की बिक्री में कमी सबसे बड़ा उदाहरण है कि महंगाई के कारण लोगों के उपभोग में किस तरह कमी आई है। चिंता का दूसरा कारण है बेरोजगारी। दावों के विपरीत, पिछले दस साल में लाखों रोजगार का सृजन नहीं हुआ है, न ही दो करोड़ नौकरियां देने का वादा पूरा किया गया है ( ऐसे में, इसे चुनावी जुमला ही माना गया)।


आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्ष के दौरान एक वर्ष को छोड़कर हर साल बेरोजगारी की दर सात प्रतिशत से अधिक रही। स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2023 रिपोर्ट के मुताबिक, स्नातकों में बेरोजगारी की दर 42 फीसदी है। वर्ष 2022 में 15 से 24 साल के युवाओं में बेरोजगारी की दर 23.22 प्रतिशत थी। आज अधिकतर रोजगार स्व-रोजगार (57 फीसदी) है। दैनिक मजदूरी वाले कर्मचारियों का आंकड़ा 24 फीसदी से घटकर 21 प्रतिशत रह गया है। सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी) का आंकड़ा बताता है कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल (2015-23) में सरकारी नौकरियों में 22 फीसदी की कमी आई है।
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खतरों को समझें

वित्त मंत्रालय मासिक समीक्षा प्रकाशित करता है। विगत सितंबर महीने की समीक्षा अक्तूबर में जारी की गई, जिसमें कूटभाषा में कहा गया : वैश्विक परिदृश्य के कारण अल्पावधि जोखिम, लागत के मोर्चे पर लगातार दबाव, मुद्रास्फीति के मामले में उम्मीदों को झटका, लंबे समय तक ऊंची ब्याज दर, तरलता और कर्ज जोखिम का अचानक फिर से आकलन, कमोडिटी मार्केट में आपूर्ति का झटका और ईंधन के मूल्य में तेजी। सरल भाषा में कहें, तो समीक्षा का निराशाजनक निष्कर्ष यह है कि आर्थिक भविष्य उदास करने वाला है, विकास दर नीचे जाएगी, मूल्यवृद्धि होगी, ब्याज दर ऊंची होगी, परिवारों का उपभोग घटेगा, बचत कम होगी और कर्ज बढ़ेगा।


एक रेटिंग एजेंसी के अर्थशास्त्री ने हाल ही में लिखा, 'बैंक कर्ज की वृद्धि दर 15 फीसदी से अधिक पर मजबूत बनी हुई है, जिसमें से खुदरा कर्ज की  वृद्धि दर 18 प्रतिशत है।'  जाहिर है, यह भाषा बेहद प्रभावी है, लेकिन गहराई में जाने पर पता चलता है कि कर्ज में यह वृद्धि मूलत: पर्सनल लोन ( 23 फीसदी) और गोल्ड लोन (22 प्रतिशत) में वृद्धि के कारण है। उद्योग को दिए जाने वाले कर्ज में वृद्धि की दर अगस्त में महज 6.1 फीसदी थी। पिछली चार तिमाहियों में औसत मासिक आय में 9.2 प्रतिशत की गिरावट (12,700  से घटकर 11,600) आई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में अनौपचारिक श्रमिक की औसत दैनिक मजदूरी 409 रुपये से घटकर 388 रुपये रह गई है। इसके बारे में सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है कि पर्सनल लोन और गोल्ड लोन में वृद्धि उपभोग में वृद्धि का उदाहरण है। खतरों को ताड़ लेना वस्तुत:  एक जोखिम भरा काम है।


तीन इंजन रुके हैं

अर्थशास्त्रियों ने रेखांकित किया है कि सरकारी निवेश का इंजन ही चल रहा मालूम होता है, जबकि निजी निवेश, निजी उपभोग और निर्यात के इंजन रुके पड़े हैं। निर्यात को गति देने, निजी निवेश बढ़ाने और ज्यादा उपभोग को प्रोत्साहन देने के तरीके और साधन हैं। लेकिन जब तक सरकार कमजोरियों और खतरों को खारिज करती रहेगी, इसे न तो ताकत मिलेगी, न ही अवसर मिलेंगे। शरद ऋतु बेहद चुनौती भरी रही है, जाड़ा मुश्किल भरा हो सकता है, ऐसे में, हम सिर्फ उम्मीद ही कर सकते हैं कि वसंत खुशियां लाएगा।

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