सूत्र बताते हैं कि कृषि मंत्री से विभिन्न योजनाओं की प्रगति पर बैठक में रिपोर्ट भी ली गई है। इस दौरान कर्जमाफी की घोषणा के जोखिम का भी जिक्र हुआ। दरअसल पांच राज्यों के चुनाव के दौरान तीन राज्यों में सरकार बनाने वाली कांग्रेस ने छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में किसानों के कर्ज माफी की घोषणा की। जबकि इससे पहले कर्नाटक और पंजाब में भी सरकार बनाकर यह कदम उठाया।
इस दौरान कर्जमाफी को लेकर केंद्र सरकार लगातार इंकार करती रही। ऐसे में अब कर्जमाफी की घोषणा करना विपक्ष को राजनीतिक हथियार सौंपना होगा। सूत्रों की माने तो इसी कारण सरकार कर्जमाफी के विकल्प की दिशा में आगे बढ़ रही है। साथ ही बटाई और पट्टे पर खेती करने वाले किसानों को भी लाभ देने के लिए योजनाओं में बदलाव कर सकती है।
सूत्रों का कहना है कि सरकार अगर तेलंगाना मॉडल को किसानों के लिए लागू करने पर करीब एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का वार्षिक खर्च आने का अनुमान है। जबकि एक लाख रुपये तक का कृषि ऋण अगर माफ किया जाता है तो यह खर्च तिगुने से भी ज्यादा का होगा। और कुछ साल बाद फिर से समान स्थिति पैदा होने का अनुमान है। ऐसे में सरकार उस व्यवस्था को लागू करने पर विचार कर रही है जो किसानों को सबल बनाए।