एकेश्वरवाद में विश्वास करने वाले राय का अकसर उनके पिता से धर्म और विश्वास को लेकर मतभेद होता था। जिसके चलते उन्होंने कम उम्र में ही घर छोड़ दिया था। वापस लौटने पर माता-पिता ने यह सोचकर उनका विवाह कर दिया कि शायद इसके बाद उनके विचारों में कुछ बदलाव आ जाए। लेकिन वह हिंदू रूढ़ियों से दूर रहे और हिंदुत्व की गहराइयों को समझने में लगे रहे ताकि इन बुराइयों को सामने लाकर लोगों को जागरुक किया जा सके।
देश और समाज के लिए समर्पित किया जीवन
राजा राम मोहन राय ने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की थी, जो पहला भारतीय सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन माना जाता है। यह वह दौर था, जब भारतीय समाज में 'सती प्रथा' जोरों पर थी। वह भारत में दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे। पहली अंग्रेजों से देश को मुक्त कराने की लड़ाई और दूसरी देश के लोगों को
सामाजिक कुरीतियों से मुक्त कराने की लड़ाई।
उस समय सती प्रथा, पर्दा प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियां समाज में विख्यात थीं। उन्होंने देश में समाज सुधार के लिए काम शुरू किया और इन बुराइयों का अंत किया। इसके अलावा उन्होंने जाति-व्यवस्था, शिशु हत्या, अशिक्षा को समाप्त करने के लिए मुहिम चलाई और जिसमें उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली।
राजा राम मोहन राय ने ब्रह्ममैनिकल मैग्जीन, संवाद कौमुदी, मिरात-उल-अखबार, बंगदूत जैसे स्तरीय पत्रों का संपादन और प्रकाशन भी किया। वहीं उनके द्वारा संपादित बंगदूत की बात करें तो यह एक अनोखा पत्र था। जिसमें बंग्ला, हिंदी और फारसी भाषा का एक साथ प्रयोग किया जाता था।
इतना ही नहीं वह साल 1830 में मुगल साम्राज्य का दूत बनकर ब्रिटेन भी गए थे। इसके बाद 27 सितंबर 1833 को उनका इंग्लैंड में निधन हो गया। ब्रिटेन के ब्रिस्टल नगर के आरनोल वेल कब्रिस्तान में राय की समाधि है। उनके सुधार कार्यों के द्वारा वह भारतीय समाज के बीच आज भी जीवित हैं।