मोरारजी देसाई ने रॉ को इंदिरा गांधी का प्रेटोरियन गार्ड(रोमन आर्मी का सिपाही) बताया था। उन्होंने इस खुफिया इकाई के सूचना प्रभाग को तो बंद ही कर दिया था। रॉ की काउंटर-टेररिज्म डिविजन के पूर्व प्रमुख और प्रसिद्ध सुरक्षा विश्लेषक बी. रमन ने अपने एक लेख में यह जिक्र किया है। मोरारजी देसाई ने पाकिस्तानी जनरल मुहम्मद जिया-उल-हक के साथ टेलीफोन पर हुई एक अनौपचारिक बातचीत में कहा, 'रॉ' पाकिस्तान की परमाणु गतिविधियों से अच्छी तरह वाकिफ है।
1977 में अमेरिकी राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर की ओर से अपने परमाणु रिएक्टरों के लिए भारत को भारी मात्रा में पानी और यूरेनियम बेचने की पेशकश की गई। उन्होंने एक शर्त भी रख थी। वह यह थी कि पहले अमेरिका भारत की परमाणु सामग्री का ऑन-साइट निरीक्षण करेगा। मोरारजी देसाई ने अमेरिका के इस रुख को विरोधाभासी मानते हुए उसे ऐसा करने से मना कर दिया।
देसाई ने पाकिस्तान और चीन के साथ सामान्य संबंधों को बहाल करने का काम किया। जिया-उल-हक के साथ संवाद स्थापित कर मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए गए। मोरारजी देसाई एकमात्र ऐसे भारतीय नागरिक हैं, जिन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया था। 1990 में राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने एक समारोह में उन्हें इस सम्मान से नवाजा था।