बता दें कि तालिबान यह कहता रहा है कि वह आईएस के आतंकियों से लड़ाई करेगा। अमेरिका को दिए वादे में कहा गया कि वे आपस में दोस्त नहीं हैं। समझा जा सकता है कि तालिबान के बिना आईएस की एंट्री अफगानिस्तान में नहीं हो सकती थी। ये अलग बात है कि विभिन्न मंचों से तालिबान कहता आया है कि वह आईएस को स्पोर्ट नहीं करता। एनआईए में एडीजी की कमान संभाल चुके पूर्व आईपीएस अधिकारी बताते हैं कि आज भारत में आईएस अपनी गतिविधियों का जाल फैला रहा है। जांच एजेंसी के पास ऐसे दर्जनों पुख्ता सबूत हैं, जिनमें देश के गुमराह युवाओं को आईएस में भर्ती का लालच दिया जा रहा है। मुल्ला बरादर, जिसे 2010 में आईएसआई ने कराची से गिरफ्तार किया था, 2018 में उसे रिहा कर दिया गया। वह तालिबान के सैन्य अभियानों की कमान संभालता है।
एनआईए के पूर्व अधिकारी के मुताबिक, मौजूदा तालिबान भारत के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। पहले भी ऐसे केस देखने को मिले हैं, जिनमें कश्मीर घाटी के लोकल युवा पाकिस्तान की मदद से अफगानिस्तान में जाकर आईईडी बनाने और दूसरे आतंकी हथकंडों की ट्रेनिंग लेकर आए थे। ऐसे आतंकी सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए हैं। अगर मुल्ला बरादर, पाकिस्तान में चल रहे आतंकी ट्रेनिंग कैंपों को अफगानिस्तान में शुरू करने की इजाजत दे देता है तो यह भारत के लिए मुश्किल वाली स्थिति होगी। वजह, अफगानिस्तान में तालिबान के लड़ाके युद्ध कला में पारंगत हैं। उनके पास ऐसे हथियार हैं, जो कई देशों की सेना के पास भी नहीं हैं।
दूसरा, उनकी ट्रेनिंग जबरदस्त है। अमेरिका ने अफगानिस्तान में आईएस के खिलाफ पहली बार दुनिया के सबसे शक्तिशाली गैर-परमाणु बम जीबीयू-43 का इस्तेमाल किया था। इसे 'मदर ऑफ ऑल बम' भी कहा जाता है। ऐसे हमलों के बावजूद तालिबान ने खुद को न केवल खड़ा किया, बल्कि अफगान फौज को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था। आईएस के साथ अगर जैश और लश्कर जैसे आतंकी संगठन, अफगानिस्तान में आकर ट्रेनिंग करना चाहते हैं तो उन्हें आसानी से अनुमति मिल जाएगी। तालिबान के लड़ाकों के पास अमेरिका और नाटो देशों की सेनाओं के साथ युद्ध का लंबा अनुभव है।