बिसारिया ने अपनी किताब 'एंगर मैनेजमेंट: द ट्रबल्ड डिप्लोमैटिक रिलेशनशिप विद इंडिया एंड पाकिस्तान' में कहा कि जुलाई 2001 में भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक शिखर वार्ता के दूसरे दिन मुशर्रफ ने नाश्ते पर बातचीत के लिए प्रमुख समाचार पत्रों और टीवी नेटवर्क के संपादकों से मुलाकात की थी। जिसमें, उन्होंने कश्मीर पर अपना आक्रामक रुख दिखाया था और आतंकवादियों की तुलना 'स्वतंत्रता सेनानियों' से की थी।
पूर्व राजदूत ने कहा कि उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सूचित करने का काम सौंपा गया था। जो बैठक कक्ष के बाहर हो रही हर चीज से बेखबर थे और मुशर्रफ के साथ बातचीत कर रहे थे। बिसारिया ने कहा कि उन्होंने वाजपेयी को मुशर्रफ के अखबारों को दिए साक्षात्कार और टेलीविजन पर दिखाए जा रहे फुटेज के बारे में बताया। बिसारिया ने याद किया कि कमरे से बाहर निकलने के बाद वाजपेयी ने हिंदी में कहा था- 'जनरल साहब ये आपने क्या किया'। पूर्व राजनयिक ने कहा कि उस क्षण के बाद शिखर सम्मेलन में माहौल खराब हो गया। बिसारिया ने यह भी कहा कि तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी मीडिया रिपोर्टिंग में दिखावे से अच्छी तरह वाकिफ थे।
इसमें कहा गया है कि पाकिस्तानी नेतृत्व के साथ बैठकों से जो सरल धारणा उभरकर सामने आई, वह यह थी कि वाजपेयी और जसवंत सिंह आगरा संयुक्त बयान (कश्मीर मुद्दे पर आगे बढ़ने के लिए द्विपक्षीय सबंधों में प्रगति) के लिए पाकिस्तान के पेचीदा मसौदे के साथ तालमेल के पक्ष में थे और सहमत थे। लेकिन, आडवाणी ने इस पर वीटो लगा दिया था क्योंकि वह पाकिस्तान के साथ (बातचीत में) कोई प्रगति नहीं चाहते थे।
बैठक और उससे पहले की घटनाओं को याद करते हुए बिसारिया ने कहा, अगर आपको वह सुबह याद हो तो उस दिन नाश्ते पर बैठक हुई थी। मुशर्रफ ने अखबारों के करीब 35 संपादकों और वरिष्ठ संपादकों के सथ बैठक की थी। एनडीटीवी पर यह फुटेज चल रहा था। जबकि प्रधानमंत्री बैठे थे और मुशर्रफ से बात कर रहे थे और मैंने उन्हें इस बारे में जानकारी दी। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव ब्रजेश मिश्रा ने मुझे अंदर जाने और प्रधानमंत्री वाजपेयी को सूचित करने के लिए कहा। इसके लिए उन्होंने कुछ चीजें लिखीं और मैंने उन्हें टाइप किया। मैंने इसमें मुख्य रूप से यह लिखा कि यह सब टेलीविजन पर चल रहा है।
उन्होंने कहा, 'मुशर्रफ ने कश्मीर, आतंकवाद पर ऐसी बातें कहीं कि मैं अंदर कमरे में चला गया। दोनों नेताओं ने अपनी बातचीत बंद की, मेरी ओर देखा और मैंने प्रधानमंत्री से कहा कि कुछ महत्वपूर्ण है। उन्हें कागज दिया और बाहर चला गया। इसके बाद उन्होंने कागज देखा और कहा 'जनरल साहब ये आपने क्या किया'। उन्होंने ऐसे शब्द कहे थे कि इससे माहौल खराब हो गया। उसी के बाद शिखर सम्मेलन में गिरावट आ गई।' बिसारिया ने इस बात पर भी जोर दिया कि आगरा शिखर सम्मेलन पूरी तरह से विफल नहीं था। उन्होंने कहा कि दोनों नेता आगरा में अपनी बैठक के दौरान एक-दूसरे के बारे में बेहतर समझ हासिल करने में सक्षम थे।
राजनयिक ने 2004 में वाजपेयी की इस्लामाबाद यात्रा के बारे में बात की। तब उन्होंने एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें गारंटी दी गई थी कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल नहीं करेगा। वाजपेयी और मुशर्रफ के बीच शिखर वार्ता के बारे में बिसारिया ने कहा, वाजपेयी ने 2004 में इस्लामाबाद की यात्रा की थी। तब उन्होंने एक वास्तविक शांति दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। एक दस्तावेज जिसमें गारंटी दी गई थी कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल नहीं करेगा। लेकिन, उस जगह पर पहुंचने के लिए उन्हें सैन्य तानाशाह के दिमाग को समझने की जरूरत थी।