पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा केन्द्र सरकार के पहले राहत पैकेज से निराश हैं। उन्होंने अमर उजाला से कहा कि प्रधानमंत्री ने 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की, आज वित्त मंत्री राहत पैकेज लेकर आईं, लेकिन लगा कि जैसे सरकार नया, पुराना सब जोड़कर 20 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा छूना चाह रही है।
पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि कोरोना या लॉकडाउन के बारे में सोचने पर पहली तस्वीर गरीब, मजदूर की आती है। उसका काम-धंधा बंद है, उसके पास घर जाने के लिए साधन नहीं है। उसके सहारे छोटे-बड़े कल कारखाने, कारोबार चल रहे थे और वह विवश होकर परिवार सहित पैदल ही अपने घर के लिए निकल पड़ा है।
रास्ते में उसकी जान जा रही है। उसके पास खाने को नहीं है और केन्द्र सरकार के अनाज के भंडार भरे हैं। लेकिन एक घंटे से अधिक समय तक की वित्त मंत्री की प्रेसवार्ता और प्रधानमंत्री के भाषण में उसके लिए दो शब्द भी सुनने को नहीं मिले।
आज भी वित्त मंत्री ने उसके लिए कोई घोषणा नहीं की। दूसरी बड़ी चिंता किसानों, सीमांत किसानों की है। किसान अपने फल, सब्जी सब सड़क पर फेंक रहा है, जानवरों को खिला रहा है। उसके लिए केंद्र सरकार ने आज कोई घोषणा नहीं की।
जिसकी नौकरी गई है या तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिल रही है, पहले पैसा उसकी जेब में जाना चाहिए। पैसा गरीब, किसान, मजदूर की जेब में जाना चाहिए। पैसा होगा तो लोग सामान खरीदने जाएंगे। मांग बढ़ेगी तो कंपनियों के उत्पाद बिकेंगे, मांग पर उत्पादन बढ़ाएगी।
सप्लाई चेन खड़ी होने में सहारा मिलेगा। मेरा मानना है कि अभी तक की घोषणा में ऐसी कोई पहल नहीं हुई है। घोषणा में सप्लाई चेन मेंटेन करने की प्रतिबद्धता नहीं दिखाई दी। यह तो सरकार ने लोन का मेला लगाया है। लोन लेकर लोग करेंगे क्या? इसे तो लौटाना पड़ेगा।
साफ सी बात है। इस समय कर्मचारी की जेब में पैसा जाने से कुछ खास नहीं होगा। पहले पैसा लोगों की जेब में डालना होगा। रहा सवाल एमएसएमई की परिभाषा बदलने का तो यह अच्छा है। तीन लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा यूके सिन्हा कमेटी की पुरानी सिफारिश है।