जनधन योजना, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और गांव-गांव खुले बैंक मित्रों (बीसी) की वजह से भारत मोदी सरकार में वित्तीय समावेशन के मामले में चीन, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका से आगे निकल गया है।
एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 में 1,000 वयस्कों पर मोबाइल एवं इंटरनेट बैंकिंग लेनदेन 74 गुना से ज्यादा बढ़कर 13,615 पहुंच गया, जो 2015 में महज 183 था। इस दौरान बैंक शाखाओं की संख्या में भी इजाफा हुआ है। 2015 में प्रति एक लाख व्यस्कों पर 13.6 बैंक शाखाएं थीं, जिनकी संख्या 2020 में बढ़कर 14.7 पहुंच गईं। बैंक शाखाओं की यह संख्या जर्मनी, चीन और दक्षिण अफ्रीका से ज्यादा है।
नोटबंदी की पांचवीं सालगिरह पर एसबीआई समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष ने कहा कि वित्तीय समावेशन अभियान के सात वर्षों के दौरान नॉन-फ्रिल खाता योजना (न्यूनतम बैलेंस की अनिवार्यता नहीं) के तहत बैंकों में जमा खाते वाले व्यक्तियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो उभरती अर्थव्यवस्थाओं और यहां तक कि कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं के आसपास पहुंच गई हैं।
डिजिटल भुगतान के इस्तेमाल में भी शानदार प्रगति हुई है। 20 अक्तूबर, 2021 तक नॉन-फ्रिल बैंक खातों की संख्या बढ़कर 43.7 करोड़ पहुंच गई है, जिनमें 1.46 लाख करोड़ रुपये जमा हैं। इन खातों में करीब दो तिहाई खाते ग्रामीण और अर्द्ध शहरी इलाकों में हैं। 34 करोड़ यानी 78 फीसदी से ज्यादा नॉन-फ्रिल खाते सरकारी बैंकों में हैं, जबकि 18.2 फीसदी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में और तीन फीसदी निजी बैंकों में हैं।
ग्रामीण इलाकों में बढ़ी बैंकिंग सेवाओं की पहुंच
घोष ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में बैंक मित्रों की अहम भूमिका है। इसका असर वित्तीय समावेशन पर भी दिखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च, 2010 तक ग्रामीण इलाकों में कुल 33,378 बैंक शाखाएं थीं, जिनकी संख्या दिसंबर, 2020 में बढ़कर 55,073 पहुंच गईं। इसी तरह, गांवों में बैंकिंग आउटलेट/बैंक मित्र की संख्या भी 34,174 से बढ़कर 12.4 लाख पहुंच गई। ये बैंक मित्र सप्ताह में कम-से-कम पांच दिन प्रतिदिन चार घंटे बैंकिंग सेवाएं मुहैया कराते हैं।
जनधन खातों से घटे अपराध
रिपोर्ट में कहा गया है कि शोध से यह भी पता चलता है कि जिन राज्यों में वित्तीय समावेशन/प्रधानमंत्री जनधन योजना खातों की संख्या ज्यादा है, वहां अपराध में गिरावट देखने को मिली है। यह भी देखा गया है कि अधिक बैंक खाते वाले राज्यों में शराब और तंबाकू उत्पादों जैसे नशीले पदार्थों की खपत में महत्वपूर्ण एवं सार्थक गिरावट आई है।