फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

किसान आंदोलन अब भी रोड़ा: जानिए, किसानों की समस्याओं से कैसे छूटेगा सरकार का पिंड

Sun, 28 Nov 2021 07:52 PM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

तीनों कृषि कानूनों पर सरकारी कामकाज के तरीकों ने बढ़ाई मंत्रियों के सचिवालय की परेशानी। किसान संगठनों से बातचीत के बाद कानून वापसी का फैसला होता तो बेहतर होता।
 
विज्ञापन
किसान आंदोलन - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सोमवार 29 नवंबर से संसद का शीतकालीन सत्र विधिवत आरंभ हो जाएगा। सरकार पहले दिन ही तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की संसदीय प्रक्रिया शुरू कर देगी, लेकिन कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के सचिवालय के सदस्यों को नहीं पता कि किसानों की समस्या से सरकार का पिंड कैसे छूटेगा? 

विज्ञापन


एक अधिकारी ने कहा कि शनिवार को कृषि मंत्री ने किसानों से अपील की है, देखिए आगे क्या होता है। कृषि मंत्री के सचिवालय के एक सदस्य का कहना है कि कानून के आने और रद्द होने से मंत्री की कोई बदनामी नहीं होगी। सबको पता है कि केन्द्र में मोदी सरकार है। कौन सब कर रहा है?
 
अपनी सरकार के कामकाज पर नहीं उठा सकते सवाल
एक नेता की पीड़ा सुनिए। वह फरमाते हैं '22 साल से राजनीति में हूं। जनसमस्या से जुड़े मुद्दे का समाधान करना आता है, लेकिन बहुत-सी बातों पर चुप रहना बेहतर है। सूत्र का कहना है कि तीनों कृषि कानूनों को जब सरकार लेकर आ ही गई थी तो वापसी के होमवर्क के साथ 19 नवंबर को इन्हें रद्द करने की घोषणा होनी चाहिए थी। चलिए, जो हुआ सो हुआ। अब आगे का देखना है। सोमवार को संसद भवन में रहना है।'
विज्ञापन


अब किसानों को मांगें मनवाने का मौका मिला
यह समस्या केवल केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सचिवालय की नहीं हैं। भाजपा के नेताओं के भी इसको लेकर तरह-तरह के तथ्य हैं। एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री कहते हैं कि यदि किसान प्रतिनिधियों से वार्ता की पहल करके इसे वापस लेने का प्रयास किया गया होता तो सब केंद्र सरकार के पक्ष में हो जाता। किसान भी राजमार्गों को खाली करके चले गए होते। अब तो किसान संगठनों के पास अपनी एक बात के बाद सरकार से दूसरी बात मनवाने का मौका मिल गया है।

कृषि कानूनों पर अब भी राजनीति, हल भी राजनीतिक होगा: कांग्रेस नेता

कांग्रेस के एक पूर्व महासचिव कहते हैं कि तीनों कृषि कानूनों के संसद से पारित होने के दौरान इस पर राजनीति शुरू हुई और अभी तक जारी है। जो निर्णय तब लिए गए वह राजनीतिक थे, जो अब लिए जा रहे हैं, वह भी राजनीतिक हैं। किसान आंदोलन भी राजनीतिक होता जा रहा है। इसलिए अब इसका समाधान भी किसी राजनीतिक तरीके से ही संभव है। 

खड़गे ने बुलाई बैठक
फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता। प्राप्त सूचना के अनुसार तीनों कृषि कानूनों की वापसी को लेकर पेश किए जाने वाले मसौदे के बाबद राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोमवार 29 नवंबर को सुबह बैठक बुलाई है। इसमें विपक्षी दलों के नेता भी शामिल होंगे। कांग्रेस पार्टी विपक्षी दलों की एकजुटता के साथ केन्द्र सरकार को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति पर काम कर रही है। 

नायडू करेंगे चर्चा, भाजपा ने जारी किया व्हिप
वहीं, सदन को चलाने के लिए सभापति वेंकैया नायडू भी सक्रिय हैं। कल सुबह सदन की बैठक की शुरुआत होने से पहले वह भी विभिन्न दलों के नेताओं से चर्चा करेंगे। भाजपा के राज्यसभा सांसद और पार्टी के नेता शिव प्रताप शुक्ल ने सभी सदस्यों को सदन में उपस्थित रहने, महत्वपूर्ण बिल की संवेदनशीलता को देखते हुए जिम्मेदारी निभाने हेतु व्हिप जारी कर दिया है। कुल मिलाकर सरकार और पार्टी दोनों सक्रिय हैं। लगातार कोशिशें जारी हैं। केंद्र सरकार इस मुद्दे पर जनता के बीच किसी तरह का गलत संदेश नहीं जाने देना चाहती है। ऐसा माना जा रहा है कि इसे ध्यान में रखकर सोमवार को केन्द्र सरकार के मंत्रियों के बयान भी आने शुरू हो जाएंगे।

एक बदलाव यह भी देख लीजिए

किसान संगठनों के 12 महीने के आंदोलन में कई पड़ाव आए। 26 जनवरी को दिल्ली में किसान आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा के बाद भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने धार दे दी थी। थोड़े समय बाद पंजाब, हरियाणा, म.प्र. समेत अन्य राज्यों के किसान नेता क्षेत्रों में आंदोलन को धार देने लगे थे। लेकिन केंद्र सरकार की तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के बाद दिल्ली, हरियाणा की सीमा पर फिर किसानों और उनके संगठनों का जमावड़ा बढ़ने लगा है। 

पंजाब और हरियाणा के किसान संगठनों ने फिर तेजी से मोर्चा संभाल लिया है। गुरुनाम सिंह चढ़ूनी ने पहले ही राजनीतिक पार्टी की घोषणा कर दी है। अभी राजेवाल की तरफ से कुछ बयान नहीं आया है। किसान संगठन के ही एक प्रमुख नेता का मानना है कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती किसानों के आंदोलन को राजनीतिक होने से बचाना है। इसका अराजनैतिक रहना ही ठीक है। ऐसा न हुआ तो भविष्य में किसान देश की शहरी मध्यवर्ग की जनता समेत तमाम का विश्वास खो देंगे। भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के प्रमुख हरपाल सिंह चौधरी का कहना है कि लोगों को स्व. महेन्द्र सिंह टिकैत के राजनीतिक पार्टी बनाने के निर्णय और नतीजे से लोगों को सबक लेना चाहिए।
 

क्या है सरकार के सामने संकट?

किसान संगठन की तीन प्रमुख मांगें काफी जटिल हैं। पहली मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने की है। इसे मान लेना केंद्र सरकार के लिए बहुत आसान नहीं है। दूसरी मांग किसान आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिजनों को मुआवजा देने, दर्ज मुकदमों की वापसी और बिजली के बिल से जुड़ी है। नई मांग केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी के इस्तीफे की है। तीनों मांगों को मानने का अर्थ हुआ केन्द्र की सरकार घुटनों के बल आ जाएगी। इससे जनता में सीधा संदेश जाएगा कि सरकार ने न केवल कृषि क्षेत्र को लेकर देश में गलत कानून को थोपने की कोशिश की, बल्कि इसका मकसद किसानों को गुमराह करना भी था। इससे विपक्ष को बैठे बिठाए सरकार को कठघरे में खड़ा करने का बड़ा अवसर भी मिल जाएगा। 

 
विज्ञापन

कानूनों की वापसी प्रक्रिया में नहीं होगी दिक्कत

केंद्र सरकार के रणनीतिकारों को भरोसा है कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए संसदीय प्रक्रिया पूरी होने में किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा। एक वरिष्ठ अधिकारी का भी कहना है कि जब कानून आ सकता है तो संसदीय प्रक्रिया से रद्द भी हो सकता है। पश्चिमी उ.प्र. के एक सांसद का कहना है कि विपक्ष भी चाहता है कि तीनों कृषि कानून वापस लिए जाएं। प्रधानमंत्री ने 19 नवंबर को इसकी घोषणा कर दी है। यह कानून छोटे किसानों के हित में था। केवल मुट्ठी भर बड़े किसान इससे नाराज थे। सूत्र का कहना है कि कैबिनेट से इन्हें वापस लेने का प्रस्ताव पास हो गया है। अब विपक्ष की भी मजबूरी है कि वह किसानों की नाराजगी से बचने के लिए कानूनों की वापसी की प्रक्रिया में साथ दे। प्रधानमंत्री ने यह निर्णय किसानों के सम्मान में लिया है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें