कांग्रेस के एक पूर्व महासचिव कहते हैं कि तीनों कृषि कानूनों के संसद से पारित होने के दौरान इस पर राजनीति शुरू हुई और अभी तक जारी है। जो निर्णय तब लिए गए वह राजनीतिक थे, जो अब लिए जा रहे हैं, वह भी राजनीतिक हैं। किसान आंदोलन भी राजनीतिक होता जा रहा है। इसलिए अब इसका समाधान भी किसी राजनीतिक तरीके से ही संभव है।
खड़गे ने बुलाई बैठक
फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता। प्राप्त सूचना के अनुसार तीनों कृषि कानूनों की वापसी को लेकर पेश किए जाने वाले मसौदे के बाबद राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोमवार 29 नवंबर को सुबह बैठक बुलाई है। इसमें विपक्षी दलों के नेता भी शामिल होंगे। कांग्रेस पार्टी विपक्षी दलों की एकजुटता के साथ केन्द्र सरकार को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति पर काम कर रही है।
नायडू करेंगे चर्चा, भाजपा ने जारी किया व्हिप
वहीं, सदन को चलाने के लिए सभापति वेंकैया नायडू भी सक्रिय हैं। कल सुबह सदन की बैठक की शुरुआत होने से पहले वह भी विभिन्न दलों के नेताओं से चर्चा करेंगे। भाजपा के राज्यसभा सांसद और पार्टी के नेता शिव प्रताप शुक्ल ने सभी सदस्यों को सदन में उपस्थित रहने, महत्वपूर्ण बिल की संवेदनशीलता को देखते हुए जिम्मेदारी निभाने हेतु व्हिप जारी कर दिया है। कुल मिलाकर सरकार और पार्टी दोनों सक्रिय हैं। लगातार कोशिशें जारी हैं। केंद्र सरकार इस मुद्दे पर जनता के बीच किसी तरह का गलत संदेश नहीं जाने देना चाहती है। ऐसा माना जा रहा है कि इसे ध्यान में रखकर सोमवार को केन्द्र सरकार के मंत्रियों के बयान भी आने शुरू हो जाएंगे।
किसान संगठनों के 12 महीने के आंदोलन में कई पड़ाव आए। 26 जनवरी को दिल्ली में किसान आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा के बाद भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने धार दे दी थी। थोड़े समय बाद पंजाब, हरियाणा, म.प्र. समेत अन्य राज्यों के किसान नेता क्षेत्रों में आंदोलन को धार देने लगे थे। लेकिन केंद्र सरकार की तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के बाद दिल्ली, हरियाणा की सीमा पर फिर किसानों और उनके संगठनों का जमावड़ा बढ़ने लगा है।
पंजाब और हरियाणा के किसान संगठनों ने फिर तेजी से मोर्चा संभाल लिया है। गुरुनाम सिंह चढ़ूनी ने पहले ही राजनीतिक पार्टी की घोषणा कर दी है। अभी राजेवाल की तरफ से कुछ बयान नहीं आया है। किसान संगठन के ही एक प्रमुख नेता का मानना है कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती किसानों के आंदोलन को राजनीतिक होने से बचाना है। इसका अराजनैतिक रहना ही ठीक है। ऐसा न हुआ तो भविष्य में किसान देश की शहरी मध्यवर्ग की जनता समेत तमाम का विश्वास खो देंगे। भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के प्रमुख हरपाल सिंह चौधरी का कहना है कि लोगों को स्व. महेन्द्र सिंह टिकैत के राजनीतिक पार्टी बनाने के निर्णय और नतीजे से लोगों को सबक लेना चाहिए।
किसान संगठन की तीन प्रमुख मांगें काफी जटिल हैं। पहली मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने की है। इसे मान लेना केंद्र सरकार के लिए बहुत आसान नहीं है। दूसरी मांग किसान आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिजनों को मुआवजा देने, दर्ज मुकदमों की वापसी और बिजली के बिल से जुड़ी है। नई मांग केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी के इस्तीफे की है। तीनों मांगों को मानने का अर्थ हुआ केन्द्र की सरकार घुटनों के बल आ जाएगी। इससे जनता में सीधा संदेश जाएगा कि सरकार ने न केवल कृषि क्षेत्र को लेकर देश में गलत कानून को थोपने की कोशिश की, बल्कि इसका मकसद किसानों को गुमराह करना भी था। इससे विपक्ष को बैठे बिठाए सरकार को कठघरे में खड़ा करने का बड़ा अवसर भी मिल जाएगा।
केंद्र सरकार के रणनीतिकारों को भरोसा है कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए संसदीय प्रक्रिया पूरी होने में किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा। एक वरिष्ठ अधिकारी का भी कहना है कि जब कानून आ सकता है तो संसदीय प्रक्रिया से रद्द भी हो सकता है। पश्चिमी उ.प्र. के एक सांसद का कहना है कि विपक्ष भी चाहता है कि तीनों कृषि कानून वापस लिए जाएं। प्रधानमंत्री ने 19 नवंबर को इसकी घोषणा कर दी है। यह कानून छोटे किसानों के हित में था। केवल मुट्ठी भर बड़े किसान इससे नाराज थे। सूत्र का कहना है कि कैबिनेट से इन्हें वापस लेने का प्रस्ताव पास हो गया है। अब विपक्ष की भी मजबूरी है कि वह किसानों की नाराजगी से बचने के लिए कानूनों की वापसी की प्रक्रिया में साथ दे। प्रधानमंत्री ने यह निर्णय किसानों के सम्मान में लिया है।