भारत अफगानिस्तान से हिंदू और सिख समुदाय के लोगों को निकालना चाहता है। नई दिल्ली की कोशिश पहले अपने नागरिकों को भारत लाने की है और उसके इस प्रयास में दुनिया के साथ छह से अधिक देश साथ दे रहे हैं। अमेरिका, यूएई और कतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह सब प्रधानमंत्री मोदी, एनएसए अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर के प्रयासों से संभव हो पा रहा है। लेकिन दुविधा की बात यह भी कि भारत जिन्हें अफगानिस्तान से लाना चाह रहा है, उनकी पहली पसंद अमेरिका में ही शरणार्थी बनना है। भारतीय रणनीतिकारों को आशंका है कि इसके चलते इस पूरी कवायद में थोड़ा समय लगने और जटिलताएं बढऩे की संभावना है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और रणनीतिकारों का मानना है कि फिलहाल जहां तक संभव हो, अफगानिस्तान के मामले में भारत तटस्थ की भूमिका में रहे। विदेश मामलों के जानकार प्रो. एसडी मुनि पहले ही सावधान कर चुके हैं। अमर उजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि अभी भी स्थितियां बहुत साफ नहीं है।
प्रो. मुनि कहते हैं कि 31 अगस्त को अमेरिकी फौज की वापसी प्रक्रिया ही सबकुछ तय करेगी। फिलहाल अफगानिस्तान की तस्वीर साफ नहीं है। तालिबान इस समय काबुल, कंधार, हेरात समेत हर जगह पावर शेयरिंग की योजना में मशगूल है। प्रो. मुनि कहते हैं कि नादर्न अलायंस और पंजशीर चाहे जितना जोश भर ले, लेकिन तालिबान को अफगानिस्तान से उखाड़ फेंकना इतना आसान नहीं है। क्योंकि अब उनके पास हथियार आ गए हैं। पाकिस्तान, चीन समेत कुछ का समर्थन भी आ रहा है। विश्व बैंक, आईएमएफ संस्थाएं प्रयास कर रही हैं। इससे तालिबान और उनकी बनने वाली सरकार के सामने परेशानी खड़ी होगी। तालिबान भी पिछले दौर की तरह सत्ता नहीं चलाने और मानव अधिकार को मानने की बात कह रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से बात की है। इसमें द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, अंतरराष्ट्रीय मुद्दे और अफगानिस्तान के हालात को लेकर विशेष चर्चा होने की संभावना है। माना जा रहा है कि इस दौरान दोनों शिखर नेताओं ने एक दूसरे को सहयोग और विश्वसनीयता बनाए रखने का भरोसा दिया है। पुतिन अफगानिस्तान में तालिबान को समर्थन देकर बड़ा खेल कर रहे हैं। जबकि 1979 में रूस ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था। 1989 में वहां से लौट आया था और अमेरिका, पाकिस्तान समर्थित इन्हीं मुजाहिद्दीनों, तालिबानियों ने तब रूस के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। जब रूस ने अफगानिस्तान से पैर पीछे खींचने शुरू किए थे तो पाकिस्तान में प्रशिक्षित हिजबुल मुजाहिद्दीन ने भारत के जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को हवा दे दी थी। भारत आज तक इसका दंश भुगत रहा है। क्योंकि 80 के दशक में भारत रूस के साथ खड़ा था। पाकिस्तान के सिर पर अमेरिका का हाथ था। 2001 आते-आते यही परिदृश्य बदलना शुरू हो गया। नौ सितंबर को अमेरिका में ट्विन टावर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ जंग छेड़ दी।