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कूटनीति: अफगानिस्तान में बढ़ गई हैं पेचीदगियां, भारत को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत

शशिधर पाठक
Updated Wed, 25 Aug 2021 03:11 PM IST

सार

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और रणनीतिकारों का मानना है कि फिलहाल जहां तक संभव हो, अफगानिस्तान के मामले में भारत तटस्थ की भूमिका में रहे। प्रो. मुनि कहते हैं कि 31 अगस्त को अमेरिकी फौज की वापसी प्रक्रिया ही सबकुछ तय करेगी। फिलहाल तालिबान इस समय काबुल, कंधार, हेरात समेत हर जगह पावर शेयरिंग की योजना में मशगूल है...
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तालिबानी आतंकी - फोटो : PTI (File Photo)

भारत अफगानिस्तान से हिंदू और सिख समुदाय के लोगों को निकालना चाहता है। नई दिल्ली की कोशिश पहले अपने नागरिकों को भारत लाने की है और उसके इस प्रयास में दुनिया के साथ छह से अधिक देश साथ दे रहे हैं। अमेरिका, यूएई और कतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह सब प्रधानमंत्री मोदी, एनएसए अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर के प्रयासों से संभव हो पा रहा है। लेकिन दुविधा की बात यह भी कि भारत जिन्हें अफगानिस्तान से लाना चाह रहा है, उनकी पहली पसंद अमेरिका में ही शरणार्थी बनना है। भारतीय रणनीतिकारों को आशंका है कि इसके चलते इस पूरी कवायद में थोड़ा समय लगने और जटिलताएं बढऩे की संभावना है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और रणनीतिकारों का मानना है कि फिलहाल जहां तक संभव हो, अफगानिस्तान के मामले में भारत तटस्थ की भूमिका में रहे। विदेश मामलों के जानकार प्रो. एसडी मुनि पहले ही सावधान कर चुके हैं। अमर उजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि अभी भी स्थितियां बहुत साफ नहीं है।

अभी साफ नहीं है तस्वीर

प्रो. मुनि कहते हैं कि 31 अगस्त को अमेरिकी फौज की वापसी प्रक्रिया ही सबकुछ तय करेगी। फिलहाल अफगानिस्तान की तस्वीर साफ नहीं है। तालिबान इस समय काबुल, कंधार, हेरात समेत हर जगह पावर शेयरिंग की योजना में मशगूल है। प्रो. मुनि कहते हैं कि नादर्न अलायंस और पंजशीर चाहे जितना जोश भर ले, लेकिन तालिबान को अफगानिस्तान से उखाड़ फेंकना इतना आसान नहीं है। क्योंकि अब उनके पास हथियार आ गए हैं। पाकिस्तान, चीन समेत कुछ का समर्थन भी आ रहा है। विश्व बैंक, आईएमएफ संस्थाएं प्रयास कर रही हैं। इससे तालिबान और उनकी बनने वाली सरकार के सामने परेशानी खड़ी होगी। तालिबान भी पिछले दौर की तरह सत्ता नहीं चलाने और मानव अधिकार को मानने की बात कह रहे हैं।

क्या हैं जटिलताएं?  

प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से बात की है। इसमें द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, अंतरराष्ट्रीय मुद्दे और अफगानिस्तान के हालात को लेकर विशेष चर्चा होने की संभावना है। माना जा रहा है कि इस दौरान दोनों शिखर नेताओं ने एक दूसरे को सहयोग और विश्वसनीयता बनाए रखने का भरोसा दिया है। पुतिन अफगानिस्तान में तालिबान को समर्थन देकर बड़ा खेल कर रहे हैं। जबकि 1979 में रूस ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था। 1989 में वहां से लौट आया था और अमेरिका, पाकिस्तान समर्थित इन्हीं मुजाहिद्दीनों, तालिबानियों ने तब रूस के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। जब रूस ने अफगानिस्तान से पैर पीछे खींचने शुरू किए थे तो पाकिस्तान में प्रशिक्षित हिजबुल मुजाहिद्दीन ने भारत के जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को हवा दे दी थी। भारत आज तक इसका दंश भुगत रहा है। क्योंकि 80 के दशक में भारत रूस के साथ खड़ा था। पाकिस्तान के सिर पर अमेरिका का हाथ था। 2001 आते-आते यही परिदृश्य बदलना शुरू हो गया। नौ सितंबर को अमेरिका में ट्विन टावर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ जंग छेड़ दी।



अमेरिका के अफगानिस्तान की धरती पर उतरने के बाद भारत ने अफगानिस्तान के निर्माण में भूमिका निभाई। जबकि धीरे-धीरे पाकिस्तान अमेरिका से दूर होकर चीन के करीब चला गया। चीन के जरिए रूस से संबंध करीब होने की शुरुआत हुई। भारत के साथ शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य बना और पूरे समीकरण बदल गए।

प्रधानमंत्री मोदी की यह वार्ता विदेश मंत्री एस जयशंकर के रूस में समकक्ष सर्गेई लावरोव से बेहतर समीकरण बनाने के प्रयास, एनएसए डोभाल की कोशिश के बाद हुई है। इससे पहले जय शंकर अमेरिका के विदेश मंत्री ब्लिंकन और यूएई, कतर समेत अन्य विदेश मंत्रियों के साथ चर्चा कर चुके हैं। एनएसए अपने समकक्षों से चर्चा करके समीकरण साधने में लगे हैं। एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में सोमवार को अमेरिका के सीआईए प्रमुख ने भी तालिबान के नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर से भेंट की है। अमेरिका के विदेश मंत्री एटोंनी ब्लिंकन अपने हितों की रक्षा के लिए तालिबान के नेताओं के संपर्क में है।

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तालिबानी आतंकी - फोटो : PTI (File Photo)
भारत अफगानिस्तान से हिंदू और सिख समुदाय के लोगों को निकालना चाहता है। नई दिल्ली की कोशिश पहले अपने नागरिकों को भारत लाने की है और उसके इस प्रयास में दुनिया के साथ छह से अधिक देश साथ दे रहे हैं। अमेरिका, यूएई और कतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह सब प्रधानमंत्री मोदी, एनएसए अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर के प्रयासों से संभव हो पा रहा है। लेकिन दुविधा की बात यह भी कि भारत जिन्हें अफगानिस्तान से लाना चाह रहा है, उनकी पहली पसंद अमेरिका में ही शरणार्थी बनना है। भारतीय रणनीतिकारों को आशंका है कि इसके चलते इस पूरी कवायद में थोड़ा समय लगने और जटिलताएं बढऩे की संभावना है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और रणनीतिकारों का मानना है कि फिलहाल जहां तक संभव हो, अफगानिस्तान के मामले में भारत तटस्थ की भूमिका में रहे। विदेश मामलों के जानकार प्रो. एसडी मुनि पहले ही सावधान कर चुके हैं। अमर उजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि अभी भी स्थितियां बहुत साफ नहीं है।

अभी साफ नहीं है तस्वीर

प्रो. मुनि कहते हैं कि 31 अगस्त को अमेरिकी फौज की वापसी प्रक्रिया ही सबकुछ तय करेगी। फिलहाल अफगानिस्तान की तस्वीर साफ नहीं है। तालिबान इस समय काबुल, कंधार, हेरात समेत हर जगह पावर शेयरिंग की योजना में मशगूल है। प्रो. मुनि कहते हैं कि नादर्न अलायंस और पंजशीर चाहे जितना जोश भर ले, लेकिन तालिबान को अफगानिस्तान से उखाड़ फेंकना इतना आसान नहीं है। क्योंकि अब उनके पास हथियार आ गए हैं। पाकिस्तान, चीन समेत कुछ का समर्थन भी आ रहा है। विश्व बैंक, आईएमएफ संस्थाएं प्रयास कर रही हैं। इससे तालिबान और उनकी बनने वाली सरकार के सामने परेशानी खड़ी होगी। तालिबान भी पिछले दौर की तरह सत्ता नहीं चलाने और मानव अधिकार को मानने की बात कह रहे हैं।

क्या हैं जटिलताएं?  

प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से बात की है। इसमें द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, अंतरराष्ट्रीय मुद्दे और अफगानिस्तान के हालात को लेकर विशेष चर्चा होने की संभावना है। माना जा रहा है कि इस दौरान दोनों शिखर नेताओं ने एक दूसरे को सहयोग और विश्वसनीयता बनाए रखने का भरोसा दिया है। पुतिन अफगानिस्तान में तालिबान को समर्थन देकर बड़ा खेल कर रहे हैं। जबकि 1979 में रूस ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था। 1989 में वहां से लौट आया था और अमेरिका, पाकिस्तान समर्थित इन्हीं मुजाहिद्दीनों, तालिबानियों ने तब रूस के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। जब रूस ने अफगानिस्तान से पैर पीछे खींचने शुरू किए थे तो पाकिस्तान में प्रशिक्षित हिजबुल मुजाहिद्दीन ने भारत के जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को हवा दे दी थी। भारत आज तक इसका दंश भुगत रहा है। क्योंकि 80 के दशक में भारत रूस के साथ खड़ा था। पाकिस्तान के सिर पर अमेरिका का हाथ था। 2001 आते-आते यही परिदृश्य बदलना शुरू हो गया। नौ सितंबर को अमेरिका में ट्विन टावर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ जंग छेड़ दी।

अमेरिका के अफगानिस्तान की धरती पर उतरने के बाद भारत ने अफगानिस्तान के निर्माण में भूमिका निभाई। जबकि धीरे-धीरे पाकिस्तान अमेरिका से दूर होकर चीन के करीब चला गया। चीन के जरिए रूस से संबंध करीब होने की शुरुआत हुई। भारत के साथ शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य बना और पूरे समीकरण बदल गए।

प्रधानमंत्री मोदी की यह वार्ता विदेश मंत्री एस जयशंकर के रूस में समकक्ष सर्गेई लावरोव से बेहतर समीकरण बनाने के प्रयास, एनएसए डोभाल की कोशिश के बाद हुई है। इससे पहले जय शंकर अमेरिका के विदेश मंत्री ब्लिंकन और यूएई, कतर समेत अन्य विदेश मंत्रियों के साथ चर्चा कर चुके हैं। एनएसए अपने समकक्षों से चर्चा करके समीकरण साधने में लगे हैं। एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में सोमवार को अमेरिका के सीआईए प्रमुख ने भी तालिबान के नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर से भेंट की है। अमेरिका के विदेश मंत्री एटोंनी ब्लिंकन अपने हितों की रक्षा के लिए तालिबान के नेताओं के संपर्क में है।

तालिबान पर हो रही है दबाव बनाने की कोशिश

भारत अफगानिस्तान का पड़ोसी देश है। पाकिस्तान से भारत के रिश्ते कूटनीति के स्तर पर खराब दौर में चल रहे हैं। पाकिस्तान का अफगानिस्तान और खासकर तालिबान पर खास प्रभाव साफ देखा जा रहा है। पाकिस्तान के साथ-साथ रूस, चीन भी तालिबान से सकारात्मक संबंध लेकर चल रहे हैं। इसे अफगानिस्तान में शांति, स्थायित्व और क्षेत्रीय सुरक्षा की तर्ज पर किया जा रहा है। वहीं दुनिया के 58 से अधिक देशों ने अफगानिस्तान और तालिबान को सहयोग करने की नीति से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। यह अफगानिस्तान और खासकर तालिबान पर दबाव बनाने के लिए है। इसी प्रक्रिया में विश्व बैंक ने अपनी परियोजनाएं, आईएमएफ ने भावी सहायता प्रक्रिया रोकने की घोषणा की है। यूरोपीय देश भी लगातार तालिबान पर दबाव बढ़ा रहे हैं। रूस ने साफ कहा है कि उग्रता, बर्बरता, आतंकवाद नहीं चलेगा। पाकिस्तान को एक डर है कि तालिबान के आने से उसके अपने देश में आतंकी संगठन, कट्टरपंथी आंतरिक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन सकते हैं। चीन को भी उईगर मुसलमानों के भड़कने का डर सता रहा है।

हालांकि प्रो. एसडी मुनि कहते हैं कि विश्व के देशों और संस्थाओं के दबाव ही सब कुछ नहीं हैं। यह दबाव आखिर ईरान या फिर इस्राइल को कितना काबू में ला पाया? फिर भी कोशिश चलती रहनी चाहिए।

भारत के लिए चिंता थोड़ी बड़ी है

पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र और जेएन दीक्षित दोनों कहा करते थे कि पड़ोस में गड़बड़ हो रही हो तो आप उसके असर से नहीं बच सकते। देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की विदेश नीति इसी बुनियाद पर थी और प्रधानमंत्री मोदी का 2014 में पहले की नीति पर ही शपथ ग्रहण समारोह हुआ था। माना जा रहा है कि भारत इसी नीति पर चलकर क्षेत्रीय संतुलन साधने की तेज कवायद कर रहा है।

भारत के लिए क्षेत्रीय स्तर पर बड़ी चिंता इसलिए भी खड़ी हो रही है कि चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ बढ़ रहा है। दरअसल, भारत के लिए मध्य एशिया तक व्यापार, कारोबार, आवाजाही की सीधी पहुंच बनाने के तीन रास्ते हैं। पहला पाकिस्तान के बंदरगाह ग्वादर होकर जाए। दूसरा रास्ता अफगानिस्तान से होकर जाता है। तीसरा रास्ता ईरान के ग्वादर बंदरगाह से कनेक्ट होता है। पाकिस्तान से जाने का सवाल नहीं उठता, अफगानिस्तान में संकट बढ़ रहा है। इसने एशिया के भूगोल में नई उठा पटक पैदा कर दी है।

इससे भी बड़ा सवाल अब सुरक्षा क्षेत्र में बढ़ रही क्षेत्रीय अनिश्चितता ने खड़ा कर दिया है। यह अनिश्चितता आतंकवाद, घुसपैठ और क्षेत्रीय कट्टरपंथ के बढ़ने की प्रबल आशंका के साथ खड़ी है। प्रो. एसडी मुनि तो कहते हैं कि यह आतंकवाद केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रहेगा, देश के अन्य हिस्सों तक और खराब तरीके से फैल सकता है। भारत के रणनीतिकारों में एक वर्ग को भले ही तालिबान के नेता कुछ बदले हुए नजर आ रहे हों, लेकिन पूर्व विदेश सचिव शशांक को भी तालिबान के सुधरने की बहुत उम्मीद नहीं है। एक आशंका साथ-साथ चल रही है कि आने वाले समय में पाकिस्तान की सीमा से घुसपैठ, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद दोनों बढ़ सकता है। भारत इसी आशंका और मर्ज की दवा ढूंढने में लगा है।

तालिबान जा रहा है सरकार बनाने  

तालिबान ने अफगानिस्तान में सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सदर इब्राहिम कार्यवाहक गृहमंत्री, गुल आगा कार्यवाहक वित्त मंत्री, हमदुल्ला नोमानी को काबुल का गवर्नर नियुक्त कर दिया है। नजीबुल्लाह को खुफिया प्रमुख बनाया है। तालिबान की सरकार के लिए सबसे अहम विभाग शिक्षा का है। अब्दुल बाकी को कार्यवाहक उच्च शिक्षा, सखाउल्लाह को कार्यवाहक शिक्षा प्रमुख का कार्यभार दे दिया गया है। यह सब मुल्ला अब्दुल गनी बरादर की सहमति से तय हो रहा है। सरकार बनाने की प्रक्रिया से पहले बरादर ने पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजाई और अशरफ गनी के समय में अफगानिस्तान के सीईओ रहे अब्दुल्ला अब्दुल्ला से विमर्श के बाद इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। इस सब के बीच दुनिया के देशों के राष्ट्राध्यक्षों की निगाह तालिबान के प्रमुख हिबैतुल्लाह अखुंदजादा को ढूंढ रही है। वह पिछले काफी समय से कहीं और किसी सार्वजनिक प्लेटफार्म पर दिखाई नहीं दे रहा है।

अमेरिकी फौज की वापसी पर टिकी है निगाह

तालिबान के नेताओं की निगाह अमेरिका की सैन्य वापसी पर टिकी है। तालिबान सरकार के सूचना एवं प्रसारण का प्रभार संभाल रहे जबीहुल्लाह मुजाहिद ने दो दिन पहले कहा था कि जब तक अमेरिका के सैनिकों की पूर्ण वापसी नहीं हो जाती, तालिबान देश में स्थायी सरकार नहीं बनाएगा। बाइडन की घोषणा और वर्तमान कार्यक्रम के अनुसार 31 अगस्त तक अमेरिका की फौज अफगानिस्तान से पूरी तरह वापस जानी है। सोमवार को अमेरिका के सीआईए प्रमुख विलियम जे बर्न ने तालिबान प्रमुख मुल्ला अब्दुल गनी बरादर से भेंट की है। निश्चित रूप से इसमें अमेरिकी फौज की वापसी के बारे में चर्चा हुई होगी। माना जा रहा है जल्द ही अमेरिका कोई निर्णायक नतीजे पर पहुंच सकता है। इसी नतीजे पर तालिबान के नेताओं की भी निगाह टिकी है। इसके बाद काबुल एयरपोर्ट पर वह काबिज हो जाएंगे और उन्हें अपने रास्ते का कांटा हटता हुआ दिखाई देगा। इसी घटना क्रम पर भारत की भी निगाह टिकी है।
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