‘भारत करे अपने विकास की चिंता’
ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने अमर उजाला को बताया कि ये विकसित देशों के अध्ययन हैं, जिसे भारत जैसे विकासशील देश को हूबहू अपने यहां लागू करने से बचना चाहिए। पिछले 160 सालों से विश्व की अर्थव्यवस्था कोयले-तेल के आसपास घूम रही है। इसे अचानक से गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। ऐसा करने पर भारत को उसी तरह की ब्लैक आउट जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जैसा आज चीन-ब्रिटेन को करना पड़ रहा है।
भारत की वर्तमान ऊर्जा की कुल मांग का 80 फीसदी कोयले-तेल आधारित संयंत्रों से आता है। देश के उपभोग की जा रही कुल बिजली में 70 फीसदी का उत्पादन कोयला आधारित बिजली घरों में किया जाता है। आबादी, रोजगार और विकास के कारण यह गति और तेज रफ्तार से बढ़ने वाली है। ऐसे में विश्व की चिंता किए बिना न्यूनतम अगले 30 सालों के लिए भारत को पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में निवेश जारी रखना चाहिए।
गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने में भारत विश्व के अग्रणी देशों में शुमार है। एक समय शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए इसे लगातार बढ़ावा दिया जाना चाहिए, लेकिन यदि केवल इसी स्रोत पर भरोसा किया गया, तो इससे देश का विकास बाधित हो सकता है।
प्रदूषण के मानकों को प्राप्त करने के लिए भारत को तकनीकी बदलाव करने होंगे। जैसे इस समय देश में भारत स्टेज एमिशन स्टैंडर्ड यानी बीएस6 पेट्रोल की बिक्री की जा रही है। इससे वाहन आधारित प्रदूषण कम करने में मदद मिली है। इसी प्रकार इंजन में बदलाव, कारखानों से निकलने वाली राख के बेहतर प्रबंधन से प्रदूषण को बेहद कम स्तर पर लाया जा सकता है।