कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच चुनाव आयोग ने पांच राज्यों यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में होने वाले विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान कर दिया है । चुनावों की घोषणा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने कहा कोरोना काल में चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन समय पर चुनाव कराना हमारी जिम्मेदारी भी है। उन्होंने कहा कि यदि भरोसा हो तो कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुए चुनाव कराने का रास्ता निकाला जा सकता है। चुनाव आयोग ने इस बार चुनाव में डिजिटल चुनाव कराने पर ज्यादा जोर दिया है।
ऐसा नहीं है कि कोरोना के दौरान भारत में पहली बार चुनाव हो रहे हैं। इससे पहले 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव और 2021 में पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। लेकिन बीते साल अप्रैल-मई में हुए पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद कोरोना की जबरदस्त दूसरी लहर आई थी। इसे लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को जबरदस्त फटकार लगाई थी। लिहाजा इस चुनाव को लेकर भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सरकारों की चिंता बनी हुई है।
कोरोना से चुनाव प्रचार के सबसे ज्यादा प्रभावित होने की आशंका
लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक प्रमुख पहलू चुनाव प्रचार है, जिसे महामारी ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। राजनीतिक दलों की भी चिंता यही है कि वे कोरोना के बीच चुनाव प्रचार करें तो कैसे करें। जबकि कोरोना के लगातार तेजी से बढ़ रहे मामलों को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट, उत्तराखंड हाईकोर्ट और नीति आयोग तक ने चुनाव आयोग को रैलियों और भीड़-भाड़ वाले कार्यक्रमों पर रोक लगाने का सुझाव दिया है। क्योंकि चुनाव प्रचार का जोखिम यह होता है इससे कोरोना संक्रमण का प्रसार बढ़ सकता है। इसलिए इस बारे में प्रमुख बहसें यहीं चल रही हैं कि क्या चुनाव अभियान को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
चुनाव आयोग
- फोटो : social media
कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच चुनाव आयोग ने पांच राज्यों यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में होने वाले विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान कर दिया है । चुनावों की घोषणा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने कहा कोरोना काल में चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन समय पर चुनाव कराना हमारी जिम्मेदारी भी है। उन्होंने कहा कि यदि भरोसा हो तो कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुए चुनाव कराने का रास्ता निकाला जा सकता है। चुनाव आयोग ने इस बार चुनाव में डिजिटल चुनाव कराने पर ज्यादा जोर दिया है।
ऐसा नहीं है कि कोरोना के दौरान भारत में पहली बार चुनाव हो रहे हैं। इससे पहले 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव और 2021 में पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। लेकिन बीते साल अप्रैल-मई में हुए पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद कोरोना की जबरदस्त दूसरी लहर आई थी। इसे लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को जबरदस्त फटकार लगाई थी। लिहाजा इस चुनाव को लेकर भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सरकारों की चिंता बनी हुई है।
कोरोना से चुनाव प्रचार के सबसे ज्यादा प्रभावित होने की आशंका
लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक प्रमुख पहलू चुनाव प्रचार है, जिसे महामारी ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। राजनीतिक दलों की भी चिंता यही है कि वे कोरोना के बीच चुनाव प्रचार करें तो कैसे करें। जबकि कोरोना के लगातार तेजी से बढ़ रहे मामलों को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट, उत्तराखंड हाईकोर्ट और नीति आयोग तक ने चुनाव आयोग को रैलियों और भीड़-भाड़ वाले कार्यक्रमों पर रोक लगाने का सुझाव दिया है। क्योंकि चुनाव प्रचार का जोखिम यह होता है इससे कोरोना संक्रमण का प्रसार बढ़ सकता है। इसलिए इस बारे में प्रमुख बहसें यहीं चल रही हैं कि क्या चुनाव अभियान को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्रा
- फोटो : एएनआई
संक्रमण रोकने के लिए आयोग ने किए ये उपाय
लिहाजा चुनाव आयोग ने इन चिंताओं को ध्यान में रखते हुए कोरोना गाइडलाइन लागू किया है। सुशील चंद्रा ने कहा सभी चुनाव अधिकारी और कर्मचारी डबल वैक्सिनेटेड होंगे। सभी चुनावकर्मी फ्रंटलाइन वर्कर माने जाएंगे। सभी बूथों को पूरी तरह से सैनिटाइज किया जाएगा। उन्होंने बताया कि सुरक्षित चुनाव कराने के लिए मतदान केंद्रों पर थर्मल स्कैनिंग और सैनिटाइजर का इंतजाम किया गया है। चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को ज्यादा से ज्यादा डिजिटल और वर्चुअल प्रचार करने का सुझाव दिया है। आयोग ने 15 जनवरी तक रोड शो, साइकिल यात्रा, पदयात्रा, बाइक रैली, नुक्कड़ नाटक, रैलियों और जनसभाओं पर रोक लगाई है।
आयोग ने कहा है कि वह 15 जनवरी के बाद कोरोना स्थिति की समीक्षा करेगा, उसके बाद आगे फैसला लिया जाएगा। डोर-टू-डोर प्रचार में केवल पांच लोगों को शामिल होने की मंजूरी है। मतदान के बाद विजय जूलूस निकालने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने राजनीतिक दलों और पार्टियों से अनुरोध किया कि वे ऑनलाइन नॉमिनेशन करने की कोशिश करें ताकि किसी से संपर्क में आने से बच सकें। उन्होंने कहा कि कोविड प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू किया जाएगा और कोविड नियमों के उल्लंघन करने पर कार्रवाई की जाएगी।
2020 में दुनिया में कैसे हुए चुनाव
बहरहाल यह देखना जरूरी है कि कोरोना महामारी के बीच दुनियाभर के देशों ने कोरोना संक्रमण को रोकने के उपाय करते हुए किस तरह अपने लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वाह किया है। हालांकि इस दौरान कई देशों ने अपने चुनाव को आगे के लिए टाल भी दिया, लेकिन जिन देशों ने चुनाव कराए उन्होंने किस तरह के प्रतिबंध लगाए और चुनाव प्रचार के कौन से वैकल्पिक तरीके अपनाए? यह जानने के लिए हमने 2020 में 51 देशों में हुए चुनावों पर किए गए मीडिया रिपोर्ट्स को खंगाला और चुनाव अभियान से जुड़ी यह जानकारी जुटाई है।
श्रीलंका
- फोटो : ANI
चुनाव प्रचार का तरीका बदला
मोटे तौर पर यह बात समझ में आती है चुनाव वाले आधे से ज्यादा देशों ने चुनाव के सभी सार्वजनिक समारोहों और रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। जिस वजह से चुनाव प्रचार के नई तरीके इजाद हुए। पारंपरिक चुनाव प्रचार की सीमाएं टूट गईं। 51 देशों में से 22 (43 प्रतिशत) ने चुनाव के दौरान कड़े कोरोना प्रतिबंधों को देखा।
जुलाई 2020 के संसदीय चुनावों से पहले, सिंगापुर ने रैलियों और सभी चुनावी सभाओं पर प्रभावी रूप से प्रतिबंध लगा दिया। नामांकन केंद्रों में प्रवेश भी प्रतिबंधित था।
मोंटेनेग्रो में, सार्वजनिक सभा 100 लोगों तक सीमित थी और अगस्त 2020 के संसदीय चुनावों से पहले रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
रोमानिया में इनडोर होने वाले सार्वजनिक कार्यक्रमों में केवल 20 और आउटडोर होने वाले कार्यक्रमों में केवल 50 लोगों को शामिल होने की इजाजत थी।
कहां कितने लोगों को मंजूरी मिली
श्रीलंका ने रैलियों और सार्वजनिक सभाओं में केवल 100 लोगों को शामिल होने की मंजूरी दी थी।
जमैका में, अगस्त 2020 के आम चुनाव के दौरान बैठकों में केवल 20 लोगों को शामिल होने की इजाजत मिली। प्रचार-प्रसार में केवल पांच लोगों को जाने की अनुमति थी।
जॉर्डन में, चुनावी सभाओं में केवल 20 लोग ही शामिल हो सकते थे। नवंबर 2020 के आम चुनाव से पहले रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
यूट्यूब
- फोटो : Social Media
सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा
अमेरिका में, नवंबर 2020 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले, रिपब्लिकन और लोकतांत्रिक दोनों पार्टियों ने सोशल मीडिया का उपयोग किया। यहां तक कि पार्टी सम्मेलनों को भी ऑनलाइन आयोजित किया गया।
सिंगापुर में ई-रैलियां की गई। सभी राजनीतिक दलों को रैलियों के लिए अलग-अलग स्लॉट दिए गए। सिंगापुर में सियासी दलों ने फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम के जरिए ई रैलियां की। टीवी और रेडियो पर के माध्यम से अपनी बात जनता तक पहुंचाई। कुवैत में, सोशल मीडिया का व्यापक रूप से उपयोग किया गया था। विशेष रूप से ट्विटर, जूम और व्हाट्सएप का क्योंकि व्यक्तिगत बैठकों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया था
सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर विशेष रूप से प्रतिबंध लगने के कारण सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा। सोशल मीडिया के इस्तेमाल से कई देशों में दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों में भी प्रचार करना आसान और कम खर्चीला हो गया।
लोगों की सुरक्षा के लिए क्या उपाय किए गए
लोगों को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए कई स्वास्थ्य उपाय अपनाए गए। म्यांमार में चुनाव अभियान के दौरान सभी के लिए तापमान जांच अनिवार्य बनाया गया। चिली में इनडोर स्थानों की स्वच्छता पर बहुत ध्यान दिया गया। बार-बार सैनिटाइजेशन हुआ। श्रीलंका में इनडोर हुए सभाओं में सैनिटाइजेशन पर पूरा फोकस किया गया। माइक्रोफोन तक को सैनेटाइज किया गया।
म्यांमार
- फोटो : सोशल मीडिया
क्या प्रतिबंध सख्ती से लागू किए थे?
कुछ देशों ने प्रतिबंधों को सख्ती से लागू किया लेकिन कुछ देशों ने इसमें ढिलाई भी बरती। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक म्यांमार में एक रैली में केवल 50 लोगों को शामिल होने की सीमा लगाई गई थी, बावजूद इसके इस नियम का पालन नहीं किया गया था और ना ही अधिकारियों ने इसे लागू कराने पर जोर दिया था। इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग और फेस मास्क के उपयोग के दिशा-निर्देशों का सम्मान नहीं किया गया। इसी तरह मोल्दोवा में भी 50 से अधिक लोगों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने की अनुमति नहीं थी, लेकिन देखा गया कि उम्मीदवारों ने इस नियम का सम्मान नहीं किया।
कुछ देशों ने सुरक्षा मानकों का पालन सख्ती से नहीं किया
पोलैंड में चुनावों के बारे में मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि दूसरे दौर से ठीक पहले, राजनेताओं ने मतदाताओं के साथ कई सीधी बैठकें आयोजित कीं। यहां तक की बड़ी सभाएं भी की गईं जिसके दौरान कोरोना गाइडलाइन का ठीक से पालन नहीं किया गया। कुछ टिप्पणियों और मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि ज्यादतर देशों ने चुनाव अभियान के प्रतिबंधों और स्वास्थ्य और सुरक्षा उपायों का सम्मान नहीं किया जिस वजह से कोरोना संक्रमण बढ़ने का खतरा दिखा।
कोरोना के दौरान दक्षिण कोरिया
- फोटो : ट्विटर
चुनाव में दक्षिण कोरिया ने मिसाल पेश की
2020 में हुए चुनाव में जहां कई देश चुनाव के दौरान कोरोना गाइडलाइन का सख्ती से पालन कराने में विफल रहें। वहीं इस मामले में दक्षिण कोरिया ने मिसाल पेश की। दक्षिण कोरिया ने सिखाया कि कैसे सुरक्षित रूप से कोरोना संकट के दौरान भी चुनाव कराए जा सकते हैं। अप्रैल में, कोरोना प्रकोप के बीच राष्ट्रीय चुनाव कराने वाला दक्षिण कोरिया पहला देश बन गया था। संक्रमण के खतरे के बावजूद मतदाता बड़ी संख्या में घरों से निकले। इस देश ने अप्रैल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान ही चुनाव कराने के लिए एक उचित योजना तैयार की और महामारी के दौरान ही सफलतापूर्वक चुनाव कराए।
दक्षिण कोरिया ने क्या योजना बनाई थी
सबसे पहले दक्षिण कोरिया ने महामारी से निपटने के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय योजना बनाई। जिसमें परीक्षण, ट्रैकिंग के लिए एक व्यापक प्रणाली विकसित की गई। सामाजिक दूरी और सार्वजनिक आयोजनों पर दिशानिर्देश दिए गए। दक्षिण कोरिया में कभी लॉकडाउन नहीं लगा।
मतदान कर्मचारियों, स्वयंसेवकों और मतदाताओं के लिए सख्त प्रोटोकॉल लागू थे। मतदान केंद्रों को बार-बार कीटाणुरहित किया गया। मतदाताओं के बीच शारीरिक दूरी बनाने, दस्ताने- मास्क पहनने और हाथ को साफ करने के अनिवार्य नियम बनाकर चुनाव संपन्न कराए गए। मतदान बूथों पर पहुंचने पर मतदाताओं ने अपना तापमान खुद चेक किया।