देश में किसान राजनीति एक अहम मोड़ पर खड़ी है। केवल वर्तमान ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी लोगों का भरोसा और संघर्ष दोनों दांव पर लगा है। किसान आंदोलन के दौरान सियासतदानों को अपने मंच पर कुर्सी न देने वाले किसान संगठन आज उनके साथ चुनावी गठबंधन करने की कोशिश में हैं तो यह बात आम लोगों के विश्वास को ठेस पहुंचा रही है। अगर ऐसा हुआ तो उन लोगों का विश्वास टूटेगा, जिन्होंने एक साल तक किसान आंदोलन की वजह से अनेक मुसीबतें झेली हैं।
किसान नेता चौधरी हरपाल सिंह बिलारी कहते हैं कि त्याग के बदले जो सम्मान मिलता है, उसका कोई मुकाबला नहीं। पंजाब के दो दर्जन किसान संगठनों ने चुनाव में कूदने का ऐलान कर दिया है, यह उनका अपना निर्णय है। किसान आंदोलन में अब वे नहीं आएंगे तो दूसरा कोई आएगा। संघर्ष के मैदान में नए खिलाड़ी होंगे। दूसरी तरफ किसान नेता सरदार वीएम सिंह के अनुसार, पंजाब की तर्ज पर यूपी चुनाव में भी किसान सियासत की भरपूर संभावनाएं हैं। केवल गन्ना खेती से जुड़े परिवार, चाहे किसान हों या श्रमिक, इनकी संख्या तीन करोड़ से ज्यादा बैठती है। ऐसे में चुनाव पर दांव लग सकता है।
'संयुक्त समाज मोर्चा' के बैनर तले चुनाव मैदान में किसान संगठन
पंजाब में 25 किसान संगठनों ने 'संयुक्त समाज मोर्चा' के बैनर तले चुनाव मैदान में उतरने की घोषणा की है। किसान संगठनों की एक ही सोच है कि उन्होंने एक साल तक जो संघर्ष किया है, सड़क पर बैठे रहे हैं और केंद्र को झुकने पर मजबूर कर दिया, उसे लेकर जनता उनका साथ देगी। पंजाब में ग्रामीण क्षेत्र में इन संगठनों को लोगों का समर्थन मिलने की उम्मीद है। जानकारों का कहना है कि 'संयुक्त समाज मोर्चा' अगर ज्यादा कुछ नहीं कर पाता है तो वह शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है। इन दोनों पार्टियों का ग्रामीण इलाकों में खासा प्रभाव रहा है। ये अलग बात है कि संयुक्त किसान मोर्चा ने साफ कर दिया है कि उनका इस पार्टी से कोई सरोकार नहीं है। किसान संगठन चुनाव लड़ रहे हैं, यह उनकी मर्जी है। एसकेएम के वरिष्ठ सदस्य दर्शन पाल कहते हैं कि जो किसान नेता राजनीति में जा रहे हैं, आप इनका नतीजा भी देखेंगे। ये अपने गलत निर्णय पर पछताएंगे।
ये नेता अगर चुनाव में फेल हुए तो...
भारतीय किसान यूनियन 'असली अराजनीतिक संगठन' के अध्यक्ष चौधरी हरपाल सिंह बिलारी ने बताया, जब कोई चुनाव लड़ता है तो उसकी ईमानदारी पर संदेह होता है। किसान आंदोलन का मतलब ये नहीं था कि इन नेताओं को चुनाव लड़ना है। ऐसे नेताओं को जनता, स्वीकार नहीं करती है। अब किसान संगठनों ने पंजाब चुनाव में उतरने का मन बना लिया है तो क्या कहा जा सकता है। वे चुनाव लड़ें, मगर ड्रामा न करें। उसके बाद भी किसानों के लिए संघर्ष करते रहें। इतना तय है कि ये नेता अगर चुनाव में फेल हुए तो दोबारा से लोगों के बीच नहीं आ सकेंगे। लोगों ने किसान आंदोलन पर बहुत भरोसा किया है। उन्हें कितनी तकलीफें हुई, लेकिन जनता ने किसानों का साथ नहीं छोड़ा। अब किसानों को चुनाव में कूदते देख लोगों के विश्वास को ठेस तो लगेगी ही। लोग पूछेंगे कि आंदोलन में जिन नेताओं को मंच नहीं दिया, आज उन्हीं नेताओं के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी हो रही है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर यह कह रहे हैं कि सरकार दोबारा से तीन कृषि कानूनों पर विचार कर रही है। वे ऐसा नहीं होने देंगे। आज जो किसान नेता, सियासत में कूद रहे हैं, उनकी जगह दूसरे लोग आ जाएंगे। वे संघर्ष करेंगे और जीतेंगे। अब एमएसपी पर संघर्ष होगा।
वीएम सिंह का सवाल, किसान को क्या मिला?
सरदार वीएम सिंह कहते हैं कि किसान नेता चुनाव लड़ें या न लड़ें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां मतलब केवल इससे है कि किसान को क्या मिला। किसान को उसका हक मिलना जरूरी है। किसान के साथ लोगों का विश्वास है तो यूपी चुनाव लड़ना भी संभव है। यहां दिक्कत दूसरी है। एक बड़े किसान नेता ऐसे हैं, जिन पर सरकार को तो भरोसा है, मगर लोगों को नहीं है। अगर ऐसे किसान नेता चुनाव में खड़े होंगे तो बात नहीं बनेगी। यूपी में किसान राजनीति की संभावनाएं हैं। केवल गन्ना किसान की बात करें तो उनकी संख्या लगभग 50 लाख है। खुद सीएम योगी 47 लाख गन्ना किसानों की बात कह चुके हैं। ये सब परिवार हैं। यदि एक परिवार में पांच वोट लगाएं तो सवा दो करोड़ के आसपास पहुंचते हैं। इसके अलावा करीब बीस लाख ऐसे परिवार हैं जो खुद किसान यानी मालिक तो नहीं हैं, मगर वे खेती करते हैं। उन्हें श्रमिक या बंटाई पर खेती करने वाले भी कह सकते हैं। इनके वोटों को देखें तो कुल संख्या साढ़े तीन करोड़ तक चली जाती है। ऐसे में किसान राजनीति की संभावना है। जरूरत है भरोसेमंद किसान नेताओं के मैदान में आने की। राकेश टिकैत और दूसरे किसान संगठन इस बाबत सोच रहे होंगे। आने वाले दिनों में चुनावी तस्वीर साफ हो जाएगी।