इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट या ई-सिगरेट एक बैटरी युक्त उपकरण है, जो निकोटिन वाले घोल को गर्म कर एयरोसोल पैदा करता है। इसके चलते जब कश लगाते हैं तो हीटिंग डिवाइस इसे गर्म करके भाप में बदल देती है। इसलिए इसे स्मोकिंग नहीं वेपिंग कहते हैं। इसका सीधे तौर पर छाती और मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है। विकसित देशों में विशेषकर युवाओं और बच्चों में इसने एक महामारी का रूप ले लिया है।
लंबे समय से ई सिगरेट पर काम कर रहे स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ निदेशक ने इसके हर छोटे बड़े पहलू पर अमर उजाला से बातचीत की। इनके अनुसार करीब 460 ई सिगरेट की कंपनियां देश में एक्टिव हैं। इनके करीब 7 हजार से ज्यादा फ्लैवर उत्पाद बाजारों में बिक रहे हैं जिनका कारोबार करीब 800 करोड़ रुपये के आसपास है, लेकिन इसका ब्लैक मार्केट करीब दोगुना यानि 1500 करोड़ रुपये का है। चीन, कोरिया, जापान और दुबई जैसे देशों से सीधे मुंबई, दिल्ली व गुजरात के रास्ते ई सिगरेट के उत्पादों को बाजारों तक लाया जा रहा है। चूंकि अभी तक कानून नहीं था, इसलिए दुकानों पर खुलेआम इसकी बिक्री होती थी। स्कूली बच्चों से लेकर 20 से 25 वर्ष तक की आयु के युवा अक्सर ई सिगरेट के साथ दिखते भी हैं।
दो साल से केंद्र सरकार ई सिगरेट से जुड़ी नामचीन कंपनियों का दबाव भी झेल रही है। कई कंपनियों की ओर से अलग अलग राज्यों के हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। इतना ही नहीं अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) सहित देश के कई बड़े अस्पतालों के डॉक्टरों से भी ई सिगरेट की पैरवी करा चुके हैं। इतना ही नहीं दबाव बनाने के लिए निजी कंपनियां कई विदेशी रिसर्च तक सरकार के समक्ष रख चुकी हैं। अब तक ये कंपनियां चाहती थीं कि सरकार प्रतिबंध न लगाकर इनके नियमन पर काम करे। ताकि बाकी बीड़ी सिगरेट की तरह ई सिगरेट भी भारत में सख्त नियमों के साथ बिक्री हो सके। हालांकि एक सच ये भी है कि ई सिगरेट के दुष्प्रभावों को लेकर अब तक भारत के पास कोई भी सटीक अध्ययन नहीं है।
अध्यादेश के साथ ही यदि किसी के पास ई-सिगरेट का स्टॉक है। इस्तेमाल करते हैं या फिर बिक्री करते हैं तो उन्हें निकटतम पुलिस स्टेशन जाकर इसकी घोषणा करके जमा कराना होगा। अध्यादेश में इस तरह के मामलों पर कार्रवाई के लिए पुलिस उपनिरीक्षक स्तर के अधिकारी को नामित किया गया है। राज्य सरकार इसके समकक्ष के अधिकारी को भी नामित कर सकती है।