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Durga Ashtami 2021: यदि सिर्फ बेटे ही पसंद आएंगे तो, पूजन के लिए कन्याओं को ढूंढते रह जाएंगे

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Wed, 13 Oct 2021 02:21 PM IST

सार

2018 में राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के आधिकारिक सर्वेक्षण में कहा गया कि अभी भी परिवारों में बेटों को बेटियों के मुकाबले ज्यादा वरीयता दी जाती है।  2011-2013 में  देश में जन्म के समय औसत लिंगानुपात प्रत्येक 1,100  बेटों पर 1,000 बेटियों के साथ सबसे बेहतर स्तर पर पहुंच गया था। लेकिन उसके बाद हालात खराब होते गए हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2021 की जनगणना में और भी चिंताजनक स्थिति देखी जा सकती है  क्योंकि छोटे परिवार के चलन के कारण ज्यादातर लोगों को परिवार में एक ही बच्चा चाहिए और वह भी बेटा। 
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कन्या पूजन (फाइल फोटो)
नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। दुर्गा अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन और कुंवारी कन्याओं को भोजन कराने का भी विधान है जिससे मां दुर्गा की विशेष कृपा पाई जा सके। लेकिन लैंगिक पक्षपात और भेदभाव के कारण दुर्गा अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन और कन्याओं को भोजन कराने वाले देश में उनकी पूछ बस नवरात्रों तक सिमट कर रह जाती है।

दरअसल देश में लिंगानुपात में जबरदस्त असंतुलन देखा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की ओर से जारी 'वैश्विक आबादी की स्थिति 2020'  रिपोर्ट में कहा गया 2013 से 2017 के बीच दुनिया में 12 लाख लड़कियां जन्म के समय ही कहीं गुम हो गईं। एक अनुमान है कि देश में करीब चार लाख 60 हजार बच्चियां हर साल जन्म के समय ही गुम हो जाया करती हैं। जन्म से पहले और जन्म के बाद उनकी मौत के लिए लैंगिक भेदभाव एक बड़ी वजह है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यदि भारत में स्थिति नहीं सुधरी तो 2055  में लड़कों को शादी के लिए लड़कियां ढूंढना मुश्किल हो जाएगा।


भले ही भारत ने लिंग का पता लगाने के लिए प्रसव पूर्व निदान तकनीकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून हैं, लेकिन प्रजनन क्षमता में गिरावट, गर्भावस्था के दौरान सोनोग्राफिक स्कैनिंग की आसान उपलब्धता के कारण बेटे और बेटी के बीच का भेद जारी है। परिवारों में बेटियों के मुकाबले बेटे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं। इस रुझान और पैटर्न को समझने के लिए पुरुषोत्तम एम कुलकर्णी ने संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के लिए अध्ययन तैयार किया है। 
 
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कन्या पूजन (फाइल फोटो)
नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। दुर्गा अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन और कुंवारी कन्याओं को भोजन कराने का भी विधान है जिससे मां दुर्गा की विशेष कृपा पाई जा सके। लेकिन लैंगिक पक्षपात और भेदभाव के कारण दुर्गा अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन और कन्याओं को भोजन कराने वाले देश में उनकी पूछ बस नवरात्रों तक सिमट कर रह जाती है।

दरअसल देश में लिंगानुपात में जबरदस्त असंतुलन देखा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की ओर से जारी 'वैश्विक आबादी की स्थिति 2020'  रिपोर्ट में कहा गया 2013 से 2017 के बीच दुनिया में 12 लाख लड़कियां जन्म के समय ही कहीं गुम हो गईं। एक अनुमान है कि देश में करीब चार लाख 60 हजार बच्चियां हर साल जन्म के समय ही गुम हो जाया करती हैं। जन्म से पहले और जन्म के बाद उनकी मौत के लिए लैंगिक भेदभाव एक बड़ी वजह है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यदि भारत में स्थिति नहीं सुधरी तो 2055  में लड़कों को शादी के लिए लड़कियां ढूंढना मुश्किल हो जाएगा।

भले ही भारत ने लिंग का पता लगाने के लिए प्रसव पूर्व निदान तकनीकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून हैं, लेकिन प्रजनन क्षमता में गिरावट, गर्भावस्था के दौरान सोनोग्राफिक स्कैनिंग की आसान उपलब्धता के कारण बेटे और बेटी के बीच का भेद जारी है। परिवारों में बेटियों के मुकाबले बेटे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं। इस रुझान और पैटर्न को समझने के लिए पुरुषोत्तम एम कुलकर्णी ने संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के लिए अध्ययन तैयार किया है। 
 

कन्या पूजन करते सीएम योगी आदित्यनाथ। - फोटो : अमर उजाला।
कैसे हुआ अध्ययन
इस अध्ययन के लिए पहले विभिन्न स्रोतों से भारत के जन्म के समय लिंगानुपात (एसआरबी) डेटा की जांच की गई। सबसे पहले विश्वसनीय लगने वाले अनुमानों की पहचान की गई और फिर इनका उपयोग अजन्मी या गुम हो गई बच्चियों की संख्या का अनुमान लगाने के लिए किया गया। 

पक्षपाती लिंग चयन
अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया है कि परिवारों में लिंग चयन में पक्षपात हो रहा है। इस कारण कई बेटियां या तो गर्भ में ही गुम हो रही हैं या फिर जन्म लेने के पांच साल के भीतर उनकी मौतें हो रही है। अध्ययन के मुताबिक  भारत में एसआरबी से यह साफ हो रहा है कि 90 के दशक से पहले तक जब लिंग चयन आसान नहीं था तब प्राकृतिक तौर पर एसआरबी कुछ इस तरह थी। प्रति 100 बच्चियों पर 105 बेटों का जन्म हुआ या 1000 बच्चों पर 950 बच्चियां जन्म ले रही थीं। जबकि भारत में हाल के दशकों में प्रति 1000 लड़कों पर बच्चियों की संख्या 950 से बहुत कम रही है। अध्ययन में 1991-2017 तक विभिन्न स्रोतों से 1000 बेटों पर 860 से 923 बेटियों के जन्म का अनुमान लगाया गया है। 

दुनिया की आधी गुमशुदा बच्चियां भारत में 
वहीं ‘द लांसेट ग्लोबल हेल्थ’ में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक लिंग चयन में भेदभाव के कारण दुनिया की आधी गुमशुदा बच्चियां भारत की होती हैं। लांसेट ने पांच सर्वेक्षणों के आधार पर 2•1 मिलियन बच्चियों के जन्म का इतिहास का खंगाला तो यह पाया गया कि तीन दशकों में (1987-2016) के दौरान प्रति 1000 लड़कों पर 950 लड़कियों का जन्म हुआ और 13•5 मिलियन बच्चियां गायब थीं। यह संख्या 1987-96 में 3•5 मिलियन से बढ़कर 2007-16 में 5•5 मिलियन हो गया। इस दौरान पूरे भारत और लगभग सभी राज्यों में लिंगानुपात में असंतुलन रहा। पंजाब, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान में सबसे ज्यादा असंतुलन देखा गया। 


 

कन्या पूजन
छोटे परिवारों का रुझान
अमेरिका के इलिनॉय में नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी की अर्थशास्त्री सीमा जयचंद्रन ने 2014 में भारत में घटते लिंगानुपात को लेकर एक शोध पत्र तैयार किया था। जिसमें कहा गया कि  भारत में पिछले एक दशक में घटते प्रजनन दर की एक प्रमुख वजह भारत में लिंगानुपात बिगडना भी माना जा सकता है। छोटे परिवार के रुझान के कारण लोग बेटों को जन्म देने में तरजीह देते हैं और इससे घटती प्रजनन क्षमता के बीच गर्भपात की दर भी बढ़ती है।

क्या है वजह
2016-2018 की अवधि के दौरान भारत में प्रति 1,112 लड़कों के अनुपात में 1,000 लड़कियों का जन्म हुआ। लेकिन तब भी यह विश्व बैंक के आंकड़ों के 1,068 के वैश्विक औसत से पीछे रहा। लैंगिक समानता के लिए काम करने वाली एक संस्था पॉपुलेशन फर्स्ट की निदेशक डॉ ए एल शारदा इसकी कई वजहें गिनाती हैं। उनके मुताबिक सरकार बड़े पैमाने पर बेटे और बेटी के बीच का भेद खत्म करने के लिए जागरुकता अभियान चला तो रही है लेकिन सामाजिक तानाबाना और लोगों की मानसिकता ऐसी है कि वे परिवार में ही बेटों की ही पसंद करते हैं।

महिलाओं को आशीर्वाद भी पुरुष केंद्रित
उनका कहना है घरों में महिलाओं को आशीर्वाद भी पुरुष केंद्रित दिया जाता है। धार्मिक तौर पर हम देवियों की पूजा करते हैं और सामाजिक तौर पर पुरुषों को मान्यता देते हैं। यदि बेटी हो भी जाती है तो चाहते हैं कि परिवार में एक लड़का जरूर हो। यदि दो लड़कियां हैं तो परिवार को पूरा नहीं माना जाता है। जबकि दो बेटे हों तो परिवार पूरा मान लिया जाता है। इसके लिए कहीं न कहीं सरकार का वह विज्ञापन का भी दोष है जिसमें दिखाया गया कि पति-पत्नी के साथ दो बच्चें हैं जिसमें एक लड़का और लड़की है।

डॉ शारदा मानती हैं कि सांस्कृतिक और सामाजिक मान्यताओं,  लड़कियों की सुरक्षा और दहेज के कारण बेटियों की परवरिश को लेकर माता-पिता उतने इच्छुक नहीं रहते हैं। इसलिए सामाजिक जागरूकता इस असंतुलन को ठीक किया जा सकता है। 




 
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