नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। दुर्गा अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन और कुंवारी कन्याओं को भोजन कराने का भी विधान है जिससे मां दुर्गा की विशेष कृपा पाई जा सके। लेकिन लैंगिक पक्षपात और भेदभाव के कारण दुर्गा अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन और कन्याओं को भोजन कराने वाले देश में उनकी पूछ बस नवरात्रों तक सिमट कर रह जाती है।
दरअसल देश में लिंगानुपात में जबरदस्त असंतुलन देखा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की ओर से जारी 'वैश्विक आबादी की स्थिति 2020' रिपोर्ट में कहा गया 2013 से 2017 के बीच दुनिया में 12 लाख लड़कियां जन्म के समय ही कहीं गुम हो गईं। एक अनुमान है कि देश में करीब चार लाख 60 हजार बच्चियां हर साल जन्म के समय ही गुम हो जाया करती हैं। जन्म से पहले और जन्म के बाद उनकी मौत के लिए लैंगिक भेदभाव एक बड़ी वजह है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यदि भारत में स्थिति नहीं सुधरी तो 2055 में लड़कों को शादी के लिए लड़कियां ढूंढना मुश्किल हो जाएगा।
भले ही भारत ने लिंग का पता लगाने के लिए प्रसव पूर्व निदान तकनीकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून हैं, लेकिन प्रजनन क्षमता में गिरावट, गर्भावस्था के दौरान सोनोग्राफिक स्कैनिंग की आसान उपलब्धता के कारण बेटे और बेटी के बीच का भेद जारी है। परिवारों में बेटियों के मुकाबले बेटे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं। इस रुझान और पैटर्न को समझने के लिए पुरुषोत्तम एम कुलकर्णी ने संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के लिए अध्ययन तैयार किया है।