आईपीएस गरिमा भटनागर के एक्सटेंशन लैटर में लिखा है, जिस दिन उनकी प्रतिनियुक्ति अवधि खत्म हो गई है, उसी दिन से उन्हें कार्य मुक्त मान लिया जाएगा। अगर सक्षम प्राधिकारी ने जरूरी मंजूरी लेने के बाद उनकी प्रतिनियुक्ति अवधि को खत्म होने से पहले बाकायदा लिखित आदेश में न बढ़ाया हो तो वे कार्रवाई के दायरे में आ जाएंगी। अगर वे स्वीकृत प्रतिनियुक्ति अवधि से ज्यादा समय तक वहां रहती हैं, चाहे किसी भी कारण से, तो ऐसी स्थिति में वे अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में आ सकती हैं। इसके तहत यह प्रावधान भी है कि तय प्रतिनियुक्ति अवधि से अधिक अवधि 'ओवर स्टे' का समय न तो सेवा के लिए काउंट हो सकता है और न ही पेंशन या इंक्रीमेंट के लिए उसे माना जाएगा। पत्र में आगे लिखा है, अनुशासनात्मक कार्रवाई की स्थिति में यह मान लिया जाएगा कि उक्त अधिकारी ने सेवा से त्यागपत्र दे दिया है। विभाग द्वारा उसके लिए जरूरी प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।
खास बात ये है कि भले ही संबंधित अधिकारी ने त्यागपत्र न दिया हो, लेकिन त्यागपत्र मानकर कार्रवाई शुरू कर देंगे। अनुशासनात्मक कार्रवाई, जिसमें कई तरह के आर्थिक एवं सेवाकाल से जुड़े दंड शामिल हैं, उसके साथ ही त्यागपत्र भी मान लिया जाएगा।
यहां दोनों कार्रवाई एक ही साथ करने की बात कही गई है। अगर त्यागपत्र मान लिया जाता है तो अनुशासनात्मक कार्रवाई का क्या फायदा होगा। उसकी रिपोर्ट जैसी भी आए, उसका कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। वजह, संबंधित अधिकारी तो उस वक्त तक सेवा से बाहर हो ही जाएगा। डीओपीटी के एक अधिकारी के मुताबिक, कई बार प्रतिनियुक्ति पर गए अधिकारी तय समय पर अपने मूल कैडर में वापसी नहीं करते। इससे काम प्रभावित होता है। विदेश में प्रतिनियुक्ति पर गए अधिकारियों को अपनी प्रतिनियुक्ति खत्म होते ही तुरंत मूल कैडर में ज्वाइन करना चाहिए। अगर कोई अधिकारी विभाग के नियमों का उल्लंघन करता है तो कार्रवाई भी संभव है।