अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को गत सप्ताह लिखे अपने पत्र में कर्मचारियों की सभी चिंताओं से अवगत करा दिया है। प्रारंभ में कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति अवधि दो वर्ष के लिए थी। बाद में इसे एक वर्ष के लिए और बढ़ा दिया गया। कैबिनेट के निर्णय के अनुसार, सात कंपनियों को सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के निगमों में शामिल होने के लिए अपनी मानव संसाधन नीति/पैकेज को अंतिम रूप देना चाहिए था। अब तक, 7 कंपनियों द्वारा ऐसी कोई एचआर नीति अधिसूचित नहीं की गई है। ऐसे में कर्मचारी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। सरकार और कंपनियों को या तो कर्मचारियों से विकल्प मांगना होगा कि वे 7 कंपनियों में शामिल हों या सरकार में बने रहें। यदि ऐसा नहीं किया गया तो सरकार को डीम्ड प्रतिनियुक्ति अवधि को आगे बढ़ाना होगा। बतौर श्रीकुमार, रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि इस संबंध में निर्णय केवल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और अन्य मंत्रियों की अध्यक्षता वाली अधिकार प्राप्त मंत्री समूह समिति ही ले सकती है।
एआईडीईएफ ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को एक और अभ्यावेदन सौंपा है। उसमें कहा गया है कि फेडरेशन के साथ 16 जुलाई 2021 को रक्षा मंत्री के साथ हुई बैठक में यह आश्वासन दिया गया था कि ओएफबी निगमीकरण के निर्णय को लागू करते समय कर्मचारियों के हितों की रक्षा की जाएगी। उक्त बैठक में एआईडीईएफ के प्रतिनिधियों ने आयुध कारखानों के निगमीकरण के सरकार के फैसले को खारिज कर दिया था। सरकार से यह अनुरोध किया गया था कि इस निर्णय को वापस लिया जाए। आयुध निर्माणी कर्मचारियों की सेवा शर्तों की रक्षा की जाए। श्रीकुमार ने बताया, यूनाइटेड फोरम ऑफ ऑर्डिनेंस एम्प्लॉइज, ने 18 अगस्त 2023 के पत्र के माध्यम से रक्षा सचिव और सचिव (डीपी) को कर्मचारियों की मांगों के बारे में बताया था। उसमें कहा गया कि आयुध कारखानों के सभी कर्मचारी 7 आयुध निर्माणी निगमों/डीपीएसयू में अपनी सेवानिवृत्ति तक सरकारी कर्मचारी के रूप में बने रहेंगे। पत्र में कहा गया है कि सभी सरकारी कर्मचारियों को वेतन, भत्ते और पेंशन आदि का भुगतान भारत की संचित निधि (सीएफआई) से किया जाना चाहिए।
नई पेंशन योजना (एनपीएस) के तहत कवर किए गए सभी सरकारी कर्मचारियों के मामले में नियोक्ता के पेंशन योगदान का भुगतान सीएफआई से किया जाना है, किसी अन्य फंड से नहीं। आयुध कारखानों के सभी सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति की संभावनाएं/ कैरियर की प्रगति/ चिकित्सा और अन्य सभी सुविधाएं/ सेवा शर्तें सेवानिवृत्ति तक वही रहेंगी, जो निगमीकरण से पहले लागू थीं। डीडीपी ने अपने पत्र के माध्यम से सभी 7 डीपीएसयू को 24 जून 2024 तक अपने डीपीएसयू के संबंध में सेवा नियमों/ नीतियों की स्थिति, डीडीपी को सूचित करने के लिए कहा था। यहां यह उल्लेख करना उचित है कि आयुध कारखानों के सभी कर्मचारियों ने एक जनमत संग्रह में अपना फैसला सुनाया है कि वे अपनी सेवानिवृत्ति तक केंद्र सरकार के कर्मचारी/ रक्षा नागरिक कर्मचारी बने रहना चाहते हैं। मौजूदा समय में सभी कर्मचारी, प्रतिनियुक्ति पर हैं।
एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी मांग निगमीकरण को वापस लेने की है। यह एक असफल प्रयोग है। सरकार ने स्वयं निगमों के विलय के लिए एक और सलाहकार नियुक्त किया है, ताकि इसे सात से घटाकर चार कर दिया जाए। यह साबित करता है कि आयुध कारखानों को सात निगमों में विभाजित करने का निर्णय एक गलत निर्णय है। भले ही आयुध कारखानों के कर्मचारी अभी भी सरकारी कर्मचारी बने हुए हैं, लेकिन निगम कर्मचारियों की मौजूदा सेवा शर्तों और लाभ के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके खिलाफ फेडरेशन अपनी लड़ाई जारी रखेगा। निगमों में शामिल होने के बाद बीएसएनएल और एसपीएमसीआईएल के कर्मचारियों को जिस कड़वे अनुभव से गुजरना पड़ा है, वैसी स्थिति आयुध कारखानों के कर्मचारियों की न हो। सरकार ने एक अधिसूचना द्वारा ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के सभी कर्मचारियों को प्रसार भारती निगम में उनकी सेवानिवृत्ति तक, केंद्र सरकार के कर्मचारी के रूप में बने रहने की अनुमति दी है। रक्षा क्षेत्र के सिविल कर्मचारी भी यही मांग कर रहे हैं कि उन्हें सरकारी कर्मचारी बने रहने दिया जाए।
श्रीकुमार ने कहा, संविधान के तहत सरकार को कर्मचारियों की मांग मान लेनी चाहिए। अगर सरकार अपनी बात पर अड़ी रहती है, तो यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन होगा। ऐसे में अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ, तब तक अपनी लड़ाई जारी रखेगा, जब तक सरकार 41 आयुध कारखानों के कर्मचारियों को उनकी सेवानिवृत्ति तक आयुध कारखानों में केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों/ रक्षा नागरिक कर्मचारियों के रूप में मानने के लिए अधिसूचना जारी नहीं करती। कोई भी कर्मचारी, जहां भी काम कर रहा है, वह केंद्र सरकार का कर्मचारी बन कर रहे। इस मामले में कर्मचारियों ने एक जनमत संग्रह भी कराया था। इसमें कर्मचारियों ने साफतौर पर कहा था कि वे निगमों में शामिल नहीं होंगे। अब केंद्र सरकार को अपनी बात पर अड़े नहीं रहना चाहिए। ईजीओएम को कर्मचारियों की मांग स्वीकार करने के लिए आगे आना चाहिए।