फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जब प्यास लगती है, तब कुआं खोदने निकल पड़ते हैं भारत के रक्षा रणनीतिकार!

Thu, 02 Jul 2020 08:25 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • करगिल युद्ध के बाद आई बोफोर्स और सैन्य बलों के आधुनिकीकरण की याद
  • सर्जिकल स्ट्राइक के बाद राफेल लड़ाकू विमान आए याद
  • चीन से तनातनी के बीच याद आ रहे हैं सैनिकों के जरूरी रक्षा संसाधन, साजो-सामान
  • लद्दाख के मौसम से जूझ रहे हैं सैनिक, अब आएंगे स्तरीय कपड़े
विज्ञापन
SU30 MKI in Ladakh - फोटो : PTI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

जब दुश्मन सीना तानकर मुहाने पर चुनौनतियां देने लगता है, तब भारत को अपने शस्त्रागार की याद आती है। चीन से बढ़े तनाव के बीच में रक्षा रणनीतिकारों की यही स्थिति है। डीआरडीओ ने दो साल पहले लंबी दूरी की सतह से मार करने वाली मिसाइल को विकसित किया है, लेकिन रक्षा खरीद मामलों की उच्च समिति डीएसी (डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल) ने गुरुवार को इसकी मंजूरी दी है।

विज्ञापन


बड़ी देर बाद भारत ने 59 मिग-29 फाइटर जेट को उन्नत बनाने, 21 मिग-29 फाइटर जेट नए लेने और 12 सुखोई-30 एमकेआई रूस से लेकर बेड़े में शामिल करने पर सहमति जताई है।

रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में हुई डीएसी ने गुरुवार को 38900 करोड़ रुपये के रक्षा खरीद को मंजूरी दी है। सेना मुख्यालय सूत्रों का कहना है कि इन रक्षा साजो-सामान को सैन्य बलों में लेने का निर्णय हुआ है, लेकिन अभी इन रक्षा साजो-सामान को सैन्य बेड़े में शामिल कराने में समय लगेगा।

प्यास लगने पर कुआं खोदने निकल पड़ते हैं

एक पूर्व वायुसेनाध्यक्ष ने कहा कि जब हमें प्यास लगती है, तब हम कुआं खोदने निकलने पड़ते हैं। सूत्र ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि वायुसेना ने 1998 में 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों को लेने की जरूरत बताई थी।

विज्ञापन


एक लंबी प्रक्रिया के बाद 126 राफेल लड़ाकू विमानों को लेने पर सहमति बनी। राफेल ने प्रतिपर्धा में बाजी भी मार ली, लेकिन केवल 36 लड़ाकू विमानों को लेने का ही रास्ता साफ हो पाया।

रक्षा संवाददाता रंजीत कुमार का कहना है कि जब पाकिस्तान के आतंकी संगठनों पर सर्जिकल स्ट्राइक (बालाकोट) हुई तो लोगों को राफेल लड़ाकू विमानों की याद आई।

लोगों को लगा कि राफेल होता तो बिना एलओसी क्रास किए ही हम आतंकी संगठनों के शिविर को निशाना बना सकते हैं। जबकि समय पर पहल हुई होती, तो राफेल लड़ाकू विमान काफी पहले वायुसेना में शामिल हो गए होते।

मेक इन इंडिया की भी नहीं हो पा रही है इज्जत

डीआरडीओ सूत्रों की मानें तो मेक इन इंडिया का नारा आए कई साल हो गए, लेकिन इसकी अभी तक इज्जत नहीं हो पा रही है। एक पूर्व वैज्ञानिक का कहना है कि डीआरडीओ ने 7वें जोन तक फायर करने वाली तोप विकसित की है।

यह 48 किमी तक वार करती है। इस स्तर की तोप अभी दुनिया में किसी भी रक्षा कंपनी ने विकसित नहीं की है, लेकिन इसके भारतीय सेना में शामिल होने में पसीने आ रहे हैं।

यहां तक कि तोप का यूजर ट्रायल होने में भी डीआरडीओ को पसीना बहाना पड़ रहा है। बताते हैं इस साल जुलाई-अगस्त में इस तोप का ट्रायल होना है, लेकिन जब सेना के बेड़े में शामिल हो जाए तो कहिए।

चीन की सीमा पर तैनात की जाने वाली दो माउंटेन ब्रह्मा डिवीजन कहां है?

रंजीत कुमार कहते हैं कि आज से करीब दस साल पहले चीन की चुनौती को देखकर दो माउंटेन डिवीजन (ब्रह्मा) विकसित करने का निर्णय हुआ था। लेकिन बाद में केंद्र सरकार इस निर्णय को वापस ले लिया।

अब डोकलाम, लद्दाख में चीन के साथ तनातनी के बाद इसकी शिद्दत से जरूरत महसूस की जा रही है। रंजीत कुमार का कहना है कि देर-सबरे हमें माउंटेन डिवीजन को डेवलप करके चीन की सीमा पर तैनात करना ही पड़ेगा।

लेकिन हमें नहीं पता कब। रक्षा मामलों के रणनीतिकार इस तरह की जरूरतों को समझकर निर्णय लेंगे? रंजीत कहते हैं कि यही स्थिति बोफोर्स तोप के साथ हुई थी।

उस पर धूल की परत जम रही थी, लेकिन करगिल घुसपैठ के बाद हमें इसकी याद आई। मेजर जनरल (पूर्व) लखविंदर सिंह भी कहते हैं कि बोफोर्स तोप के साथ ऐसा हुआ था।

यदि करगिल न हुआ होता तो लोगों को यह घोटाले वाली घटिया तोप लगती। रक्षा मंत्रालय ने 2010 के बाद महसूस किया कि तकनीकी हस्तांतरण के तहत बोफोर्स तोप को भारत में तैयार किया जा सकता है।

लद्दाख में सैनिकों के पास नहीं है गुणवत्ता की वर्दी

एक ताजा समस्या सुन लीजिए। लद्दाख में चीन के साथ तनातनी के बाद भारत ने सैन्य तैनाती बढ़ाई है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि हमारे सुरक्षा बलों के पास वहां के वातावरण के अनुरुप वर्दी नहीं है।

बताते हैं 15 जून को गलवां नदी घाटी में हिंसक झड़प के दौरान हमारे तमाम जवानों को इसकी त्रासदी झेलनी पड़ी। वर्दी और जूते दोनों हालात का सामना करने वाले नहीं थे। जबकि चीन की सेना के जवानों के पास वाटर प्रूफ वातावरण के अनुरुप शानदार ड्रेस, वर्दी, जूते, संसाधन मौजूद हैं।

सूत्र बताते हैं अब भारतीय सेना के जवानों, सुरक्षा बलों के लिए इसे लेने की पहल हो रही है। बताते हैं जब तक इनकी आपूर्ति होगी, तबतक नई दिशा में कई बदलाव आ जाएंगे।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें