जब दुश्मन सीना तानकर मुहाने पर चुनौनतियां देने लगता है, तब भारत को अपने शस्त्रागार की याद आती है। चीन से बढ़े तनाव के बीच में रक्षा रणनीतिकारों की यही स्थिति है। डीआरडीओ ने दो साल पहले लंबी दूरी की सतह से मार करने वाली मिसाइल को विकसित किया है, लेकिन रक्षा खरीद मामलों की उच्च समिति डीएसी (डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल) ने गुरुवार को इसकी मंजूरी दी है।
एक पूर्व वायुसेनाध्यक्ष ने कहा कि जब हमें प्यास लगती है, तब हम कुआं खोदने निकलने पड़ते हैं। सूत्र ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि वायुसेना ने 1998 में 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों को लेने की जरूरत बताई थी।
डीआरडीओ सूत्रों की मानें तो मेक इन इंडिया का नारा आए कई साल हो गए, लेकिन इसकी अभी तक इज्जत नहीं हो पा रही है। एक पूर्व वैज्ञानिक का कहना है कि डीआरडीओ ने 7वें जोन तक फायर करने वाली तोप विकसित की है।
यह 48 किमी तक वार करती है। इस स्तर की तोप अभी दुनिया में किसी भी रक्षा कंपनी ने विकसित नहीं की है, लेकिन इसके भारतीय सेना में शामिल होने में पसीने आ रहे हैं।
यहां तक कि तोप का यूजर ट्रायल होने में भी डीआरडीओ को पसीना बहाना पड़ रहा है। बताते हैं इस साल जुलाई-अगस्त में इस तोप का ट्रायल होना है, लेकिन जब सेना के बेड़े में शामिल हो जाए तो कहिए।
रंजीत कुमार कहते हैं कि आज से करीब दस साल पहले चीन की चुनौती को देखकर दो माउंटेन डिवीजन (ब्रह्मा) विकसित करने का निर्णय हुआ था। लेकिन बाद में केंद्र सरकार इस निर्णय को वापस ले लिया।
अब डोकलाम, लद्दाख में चीन के साथ तनातनी के बाद इसकी शिद्दत से जरूरत महसूस की जा रही है। रंजीत कुमार का कहना है कि देर-सबरे हमें माउंटेन डिवीजन को डेवलप करके चीन की सीमा पर तैनात करना ही पड़ेगा।
लेकिन हमें नहीं पता कब। रक्षा मामलों के रणनीतिकार इस तरह की जरूरतों को समझकर निर्णय लेंगे? रंजीत कहते हैं कि यही स्थिति बोफोर्स तोप के साथ हुई थी।
उस पर धूल की परत जम रही थी, लेकिन करगिल घुसपैठ के बाद हमें इसकी याद आई। मेजर जनरल (पूर्व) लखविंदर सिंह भी कहते हैं कि बोफोर्स तोप के साथ ऐसा हुआ था।
यदि करगिल न हुआ होता तो लोगों को यह घोटाले वाली घटिया तोप लगती। रक्षा मंत्रालय ने 2010 के बाद महसूस किया कि तकनीकी हस्तांतरण के तहत बोफोर्स तोप को भारत में तैयार किया जा सकता है।
एक ताजा समस्या सुन लीजिए। लद्दाख में चीन के साथ तनातनी के बाद भारत ने सैन्य तैनाती बढ़ाई है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि हमारे सुरक्षा बलों के पास वहां के वातावरण के अनुरुप वर्दी नहीं है।
बताते हैं 15 जून को गलवां नदी घाटी में हिंसक झड़प के दौरान हमारे तमाम जवानों को इसकी त्रासदी झेलनी पड़ी। वर्दी और जूते दोनों हालात का सामना करने वाले नहीं थे। जबकि चीन की सेना के जवानों के पास वाटर प्रूफ वातावरण के अनुरुप शानदार ड्रेस, वर्दी, जूते, संसाधन मौजूद हैं।
सूत्र बताते हैं अब भारतीय सेना के जवानों, सुरक्षा बलों के लिए इसे लेने की पहल हो रही है। बताते हैं जब तक इनकी आपूर्ति होगी, तबतक नई दिशा में कई बदलाव आ जाएंगे।