अस्पताल में CRPF के सहायक कमांडेंट बिभोर कुमार सिंह, CRPF DG कुलदीप सिंह
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देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ कोबरा' के सहायक कमांडेंट वैभव विभोर, नक्सलियों के आईईडी हमले में बुरी तरह जख्मी हो गए थे। औरंगाबाद 'बिहार' के मदनपुर थाना क्षेत्र में गत माह हुए हमले में विभोर के अलावा हवलदार सुरेंद्र कुमार भी घायल हुए थे। जिस वक्त जंगल में सीआरपीएफ का 'ऑपरेशन' चल रहा था, वहां आसपास के किसी भी बेस पर हेलीकॉप्टर मौजूद नहीं था। गया तक पहुंचने के लिए घायलों को एंबुलेंस में चार घंटे का सफर करना पड़ा। जब ये एंबुलेंस गया पहुंची तो रात को हेलीकॉप्टर उड़ाने की मंजूरी नहीं मिली। ऐसे में घायलों को 19 घंटे बाद दिल्ली एम्स में लाया गया। नतीजा, सहायक कमांडेंट विभोर ने अपनी दोनों टांगें खो दीं। एक हाथ की दो अंगुलियां भी काटनी पड़ीं। इस बाबत डीजी कुलदीप सिंह ने कहा, इस कष्टदायक घटना के लिए मैं खुद को जिम्मेदार मानता हूं।
डीजी कुलदीप सिंह ने 'सीआरपीएफ डे' की पूर्व संध्या पर सीजीओ कांप्लेक्स स्थित बल मुख्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता के दौरान यह बात कही है। उनसे एक सवाल किया गया था कि वैभव की पत्नी ने कहा है कि उनकी दोनों टांगें इसलिए काटनी पड़ीं, क्योंकि समय पर हेलीकॉप्टर नहीं पहुंचा था। इसके लिए जिम्मेदार कौन है। इस पर डीजी कुलदीप सिंह बोले, कोई नहीं, मैं खुद को इसके लिए जिम्मेदार मानता हूं। इस मामले में कई दूसरे पक्ष भी हैं। हेलीकॉप्टर देरी से क्यों आया, वहां पर क्यों नहीं खड़ा था, बीएसएफ की तरह सीआरपीएफ के पास अपनी एयरविंग क्यों नहीं है। डीजी ने कहा, हमें मालूम है, कई बार प्रेक्टिली असुविधा होती है। किसी एक का फाल्ट है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। चॉपर कहां से आता है, ये भी देखना होता है। बीएसएफ का चॉपर है, एयरफोर्स का है, इसके लिए नोडल अफसर लगाए गए हैं। इनका काम सामंजस्य बनाना है।
बिभोर सिंह के मामले में चॉपर आया, मगर उसे उड़ने की इजाजत नहीं मिली। कई सारे कारण हैं। जब इनका विस्तृत अध्ययन करेंगे तो किसी का कसूर नजर नहीं आएगा। अगर हमें यह लगता है कि हेलीकॉप्टर के देरी से आने के पीछे कोई लापरवाही है तो उस पर बात होती है। जांच भी हो सकती है। सीआरपीएफ के लिए खुद की एयरविंग स्थापित करना, संभव नहीं है। हम अपने जवानों और अधिकारियों की ऐसी किसी भी मुसीबत में पूरी तन्मयता के साथ हर संभव मदद प्रदान करते हैं।
बल के पूर्व अफसरों का कहना था, सीएपीएफ में समन्वय की भारी कमी है। खुद की एयरविंग होती तो इस तरह की दिक्कतें नहीं आतीं। जब किसी क्षेत्र में 'ऑपरेशन' चल रहा है तो एक हेलीकॉप्टर वहां के बेस कैंप पर तैयार रहना चाहिए। पता नहीं कब कैसी जरुरत पड़ जाए। खुद का हेलीकॉप्टर नहीं है, इसलिए उसके आने में देरी हो जाती है। उसके बाद ऐसी शर्त लगने लगती हैं कि हम वहां लैंड करेंगे, वहां नहीं करेंगे। कभी हेलीकॉप्टर समय पर नहीं आता तो कभी एटीसी की मंजूरी नहीं मिलती। जब अधिकारियों का हेलीकॉप्टर वहां उतर सकता है तो घायलों को ले जाने के लिए हेलीकॉप्टर वहां क्यों नहीं आ सकता।