इस तरह सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि राजस्थान और पंजाब की अंदरूनी कलह कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। पार्टी पंजाब और छत्तीसगढ़ में आग बुझाने में जुटी हुई है और अभी राजस्थान का भी संकट खत्म नहीं हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों को मानना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है कि क्योंकि कांग्रेस में कोई कप्तान नहीं है और पार्टी सही समय पर कोई भी उचित फैसला नहीं कर पा रही है। यह भी माना जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व खुद कमजोर है, इसलिए नेता बगावती तेवर अपनाकर जब-तब आलाकमान के सामने संकट खड़ा कर रहे हैं। बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बगावत की समस्या आलाकमान की वजह से ही है क्योंकि अटकलें हैं कि सचिन पायलट और टीएस सिंहदेव से मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया गया था।
कांग्रेस में संकट की तीन बड़ी वजह
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कांग्रेस में मौजूदा संकट के पीछे तीन वजहें बताती हैं।
- पार्टी में फुल टाइम लीडरशीप नहीं है। जी-23 के नेताओं की बात सही थी कि पार्टी में फुल टाइम लीडरशीप होनी चाहिए। सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं, वे कभी-कभार ही सामने आती हैं। राहुल और प्रियंका केवल कांग्रेस चला रहे हैं। ये दोनों मिलकर सब निर्णय लेते हैं। हालांकि राहुल गांधी अभी भी खुलकर इस जिम्मेदारी को उठाने को तैयार नहीं है और सोनिया गांधी स्वास्थ्य कारणों से कभी-कभार नजर आती हैं। कुल मिलाकर पार्टी में भारी उलझन है
- अहमद पटेल की मृत्यु के बाद अब तक कोई उनकी जगह नहीं ले सका है। पार्टी में कोई राजनीतिक सचिव नहीं है। इससे कांग्रेस की बात होने पर ऐसी पार्टी की तस्वीर उभरती है, जिसमें कोई कप्तान नहीं है।
- कांग्रेस के अंदर ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि संकट का समाधन निकालने में माहिर नेतृत्व नहीं है। इसलिए उसने अपना घर नहीं संभल रहा है।
पंजाब: देर से जागा आलाकमान
मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के विरोध के बाद भी नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस का प्रमुख नियुक्त करके संकट का हल निकालने की कोशिश की गई, लेकिन असंतुष्टों ने अब मांग की है कि पार्टी के चुनाव अभियान का चेहरा किसी और को बनाया जाए। यहां करीब छह महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं। माना जा रहा था कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस यहां फिर से सरकार बना सकती है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का अब मानना है कि जिस तरह कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच सिर-फुटौव्वल चल रही है, उस वजह से पार्टी पंजाब में जीती हुई बाजी हार न जाए।
राजस्थान: पायलट को संगठन में बड़ा पद देकर मनाने की कोशिश
राजस्थान की बात करें तो यहां की गुटबाजी पिछले साल कांग्रेस को भारी ही पड़ जाती। विरोध की चिंगारी अभी भी दहक रही है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ सचिन पायलट गुट विद्रोही तेवर अपनाए हुए है। ऐसा लगता है कि किसी भी समय राजस्थान में बगावत हो सकती है। माना जाता है कि सचिन पायलट की असंतुष्टि की वजह यह है कि राहुल गांधी ने उनसे यह वादा किया था कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद उन्हें नेतृत्व सौंपा जाएगा। इसी वजह से पायलट को चुनाव से बहुत पहले दिल्ली से राजस्थान भेज दिया गया था, लेकिन चुनाव के बाद अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने और पायलट के हिस्से इंतजार आया।
ऐसी अटकलें हैं कि राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को पार्टी संगठन में एक महत्वपूर्ण पद सौंपा जा सकता है। बाद में राजस्थान सरकार में उनकी वापसी भी हो सकती है। इस बारे में पूछे जाने पर पायलट ने मीडिया से कहा 'मैं कांग्रेस का वफादार सिपाही हूं। मैंने कुछ नहीं सुना है, लेकिन मेरी पार्टी जो भी काम मुझे देगी, उसमें मैं अपना 100 फीसदी दूंगा।
सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं, लेकिन वे राज्यों में बगावत रोकने के लिए जिन नेताओं पर भरोसा करती हैं, वे भी इस मामले को संभाल नहीं पाते। जैसे पंजाब में आलाकमान का दूत बनकर आए मल्लिकार्जुन खड़गे और हरीश रावत असंतुष्टों को शांत नहीं करा पाए। भारतीय जनता पार्टी का 2017 में गोवा और मणिपुर में सरकार बना लेना और मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिर जाना कांग्रेस नेतृत्व की कमजोरी के उदाहरण है। 2020 में कर्नाटक में जद (एस)-कांग्रेस की गठबंधन सरकार भी इन्हीं वजहों से गिर गई।
नीरजा चौधरी कहती हैं कि विपक्ष के सामने सरकार को घेरने के कई मौके आए, लेकिन कांग्रेस बिना पतवार वाली पार्टी हो गई है, जिससे अपनी नैया ही पार नहीं लग रही तो वह एक मजबूत विपक्ष कैसे बन सकती है। पार्टी को नेतृत्व संभालने के लिए तत्काल अपना घर ठीक करने की जरूरत है।