सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस एनवी रमण ने कहा कि देश में सरकारें सबसे बड़ी मुकदमेबाज हैं, करीब आधे लंबित मुकदमे इन्हीं के हैं। उन्होंने कहा, देश में मुकदमों का विस्फोट दो वजहों से हो रहा है, पहली यह कि कार्यपालिका के विभिन्न अंग अपना काम ठीक से नहीं कर रहे और दूसरी, विधायिका अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर रही।
सीजेआई रमण ने शनिवार को मुख्यमंत्रियों व सभी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की संयुक्त कॉन्फ्रेंस में ये बातें कहीं। दिल्ली के विज्ञान भवन में कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। सीजेआई रमण ने कहा, अदालतों में अवमानना से जुड़े मुकदमे बढ़ रहे हैं, क्योंकि कार्यपालिका न्यायिक आदेशों का पूरी तरह अनुपालन नहीं करवा पा रही है।
आदेशों के बावजूद सरकारों द्वारा जानबूझकर कार्रवाई न करना लोकतंत्र की सेहत के लिए सही नहीं है। सरकार जब सालों तक आदेशों का पालन नहीं करती, तो लोग फिर कोर्ट का रुख करते हैं। इस कारण अवमानना याचिकाओं की एक नई श्रेणी का बोझ अदालतों पर पड़ गया है, जबकि विभिन्न हाईकोर्ट में जजों के 1104 में से 388 पद रिक्त हैं।
लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखें
कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका तीनों को अपनी लक्ष्मण रेखा का ध्यान रख कर कर्तव्य निभाने चाहिए। कानून का पालन होगा, तो न्यायपालिका कभी शासन के रास्ते में नहीं आएगी। अदालतें नीति नहीं बनातीं, लेकिन अगर कोई कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, तो हम न नहीं कह सकते।
-जस्टिस एनवी रमण, सीजेआई
न्यायपालिका-विधायिका में संतुलन तैयार करेगा देश में प्रभावी, समयबद्ध न्याय व्यवस्था का रोडमैप
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि न्यायपालिका की भूमिका संविधान संरक्षक की है, वहीं विधायिका नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने कहा, मुझे विश्वास है कि संविधान की इन दो धाराओं का यह संगम व संतुलन प्रभावी और समयबद्ध न्याय व्यवस्था का रोडमैप तैयार करेगा।
पीएम मोदी ने मुख्यमंत्रियों व मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन में कहा, पीएम ने कहा, न्याय सुलभ, त्वरित और सबके लिए होना चाहिए। साथ ही भरोसा दिया कि फैसलों में देरी कम करने के लिए भी हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। पीएम ने कानून की पेचीदगियों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने राज्यों की ओर से इस पर गंभीरता नहीं दिखाने पर चिंता जताई।
कहा-केंद्र ने करीब 1,450 कानूनों को खत्म किया है। पर, राज्यों की तरफ से केवल 75 कानून ही खत्म किए गए हैं। उन्होंने सभी राज्यों से ईज ऑफ लिविंग के अंतर्गत कानूनों का मकड़जाल समाप्त करने की अपील की। प्रधानमंत्री ने तकनीकी व मेडिकल शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने की जरूरत बताई है।
उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय के लिए भाषा को अड़चन नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा, हमारे बच्चे विदेश जाते हैं। वहां की भाषा पढ़कर कोशिश करते हैं। यहां क्यों नहीं होना चाहिए?
न्याय का आधार न समझ आए तो वह महज राजकीय आदेश
जब तक न्याय के आधार को सामान्य व्यक्ति नहीं समझता, उसके लिए न्याय और राजकीय आदेश में बहुत फर्क नहीं रह जाता। किसी भी देश में सुराज का आधार न्याय होता है। इसलिए न्याय जनता से जुड़ा हुआ, जनता की भाषा में होना चाहिए। उसके आधार पर अपनी बात रख सकें। सरकार इसके लिए प्रयास कर रही है। इसके लिए एक समिति का गठन किया गया है, जो इसका अध्ययन कर रही है। -नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री