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सीजेआई रमण बोले : सरकारें सबसे बड़ी मुकदमेबाज, आधे लंबित केस इन्हीं के, कार्यपालिका के अंग ठीक से नहीं कर रहे काम

Sun, 01 May 2022 05:20 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

जस्टिस रमण ने राष्ट्रीय और राज्यों के स्तर पर ज्यूडिशियल इंफ्रास्ट्रक्चर अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने कहा, विचार-विमर्श के बाद मुख्यमंत्रियों में करीब-करीब एक राय है कि राष्ट्रीय नहीं, बल्कि राज्यों के स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर अथॉरिटी बने। उन्होंने कहा कि इसमें राजनीतिक नेतृत्व को भी जगह देने की बात है। मुख्यमंत्री या उनका नामित कोई व्यक्ति ऐसी संस्था का हिस्सा हो सकता है।
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सीजेआई एनवी रमण। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस एनवी रमण ने कहा कि देश में सरकारें सबसे बड़ी मुकदमेबाज हैं, करीब आधे लंबित मुकदमे इन्हीं के हैं। उन्होंने कहा, देश में मुकदमों का विस्फोट दो वजहों से हो रहा है, पहली यह कि कार्यपालिका के विभिन्न अंग अपना काम ठीक से नहीं कर रहे और दूसरी, विधायिका अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर रही।
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सीजेआई रमण ने शनिवार को मुख्यमंत्रियों व सभी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की संयुक्त कॉन्फ्रेंस में ये बातें कहीं। दिल्ली के विज्ञान भवन में कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। सीजेआई रमण ने कहा, अदालतों में अवमानना से जुड़े मुकदमे बढ़ रहे हैं, क्योंकि कार्यपालिका न्यायिक आदेशों का पूरी तरह अनुपालन नहीं करवा पा रही है।

आदेशों के बावजूद सरकारों द्वारा जानबूझकर कार्रवाई न करना लोकतंत्र की सेहत के लिए सही नहीं है। सरकार जब सालों तक आदेशों का पालन नहीं करती, तो लोग फिर कोर्ट का रुख करते हैं। इस कारण अवमानना याचिकाओं की एक नई श्रेणी का बोझ अदालतों पर पड़ गया है, जबकि विभिन्न हाईकोर्ट में जजों के 1104 में से 388 पद रिक्त हैं।
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लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखें
कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका तीनों को अपनी लक्ष्मण रेखा का ध्यान रख कर कर्तव्य निभाने चाहिए। कानून का पालन होगा, तो न्यायपालिका कभी शासन के रास्ते में नहीं आएगी। अदालतें नीति नहीं बनातीं, लेकिन अगर कोई कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, तो हम न नहीं कह सकते। -जस्टिस एनवी रमण, सीजेआई

न्यायपालिका-विधायिका में संतुलन तैयार करेगा देश में प्रभावी, समयबद्ध न्याय व्यवस्था का रोडमैप
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि न्यायपालिका की भूमिका संविधान संरक्षक की है, वहीं विधायिका नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने कहा, मुझे विश्वास है कि संविधान की इन दो धाराओं का यह संगम व संतुलन प्रभावी और समयबद्ध न्याय व्यवस्था का रोडमैप तैयार करेगा। 


पीएम मोदी ने मुख्यमंत्रियों व मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन में कहा, पीएम ने कहा, न्याय सुलभ, त्वरित और सबके लिए होना चाहिए। साथ ही भरोसा दिया कि फैसलों में देरी कम करने के लिए भी हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। पीएम ने कानून की पेचीदगियों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने राज्यों की ओर से इस पर गंभीरता नहीं दिखाने पर चिंता जताई।


कहा-केंद्र ने करीब 1,450 कानूनों को खत्म किया है। पर, राज्यों की तरफ से केवल 75 कानून ही खत्म किए गए हैं। उन्होंने सभी राज्यों से ईज ऑफ लिविंग के अंतर्गत कानूनों का मकड़जाल समाप्त करने की अपील की। प्रधानमंत्री ने तकनीकी व मेडिकल शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने की जरूरत बताई है।

 

उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय के लिए भाषा को अड़चन नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा, हमारे बच्चे विदेश जाते हैं। वहां की भाषा पढ़कर कोशिश करते हैं। यहां क्यों नहीं होना चाहिए?

न्याय का आधार न समझ आए तो वह महज राजकीय आदेश
जब तक न्याय के आधार को सामान्य व्यक्ति नहीं समझता, उसके लिए न्याय और राजकीय आदेश में बहुत फर्क नहीं रह जाता। किसी भी देश में सुराज का आधार न्याय होता है। इसलिए न्याय जनता से जुड़ा हुआ, जनता की भाषा में होना चाहिए। उसके आधार पर अपनी बात रख सकें। सरकार इसके लिए प्रयास कर रही है। इसके लिए एक समिति का गठन किया गया है, जो इसका अध्ययन कर रही है।  -नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

अदालतों में जरूरी बुनियादी ढांचे के लिए बनेंगी राज्य स्तरीय संस्थाएं : सीजेआई
देश के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण ने कहा है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका में इस बात पर सहमति बन गई है कि अदालतों में जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने के लिए राज्य स्तर पर संस्थाएं बनाई जाएंगी। मुख्यमंत्रियों और सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की संयुक्त कॉन्फ्रेंस में लिए गए फैसलों की जानकारी देने के लिए कानून मंत्री किरण रिजिजू के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में जस्टिस रमण ने यह बात कही।

जस्टिस रमण ने राष्ट्रीय और राज्यों के स्तर पर ज्यूडिशियल इंफ्रास्ट्रक्चर अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने कहा, विचार-विमर्श के बाद मुख्यमंत्रियों में करीब-करीब एक राय है कि राष्ट्रीय नहीं, बल्कि राज्यों के स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर अथॉरिटी बनाई जाए। उन्होंने कहा कि इसमें राजनीतिक नेतृत्व को भी जगह देने की बात है। मुख्यमंत्री या उनका नामित कोई व्यक्ति ऐसी संस्था का हिस्सा हो सकता है। अधिकांश राज्य इस मॉडल पर सहमत हैं।

जस्टिस रमण ने कहा कि कॉन्फ्रेंस में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों ने आग्रह किया कि राज्यों को ‘एक बार मदद’ के रूप में केंद्र को इंफ्रास्ट्रक्चर फंड और सभी जरूरी सुविधाएं देने पर विचार होना चाहिए। कानून मंत्री रिजिजू ने कहा कि राज्यों की अदालतों में बुनियादी ढांचा मजबूत करने में केंद्र सरकार पूरी मदद देगी।

स्थानीय भाषाओं में काम-काज जैसे सुधार एक दिन में नहीं हो सकते
देश के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण ने कहा कि अदालतों में स्थानीय भाषाओं में काम-काज जैसे सुधार एक दिन में नहीं हो सकते क्योंकि इनमें लॉजिस्टिक एवं अन्य बाधाओं के कारण समय लगेगा। उन्होंने कहा, कई बार कुछ जज स्थानीय भाषा से परिचित नहीं होते।

न्यायपालिका से व्यापक सलाह मशविरा जरूरी : रिजिजू
कानून मंत्री किरण रिजिजू से जब पूछा कि कौन सी बात सरकार को अदालतों में स्थानीय भाषा लागू करने से रोक रही है तो रिजिजू ने कहा कि कुछ भी नहीं। ये प्रक्रिया है जिसमें न्यायपालिका के साथ विस्तृत सलाह-मशविरे की जरूरत है।
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मध्यस्थता से विवाद निपटारे की हो कोशिश : मोदी
मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हमारे समाज में तो मध्यस्थता के जरिए विवादों के समाधान की हजारों साल पुरानी परंपरा है। लंबित मामलों के समाधान के लिए मध्यस्थता एक महत्वपूर्ण जरिया है। इसके लिए संसद में मध्यस्थता बिल भी पेश किया है। यह सम्मेलन संवैधानिक खूबसूरती का सजीव चित्रण है। 

एक ओर न्यायपालिका की भूमिका संविधान संरक्षक की है, वहीं विधायिका नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। संविधान की इन दो धाराओं का संगम व संतुलन देश में प्रभावी व समयबद्ध न्याय-व्यवस्था का रोडमैप तैयार करेगा। उन्होंने कहा कि आजादी के अमृत काल में आयोजित इस कांफ्रेंस में विचार होना चाहिए कि 2047 में जब देश अपने आजादी के 100 साल पूरे करेगा, तब कैसी न्याय व्यवस्था देखना चाहेंगे?
  • न्यायिक सिस्टम को इतना समर्थ बनाएं कि वह 2047 की आकांक्षाओं को पूरा कर सके, उन पर खरा उतर सके। यह प्रश्न आज हमारी प्राथमिकता होना चाहिए।
  • अमृत काल में हमारा विजन ऐसी न्याय व्यवस्था का होना चाहिए, जिसमें न्याय सुलभ हो और न्याय सबके लिए हो।
मानवीय संवेदना पर विचार जरूरी
पीएम ने कहा, देश में करीब 3.5 लाख बंदियों के मामलों पर सुनवाई चल रही है। इनमें अधिकांश गरीब परिवारों से हैं। जिलाें में जिला जज की अध्यक्षता में एक कमेटी इन मुकदमाें की समीक्षा के लिए होती है। इन्हें लेकर मानवीय संवेदना के आधार पर काम की जरूरत है।

न्यायिक सुधारों पर करें विचार
पीएम ने कहा, यह केवल एक नीतिगत मामला नहीं है। देश में लंबित करोड़ों केस के निस्तारण के लिए पॉलिसी से लेकर तकनीक तक हर संभव प्रयास हो रहे हैं। हमने इसकी बार-बार चर्चा भी की है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस कांफ्रेंस में इस विषय पर विस्तार से बात होगी।

अंतर्राष्ट्रीय मानक पर हो कानून शिक्षा
पीएम ने कहा, कई देशों के विधि विश्वविद्यालयों में ब्लॉक चेन, इलेक्ट्रानिक डिस्कवरी, साइबर सिक्योरिटी, रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटीलीजेंस और बायोइथिक्स पढ़ाई जा रही है। देश में भी विधि की पढ़ाई की अंतर्राष्ट्रीय मानक पर होनी चाहिए। इसके लिए हमें मिलकर प्रयास करना होगा।
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