बिल के समर्थन में विरोध के स्वर उठने के बावजूद सरकार की सहयोगी ने लोकसभा की तरह राज्यसभा में भी बिल का समर्थन किया। लोकसभा में बिल का समर्थन करने वाली शिवसेना के सांसदों ने एनसीपी और कांग्रेस के दबाव में बीच का रास्ता अपनाते हुए मतदान के दौरान वॉकआउट किया।
पूर्वोत्तर के राज्यों को कई राहत
बिल का पूर्वोत्तर में भारी विरोध के बाद इसमें शामिल कई राज्यों को राहत दी गई है। मसलन संविधान की छठी अनुसूची वाले क्षेत्र, इनर और इनर परमिट वाले राज्यों में बिल के प्रावधान लागू नहीं होंगे। हालांकि इसके बावजूद पूर्वोत्तर में विरोध-प्रदर्शन जारी हैं।
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भाजपा ने गृह मंत्री शाह की अगुवाई में अपनी विचारधारा से जुड़े कई मुद्दों का समाधान किया। पहली पारी में तीन तलाक कानून को दंडनीय अपराध बनाने के बाद दूसरी पारी के महज छह साल के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के कई अहम प्रावधान निरस्त किए गए।
अब नागरिकता संशोधन बिल का कानूनी जामा पहनने का रास्ता साफ हुआ। इसी छोटे से कार्यकाल में अयोध्या विवाद का समाधान निकला। अब हिंदुत्ववादी एजेंडे के रूप में सरकार के पास सभी राज्यों में एनआरसी लागू कराना, धर्मांतरण विरोधी कानून बनाना, समान नागरिक संहिता और राष्ट्रीय जनसंख्या नीति लागू करना रह गया है।
चार साल बाद मिली कामयाबी
मोदी सरकार के पहले ही कार्यकाल में नागरिकता संशोधन बिल पारित कराने की कोशिश हुई थी। तब साल 2015 में इसे राज्यसभा की मंजूरी भी मिल गई थी। हालांकि संख्या बल के अभाव में सरकार इसे राज्यसभा में पारित नहीं करा पाई थी।