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चीन को बहुत पसंद है लिथियम: अफगानियों के इस खजाने की लालसा में धुंधला गया 'उइगर इस्लामिक चरमपंथ'

सार

सुरक्षा एवं रणनीतिक मामलों के जानकार बीएस सिवाच, एयर कमोडोर (रिटायर्ड) बताते हैं कि चीन बाजारवाद पर चलने वाला देश है। वह जिस किसी मुल्क या संगठन के साथ संबंध बनाता है, उसके मूल में कारोबारी फायदा छिपा रहता है। आने वाले समय में वह अफगानिस्तान को मदद देगा, इसमें कोई शक नहीं है...
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चीन के विदेश मंत्री वांग यी और तालिबान का राजनीतिक चेहरा मुल्ला अब्दुल गनी बरादर (बाएं)। - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी का काम पूरा होने के बाद अब वहां पर धीरे-धीरे राजनीतिक व्यवस्था का पटल तय होने लगा है। हालांकि अभी तक कोई भी अपने पत्ते नहीं खोल रहा है। ध्यान रहे कि 25 अगस्त को चीन के राजदूत वांग यू ने काबुल में तालिबान के डिप्टी हेड अब्दुल सलाम हनाफी (राजनीतिक ब्यूरो) से मुलाकात की थी। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद राजनयिक स्तर पर किसी दूसरे मुल्क के प्रतिनिधि के साथ यह पहली मुलाकात बताई जाती है। जानकारों का कहना है कि चीन को 'लिथियम का सऊदी अरब' बहुत पसंद आ रहा है। अफगानियों के इस खजाने की लालसा में चीन का सबसे ज्वलंत 'उइगर इस्लामिक चरमपंथ' का मुद्दा भी धुंधला गया है। अमेरिका ने करीब एक दशक पहले अफगानिस्तान में छिपे खनिज पदार्थों को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी। उसमें तीन ट्रिलियन डॉलर का खनिज भंडार होने की बात कही गई थी। वहां लिथियम की मात्रा इतनी ज्यादा है कि उसे दुनिया के अनेक देशों में सप्लाई किया जा सकता है। चीन अपनी इस रणनीति में कामयाब हो जाता है तो वह अपने रणनीतिक प्रोजेक्ट 'बेल्ट-एंड-रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के लिए पेशावर से काबुल तक रास्ता बनाने में देर नहीं लगाएगा।

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सुरक्षा एवं रणनीतिक मामलों के जानकार बीएस सिवाच, एयर कमोडोर (रिटायर्ड) बताते हैं कि चीन बाजारवाद पर चलने वाला देश है। वह जिस किसी मुल्क या संगठन के साथ संबंध बनाता है, उसके मूल में कारोबारी फायदा छिपा रहता है। आने वाले समय में वह अफगानिस्तान को मदद देगा, इसमें कोई शक नहीं है। हथियारों एवं दूसरे उपकरणों को लेकर चीन, तालिबान की राह आसान बना सकता है। अभी तक चीन वैश्विक स्तर पर उइगर इस्लामिक चरमपंथी संगठन का मुद्दा उठाता आया है। अमेरिका और ब्रिटेन के अलावा कई इस्लामिक देश भी ऐसा मानते रहे हैं कि चीन में उइगर मुस्लिमों के साथ बहुत बुरा सलूक होता है। वहां उन्हें जीवन की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलती।

चीन ने कुछ तथ्यों को छिपाने के लिए उन्हें 'इस्लामिक चरमपंथी संगठनों' का नाम दे दिया है। इससे चीन को यह कहने में आसानी रहती है कि उसके नियंत्रण वाले शिंजियांग प्रांत में आतंकी समूह सक्रिय हैं। चीन के विदेश मंत्री और मुल्ला बरादर की मुलाकात में उइगर चरमपंथियों को लेकर बातचीत हुई थी, लेकिन मुख्य फोकस अफगानिस्तान में दबे खनिज पदार्थों के खनन अधिकार पर रहा। ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) के अनुसार, देखिये चीन को लेकर मैं हमेशा एक बात कहता हूं कि वह बहुत प्रोफेशनल है। अब तक के चीन को देखेंगे तो वह नव उपनिवेशवाद वाली परिभाषा पर खरा उतरता है। आर्थिक या अन्य तरीके की मदद दो और कब्जा जमाने की स्थिति में पहुंच जाओ। कब्जा नहीं, तो कम से कम, हस्तक्षेप का अधिकार तो मिल ही जाए, इससे कम में चीन नहीं मानता।

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चीन दिखावे के लिए यह बात कहता है कि तालिबान, उइगर चरमपंथियों को मदद नहीं देगा। पश्चिमी चीन में उइगर इस्लामिक चरमपंथी संगठनों की संख्या बढ़ रही है तो उसके लिए वह खुद जिम्मेदार है। वहां पर चाहे मानवाधिकारों को कितना ही नुकसान क्यों न पहुंचे, लेकिन चीन कभी भी अपने शिंजियांग प्रांत को 'ईस्ट तुर्केस्तान' में तब्दील नहीं होने देगा। उइगर इस्लामिक चरमपंथी संगठनों की यही मांग रही है। बतौर अनिल गुप्ता, चीन की नजर तो अफगानिस्तान के लिथियम पर है। इस तरह की रिपोर्ट सामने आई हैं कि वहां पर आधुनिक तकनीक की मदद से खनन किया जाए तो लिथियम का खजाना मिल सकता है। पैसा और तकनीक, चीन के पास सब कुछ है। यही सबसे बड़ी वजह है कि वह तालिबान के नए अफगानिस्तान की तरफ हाथ बढ़ा रहा है। वखजीर दर्रे के साथ चीन और अफगानिस्तान की 80 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है। चीन का प्रयास है कि ये दर्रा व्यापार के लिए तैयार हो जाए।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, लिथियम आयन बैटरी में इस्तेमाल होता है। अगर इसका सही तरह से खनन हो तो इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में क्रांति आ सकती है। वहां पर लगभग 1.4 मिलियन टन के दुर्लभ खनिज पदार्थ बताए गए हैं। अगर, खनिज पदार्थों के खनन का अधिकार चीन को मिलता है तो वह रिन्यूएबल एनर्जी और दूसरे कई तकनीकी मामलों में अमेरिका और दूसरे देशों को पछाड़ सकता है। ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता का कहना है, चीन एक बैंकर की तरह काम करता है। खैरात, यह शब्द उसके पास नहीं है। लोन कितना भी लो, उसे वसूलना वह अच्छी तरह जानता है।

चीन चाहता है कि उसका रणनीतिक कॉरिडोर 'बेल्ट-एंड-रोड इनिशिएटिव' पेशावर से काबुल तक जुड़ जाए। व्यापार और सैन्य, दोनों मकसद के लिए यह सड़क चीन को बड़ा फायदा पहुंचा सकती है। तालिबान के साथ चीन आएगा, लेकिन अकेला नहीं। उसे पाकिस्तान को साथ लेना पड़ेगा। वजह, तालिबान के कई समूहों के साथ पाकिस्तानी सेना व आईएसआई की अच्छी पटती है। तालिबान ने पाकिस्तान को अपना दूसरा घर भी कहा है। पाकिस्तान में पहले से ही चीन की बड़े क्षेत्र में मौजूदगी है। पाकिस्तान पर चीन का कर्ज दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। बिना भूभाग के समझौते के उस कर्ज की अदायगी नहीं हो सकती। 'चीन-पाकिस्तान-अफगानिस्तान कॉरिडोर' और बीआरआई, इन दोनों प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए तालिबान से निकटता जरूरी है।
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