चीन दिखावे के लिए यह बात कहता है कि तालिबान, उइगर चरमपंथियों को मदद नहीं देगा। पश्चिमी चीन में उइगर इस्लामिक चरमपंथी संगठनों की संख्या बढ़ रही है तो उसके लिए वह खुद जिम्मेदार है। वहां पर चाहे मानवाधिकारों को कितना ही नुकसान क्यों न पहुंचे, लेकिन चीन कभी भी अपने शिंजियांग प्रांत को 'ईस्ट तुर्केस्तान' में तब्दील नहीं होने देगा। उइगर इस्लामिक चरमपंथी संगठनों की यही मांग रही है। बतौर अनिल गुप्ता, चीन की नजर तो अफगानिस्तान के लिथियम पर है। इस तरह की रिपोर्ट सामने आई हैं कि वहां पर आधुनिक तकनीक की मदद से खनन किया जाए तो लिथियम का खजाना मिल सकता है। पैसा और तकनीक, चीन के पास सब कुछ है। यही सबसे बड़ी वजह है कि वह तालिबान के नए अफगानिस्तान की तरफ हाथ बढ़ा रहा है। वखजीर दर्रे के साथ चीन और अफगानिस्तान की 80 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है। चीन का प्रयास है कि ये दर्रा व्यापार के लिए तैयार हो जाए।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, लिथियम आयन बैटरी में इस्तेमाल होता है। अगर इसका सही तरह से खनन हो तो इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में क्रांति आ सकती है। वहां पर लगभग 1.4 मिलियन टन के दुर्लभ खनिज पदार्थ बताए गए हैं। अगर, खनिज पदार्थों के खनन का अधिकार चीन को मिलता है तो वह रिन्यूएबल एनर्जी और दूसरे कई तकनीकी मामलों में अमेरिका और दूसरे देशों को पछाड़ सकता है। ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता का कहना है, चीन एक बैंकर की तरह काम करता है। खैरात, यह शब्द उसके पास नहीं है। लोन कितना भी लो, उसे वसूलना वह अच्छी तरह जानता है।
चीन चाहता है कि उसका रणनीतिक कॉरिडोर 'बेल्ट-एंड-रोड इनिशिएटिव' पेशावर से काबुल तक जुड़ जाए। व्यापार और सैन्य, दोनों मकसद के लिए यह सड़क चीन को बड़ा फायदा पहुंचा सकती है। तालिबान के साथ चीन आएगा, लेकिन अकेला नहीं। उसे पाकिस्तान को साथ लेना पड़ेगा। वजह, तालिबान के कई समूहों के साथ पाकिस्तानी सेना व आईएसआई की अच्छी पटती है। तालिबान ने पाकिस्तान को अपना दूसरा घर भी कहा है। पाकिस्तान में पहले से ही चीन की बड़े क्षेत्र में मौजूदगी है। पाकिस्तान पर चीन का कर्ज दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। बिना भूभाग के समझौते के उस कर्ज की अदायगी नहीं हो सकती। 'चीन-पाकिस्तान-अफगानिस्तान कॉरिडोर' और बीआरआई, इन दोनों प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए तालिबान से निकटता जरूरी है।