देश के 109 से अधिक पूर्व सिविल सेवकों के एक समूह ने गुरुवार को कहा कि आईएएस और आईपीएस कैडर नियमों में प्रस्तावित बदलाव से केंद्र द्वारा सत्ता के दुरुपयोग की अधिक गुंजाइश बनेगी। जब भी केंद्र, राज्य सरकारों से नाखुश हुआ तो वह रणनीतिक पदों पर बैठे अधिकारियों को निशाना बना सकता है। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट है कि प्रस्तावित संशोधनों पर गहराई से विचार नहीं किया गया है और संघीय परामर्श के बिना इसे पेश किया गया है। यह दिखाता है कि मौजूदा व्यवस्था केंद्रीकृत सत्ता का मनमाने प्रयोग करना चाहती है।
नियम में बदलाव को वापस लेने की अपील की
पूर्व सिविल सेवकों ने केंद्र से इस प्रस्ताव को वापस लेने की अपील करते हुए इसे मनमाना, अनुचित और असंवैधानिक बताया क्योंकि यह संविधान के मूल ढांचे में हस्तक्षेप करता है और अपूरणीय क्षति का कारण बन सकता है। उन्होंने एक बयान में कहा कि देश के संघीय ढांचे में संघ और राज्य अलग संस्थाओं के रूप में मौजूद हैं, हालांकि वे आम संवैधानिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए मिलकर काम करते हैं।
इन्होंने कहा कि अखिल भारतीय सेवाएं (एआईएस), भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफओएस) सरकार के दो स्तरों के बीच इस संबंध के लिए प्रशासनिक ढांचे का गठन करती हैं और इसे स्थिरता और संतुलन देती है।
इसमें कहा गया है कि तीनों एआईएस के कैडर नियमों में प्रस्तावित संशोधन संघ को राज्यों में काम कर रहे किसी भी एआईएस अधिकारी को चुनने, तैनाती के लिए एकतरफा अधिकार देता है। केंद्र संबंधित अधिकारी या राज्य सरकार की सहमति के बिना उसकी तैनाती कर सकता है। हालांकि नियमों में यह बदलाव मामूली, तकनीकी लग सकता है, लेकिन यह भारतीय संघवाद की संवैधानिक योजना की आत्मा पर चोट करता है।